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साक्षरता को लेकर प्रतिनिधियों को छूट क्यों? 

akb

पिछले कुछ वक़्त से नज़र आ रहा है कि राजनीति में सुधारों के पैरोकार भी उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता के मामले में बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। उनकी दलील होती है कि ये लोकतंत्र के खिलाफ है, संविधान के खिलाफ है। ये किसी गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी के लिए नुकसानदायक होगा।

जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था कि जिन अनपढ़ लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब झोंक दिया, शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता लगाकर उन्हें चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।

प्रथम प्रधानमंत्री की इस दलील से मैं बिलकुल सहमत हूँ। लेकिन क्या नेहरू आज के सन्दर्भ में भी यही कहते? उस वक़्त के स्वतंत्रता सेनानी आज चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। 1947 से 2017 के मानव संसाधन में अंतर भी आया है। उस वक़्त देश की बड़ी संख्या के लिए संसाधन मुहैया नहीं थे तो देश को ये हक़ भी नहीं था कि इस तरह की कोई अनिवार्यता थोपी जाये। तब देश के लोग 90 साल तक आज़ादी के लिए जूझ रहे थे। साक्षरता दर 12% थी। आज माहौल अलग है, संसाधन बेहतर हैं। देश की साक्षरता 74% के आस-पास है। ऐसे में क्या न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता आठवीं पास भी नहीं रखी जा सकती? संविधान सभा के इस मामले में सन्दर्भ को समझिये और वक़्त को ध्यान में रखिये, ज़रूरी नहीं कि वो आज भी प्रासंगिक है।

कुछ राज्यों ने ग्राम पंचायतों के चुनाव के लिए शैक्षणिक अनिवार्यता की है लेकिन वो भी पांचवी, आठवीं और दसवीं पास तक ही। मसलन, हरियाणा सरकार ने ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए शैक्षणिक योग्यता दसवीं पास रखी। महिलाओं और दलितों के लिए पैमाना दसवीं से कम ही रखा गया है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गयी लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले में गैर-कानूनी या भेदभाव जैसा कुछ नहीं लगा। हालांकि ये फैसला दो जजों की बेंच ने ही दिया था। इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में कहा है कि चुनाव लड़ना कानूनी अधिकार है, संवैधानिक नहीं। कुछ फैसलों में इसे संवैधानिक भी कहा गया। लेकिन राजबाला vs स्टेट ऑफ़ हरियाणा में सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम पंचायत में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को सही ठहराया। इस फैसले की आलोचना भी हुई जिसमें मुख्य बिंदु यही रहा कि एक बड़े तबके का चुनाव लड़ने का अधिकार छीन लिया गया। लेकिन ये अधिकार किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है और ना ही इसे कोई साबित कर पाया। संविधान के आर्टिकल 243F के अनुसार अगर राज्य ने ऐसा कोई कानून बनाया है जिससे ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अयोग्य घोषित होता है तो ये जायज़ है। किस आधार पर इसे असंवैधानिक बताया जा रहा है। इस फैसले के बाद मौजूदा प्रधान दसवीं की परीक्षा दे रहे हैं क्योंकि अगली बार उन्हें चुनाव लड़ने में दिक्कत हो सकती है। इसका तो स्वागत होना चाहिए।

हालांकि इस कानून को बनाने वाली हरियाणा सरकार की विधानसभा के अपने कुछ विधायकों के पास ये पात्रता नहीं है। ऐसे मैं ये भी ज़रूरी होता है कि विधायकों और सांसदों के लिए भी एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शुरुआत की जाये।

क्या एक प्रतिनिधि के लिए आठवीं और दसवीं पास करना भी दूभर है? देश में ओपन स्कूल भी चल रहे हैं। हक़ छीना नहीं जा रहा, आपको हक़ के लिए मेहनत करने को कहा जा रहा है जैसे देश में तमाम सरकारी नौकरियों और अलग-अलग पेशों के लिए योग्यता निर्धारित की गयी है। ये योग्यता कुछ छूट के साथ दलित, पिछड़ों, आदिवासी सबके लिए है। अगर दलितों और आदिवासियों को इस मामले में हानि हो रही है तो फिर बाकी क्षेत्रों में भी हो रही होगी। तो सिर्फ राजनीतिज्ञों के लिए ही छूट क्यों ली जा रही है? हालाँकि सभी क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था है।

ये भी गौर करने वाली बात है कि कैसे लोग हमारे लोकतंत्र में प्रतिनिधि बन रहे हैं, ये 'कास्ट' से ज़्यादा 'क्लास' निर्धारित करती है। पैसे वाला ही चुनाव लड़ पा रहा है। टिकट उसी को मिल पा रही है या किसी नेता के बहुत ख़ास व्यक्ति को। रिश्तेदार तो पहली पसंद हैं ही। सहानुभूति पैदा करने के लिए एक और आयाम दिखाया जाता है कि प्रत्याशी दलित है, पिछड़ा है, मुस्लिम है। उसका कम पढ़ा-लिखा होना जायज़ ठहराने की कोशिश भी होती है। याद कीजिये कि आज कितने ऐसे राजनेता हैं जो सच में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक की ज़िन्दगी जी रहे हैं। उत्तर प्रदेश चुनावों में पहले चरण में 231 करोड़पति उम्मीदवार खड़े हुए। इनमें बसपा के 52 करोड़पति उम्मीदवार थे, 44 सपा+कांग्रेस के और इनमें मुस्लिम और पिछड़े और दलित सब हैं। सालों से आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का रिकॉर्ड बनता आ रहा है और लगभग सभी दल ऐसे उम्मीदवारों का पार्टी में स्वागत करते हैं, फिर चाहे उस पार्टी की छवि गरीबों के रहनुमा की हो या दलितों/पिछड़ों/अल्पसंख्यकों के रहनुमा की।

बिहार के मंत्री तेजस्वी यादव को किस बात की कमी रह गयी कि वो आठवीं तक ही पढ़ पाए। सिर्फ तेजस्वी यादव ही क्यों, और भी कई समृद्ध पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि कम-पढ़े लिखे या अनपढ़ मिल जायेंगे। क्यों किसी पढ़े-लिखे दलित/पिछड़ी/गरीब पृष्ठभूमि के नौकरशाह को या कर्मचारी को मजबूर किया जाये कि वो ऐसे मंत्री/सांसद/विधायक के मातहत काम करे।जिस तरह के प्रतिनिधि हमें राज्य और केंद्र में मिल रहे हैं, उन्हें देख कर कतई नहीं लग रहा कि उन्हें दसवीं या बारहवीं पास भी नहीं होना चाहिए। किस हिसाब से कुछ लोगों को लग रहा है कि एक आम गरीब पिछड़ा व्यक्ति या आदिवासी आसानी से चुनाव लड़ने का अपना हक़ ले पा रहा है, जीत पा रहा है और उसके दसवीं पास होने की शर्त उसे रोक लेगी।

आज हर बसपा, सपा, जदयू, शिवसेना, बीजेपी आदि का उम्मीदवार सोशल मीडिया पर आने की कोशिश कर रहा है। ये कौनसी स्थिति की बात की जा रही है जहाँ पांचवी पास होना भी अनिवार्य नहीं हो सकता।

एक अजीब सा तर्क दिया जाता है कि किसी अनपढ़ ने भ्रष्टाचार नहीं किया। खैर, ये तो एक रिसर्च का विषय है। चलिए, मान लिया जाये कि पढ़े-लिखे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त थे, लेकिन क्या भ्रष्टाचार करने की वजह उनका पढ़ा-लिखा होना है? दूसरा सवाल ये भी उठता है कि क्या अनपढ़ लोग भ्रष्टाचार पकड़ पाते हैं? उसे रोक पाएंगे?

Representation of the People Act, 1951 में संशोधन किया जा सकता है और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को शामिल किया जा सकता है लेकिन दिलचस्पी कोई नहीं ले रहा और ज़ाहिर है ग्राम पंचायत के चुनावी नियम की तमाम आलोचनाओं के बीच कोई दबाव भी बनाया नहीं जा रहा।

जब भी हम मुस्लिमों का ज़िक्र करते हैं तब हम उनकी शिक्षा के लिए बड़े फिक्रमंद हो जाते हैं। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट को लागू करने की बात करते हैं। लेकिन मुसलमानों के प्रतिनिधि जब खुद शिक्षा को कुछ नहीं समझेंगे तब अपने समाज में बदलाव क्या लाएंगे। अम्बेडकर भी शिक्षित होकर ही दलितों का प्रतिनिधित्व बेहतर कर सके। सावित्रीबाई फुले क्यों शिक्षा के लिए लोगों का कीचड़ झेल रहीं थीं अगर देश को शिक्षित प्रतिनिधियों की ज़रुरत नहीं। चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि राजनीतिक समझ होना एक अलग बात है, उसके लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं। लेकिन क्या सिर्फ वोट बटोरने तक की ही राजनीतिक समझ ज़रूरी है? गवर्नेंस के बारे में क्या ख्याल है!

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मायावती और मीडिया

akb     इन दिनों मायावती की चर्चा इस बात पर काफी हो रही है कि मीडिया में उनकी चर्चा नहीं हो रही। खुद मायावती भी इसे अब अपनी रैलियों में कहने लगी हैं। रैलियों में जाकर महसूस किया कि मायावती जिस समाज से आती हैं, उस समाज के लोग उन्हें बहुत आशा भरी निगाहों से देखते हैं, उन्हें किसी हीरो की तरह मानते हैं। मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जायेगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं। मूर्तियां और पत्थर लगाने से कई लोगों को नाराज़गी रही। लेकिन किसी लोकप्रिय नेता के नाम पर कब्ज़ा कर लेना और फिर मूर्तियां लगवा देना इस देश के सभी राजनीतिक दलों की राजनीति का हिस्सा रहा है। मायावती ने जो जगहें बनवायीं वो आज लोगों के काम भी आ रही हैं। जैसे हरियाणा में ताऊ देवीलाल पार्क लगभग सभी ज़िलों में मौजूद है। लेकिन जीते-जी खुद की मूर्ति लगवाना भी अपने आप में एक अलग घटना थी। मायावती को बारीक नज़र से तब भी देखा गया जब उन्होंने 2007 में अपने दम पर सरकार बनायी। उनके हेयर स्टाइल से लेकर उनके पर्स तक पर आर्टिकल लिखे गए। नोटों की माला पर तंज किये गए। बेशक़ मायावती का ये आचरण अगड़ी जाति वालों को और मीडिया को चुभा होगा लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि उस बदलाव में एक रिवोल्ट यानि विद्रोह छुपा हुआ था। उनका ऐसा करना दलित समाज में एक आत्मविश्वास भर रहा था। ये देश के लिए एक ऐतिहासिक मंज़र था जब एक दलित महिला अगड़ी जाति के समर्थन के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई। महिला होने पर ज़ोर है क्योंकि जयललिता हों या ममता बैनर्जी हों, पुरुष सत्ता से लड़ना इतना आसान कभी नहीं रहा जहाँ कानून बनाने वालों ने किसी महिला नेत्री की साड़ी खींची और कभी किसी के बाल खींचे। इस पूरे पक्ष को मीडिया ने महसूस कम किया। मीडिया को कम से कम इस पहलू के लिए हमेशा ही मायावती और वंचित समाज के दूसरे नेताओं को बढ़त देनी चाहिए। उनके संघर्ष को आप दूसरे किसी नेता के समकक्ष नहीं रख सकते। दलित समाज के लिए तो ये बड़ी बात थी ही। उनके समाज का नेता हेलीकॉप्टर में आ रहा है। महँगे जूते पहन रहा है। शान से चल रहा है। लेकिन जब मायावती की सरकार पर भ्रष्टाचार के दाग लगे तो ये पहलू और हल्का पड़ता चला गया। 'नेशनल रूरल हेल्थ मिशन' में कैग ने 4900 करोड़ का घोटाला पकड़ा जिसके बाद मायावती के दो मंत्रियों को इस्तीफा भी देना पड़ा। ये घोटाला सुर्ख़ियों में आया जब उत्तर प्रदेश में दो चीफ मेडिकल अफसरों की संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी। परिवार कल्याण मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा को जेल भी काटनी पड़ी। इसके अलावा स्वास्थ्य मंत्री रहे अनंत कुमार मिश्रा पर सीबीआई जांच भी चल ही रही है। मिश्रा के साथ महेंद्र पांडेय और गुड्डू खान घोटाले में हाथ बंटाते थे। 779 एम्बुलेंस खरीदी गयी जिनमें से 600 तो टाटा मोटर्स के यार्ड में ही खड़ी रहीं। आज की तारीख में हम सब जानते हैं कि देश के कितने हिस्सों में एम्बुलेंस का अभाव किस समाज को झेलना पड़ता है। कितने लोगों को अपने परिजनों की शव को कंधे पर ढो कर चलना पड़ता है। कुशवाहा वोट के लिए समाजवादी पार्टी ने उनकी पत्नी और भाई को अपने साथ शामिल किया और बीजेपी ने भी खुद बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल किया लेकिन कड़ी आलोचना के बाद निकाल दिया। मायावती ने पहले मुख़्तार अंसारी को उनके आपराधिक मामलों की वजह से 2010 में निकाला और अब फिर से शामिल कर लिया है। भाजपा तो अपनी एंटी-मुस्लिम छवि के लिए शर्मिंदा भी नहीं होती बल्कि उसे और भुना रही है। राजनीति यही है। अपनी मनचाही पार्टी को आप बरी कर लें। मायावती का हेलीकाप्टर में आना और शानो-शौकत को अब लोग देख चुके हैं। वो तिलिस्म अब काम नहीं करेगा। मायावती को देखना होगा कि वाल्मीकि समाज उनसे क्यों छिटक गया। उस समाज से कितने लोगों को इस बार उन्होंने टिकट दी। क्यों वाल्मीकि समाज ने 2014 में किसी और पार्टी को वोट दी। क्यों वाल्मीकि नेता दर्शन रत्न रावण का कहना है कि मायावती मजबूरी हैं। दलित समाज का नेता सबसे पहले भाजपा का ही रुख क्यों करता है। क्या ऊना और रोहित वेमुला मामले में मायावती ने अगुवाई करना गैर-ज़रूरी समझा? मायावती राजनीतिक हमले तो कर रही हैं लेकिन विचारधारा के सवाल पर कमज़ोर पड़ रही हैं। वो मुसलमानों को टिकट तो दे रही हैं लेकिन उनके मुद्दों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही हैं। नामलेवा के लिए तो नरेंद्र मोदी ने भी कह ही दिया था कि वो पिछड़ी जाति से हैं। जहाँ तक मीडिया में कवरेज की बात है तो ये मीडिया को मायावती के लिए नहीं करना है। मीडिया को ये उस वंचित समाज के लिए करना है जिसकी असुरक्षा की भावना को राजनेता उभारते हैं। मीडिया एंटी-दलित है या प्रो-दलित है, इसका फैसला कैसे हो पायेगा जब प्रधानमंत्री मोदी एक मंच से मीडिया का मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं कि मीडिया वाले हैडलाइन लगाते हैं कि बीएमडब्ल्यू कार ने दलित को कुचला। ये एक सच्चाई तो है कि मायावती को दूसरे नेताओं की अपेक्षा कम कवरेज दिया जा रहा है। इस बात के पीछे मीडिया का एलीटिस्म यानी कुलीन आचरण भी हो सकता है और मायावती का मीडिया से दूर रहना भी। मीडिया से जुड़कर, कई प्रवक्ता बनाकर अपनी विचारधारा को मज़बूती से पेश किया जा सकता है। हर वोटर की अपनी-अपनी नज़र होती है और अपनी-अपनी प्राथमिकताएं। विकल्पों के अभाव में कभी वोटर इधर चला जाता है और कभी उधर। हार-जीत अलग बात है लेकिन समीक्षा तो होगी ही। मायावती की आलोचना को अब सिर्फ दलित-विरोधी कह कर नहीं टाला जाना चाहिए। उन्हें इन सवालों को एड्रेस करना ही होगा। वरना किसी ज़माने में अधर्मी के टैग लगते ही थे और इस ज़माने में देशद्रोही के लगते ही हैं। एक और सही।

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मायावती और मीडिया

akb     इन दिनों मायावती की चर्चा इस बात पर काफी हो रही है कि मीडिया में उनकी चर्चा नहीं हो रही। खुद मायावती भी इसे अब अपनी रैलियों में कहने लगी हैं। रैलियों में जाकर महसूस किया कि मायावती जिस समाज से आती हैं, उस समाज के लोग उन्हें बहुत आशा भरी निगाहों से देखते हैं, उन्हें किसी हीरो की तरह मानते हैं। मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जायेगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं। मूर्तियां और पत्थर लगाने से कई लोगों को नाराज़गी रही। लेकिन किसी लोकप्रिय नेता के नाम पर कब्ज़ा कर लेना और फिर मूर्तियां लगवा देना इस देश के सभी राजनीतिक दलों की राजनीति का हिस्सा रहा है। मायावती ने जो जगहें बनवायीं वो आज लोगों के काम भी आ रही हैं। जैसे हरियाणा में ताऊ देवीलाल पार्क लगभग सभी ज़िलों में मौजूद है। लेकिन जीते-जी खुद की मूर्ति लगवाना भी अपने आप में एक अलग घटना थी। मायावती को बारीक नज़र से तब भी देखा गया जब उन्होंने 2007 में अपने दम पर सरकार बनायी। उनके हेयर स्टाइल से लेकर उनके पर्स तक पर आर्टिकल लिखे गए। नोटों की माला पर तंज किये गए। बेशक़ मायावती का ये आचरण अगड़ी जाति वालों को और मीडिया को चुभा होगा लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि उस बदलाव में एक रिवोल्ट यानि विद्रोह छुपा हुआ था। उनका ऐसा करना दलित समाज में एक आत्मविश्वास भर रहा था। ये देश के लिए एक ऐतिहासिक मंज़र था जब एक दलित महिला अगड़ी जाति के समर्थन के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई। महिला होने पर ज़ोर है क्योंकि जयललिता हों या ममता बैनर्जी हों, पुरुष सत्ता से लड़ना इतना आसान कभी नहीं रहा जहाँ कानून बनाने वालों ने किसी महिला नेत्री की साड़ी खींची और कभी किसी के बाल खींचे। इस पूरे पक्ष को मीडिया ने महसूस कम किया। मीडिया को कम से कम इस पहलू के लिए हमेशा ही मायावती और वंचित समाज के दूसरे नेताओं को बढ़त देनी चाहिए। उनके संघर्ष को आप दूसरे किसी नेता के समकक्ष नहीं रख सकते। दलित समाज के लिए तो ये बड़ी बात थी ही। उनके समाज का नेता हेलीकॉप्टर में आ रहा है। महँगे जूते पहन रहा है। शान से चल रहा है। लेकिन जब मायावती की सरकार पर भ्रष्टाचार के दाग लगे तो ये पहलू और हल्का पड़ता चला गया। 'नेशनल रूरल हेल्थ मिशन' में कैग ने 4900 करोड़ का घोटाला पकड़ा जिसके बाद मायावती के दो मंत्रियों को इस्तीफा भी देना पड़ा। ये घोटाला सुर्ख़ियों में आया जब उत्तर प्रदेश में दो चीफ मेडिकल अफसरों की संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी। परिवार कल्याण मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा को जेल भी काटनी पड़ी। इसके अलावा स्वास्थ्य मंत्री रहे अनंत कुमार मिश्रा पर सीबीआई जांच भी चल ही रही है। मिश्रा के साथ महेंद्र पांडेय और गुड्डू खान घोटाले में हाथ बंटाते थे। 779 एम्बुलेंस खरीदी गयी जिनमें से 600 तो टाटा मोटर्स के यार्ड में ही खड़ी रहीं। आज की तारीख में हम सब जानते हैं कि देश के कितने हिस्सों में एम्बुलेंस का अभाव किस समाज को झेलना पड़ता है। कितने लोगों को अपने परिजनों की शव को कंधे पर ढो कर चलना पड़ता है। कुशवाहा वोट के लिए समाजवादी पार्टी ने उनकी पत्नी और भाई को अपने साथ शामिल किया और बीजेपी ने भी खुद बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल किया लेकिन कड़ी आलोचना के बाद निकाल दिया। मायावती ने पहले मुख़्तार अंसारी को उनके आपराधिक मामलों की वजह से 2010 में निकाला और अब फिर से शामिल कर लिया है। भाजपा तो अपनी एंटी-मुस्लिम छवि के लिए शर्मिंदा भी नहीं होती बल्कि उसे और भुना रही है। राजनीति यही है। अपनी मनचाही पार्टी को आप बरी कर लें। मायावती का हेलीकाप्टर में आना और शानो-शौकत को अब लोग देख चुके हैं। वो तिलिस्म अब काम नहीं करेगा। मायावती को देखना होगा कि वाल्मीकि समाज उनसे क्यों छिटक गया। उस समाज से कितने लोगों को इस बार उन्होंने टिकट दी। क्यों वाल्मीकि समाज ने 2014 में किसी और पार्टी को वोट दी। क्यों वाल्मीकि नेता दर्शन रत्न रावण का कहना है कि मायावती मजबूरी हैं। दलित समाज का नेता सबसे पहले भाजपा का ही रुख क्यों करता है। क्या ऊना और रोहित वेमुला मामले में मायावती ने अगुवाई करना गैर-ज़रूरी समझा? मायावती राजनीतिक हमले तो कर रही हैं लेकिन विचारधारा के सवाल पर कमज़ोर पड़ रही हैं। वो मुसलमानों को टिकट तो दे रही हैं लेकिन उनके मुद्दों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही हैं। नामलेवा के लिए तो नरेंद्र मोदी ने भी कह ही दिया था कि वो पिछड़ी जाति से हैं। जहाँ तक मीडिया में कवरेज की बात है तो ये मीडिया को मायावती के लिए नहीं करना है। मीडिया को ये उस वंचित समाज के लिए करना है जिसकी असुरक्षा की भावना को राजनेता उभारते हैं। मीडिया एंटी-दलित है या प्रो-दलित है, इसका फैसला कैसे हो पायेगा जब प्रधानमंत्री मोदी एक मंच से मीडिया का मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं कि मीडिया वाले हैडलाइन लगाते हैं कि बीएमडब्ल्यू कार ने दलित को कुचला। ये एक सच्चाई तो है कि मायावती को दूसरे नेताओं की अपेक्षा कम कवरेज दिया जा रहा है। इस बात के पीछे मीडिया का एलीटिस्म यानी कुलीन आचरण भी हो सकता है और मायावती का मीडिया से दूर रहना भी। मीडिया से जुड़कर, कई प्रवक्ता बनाकर अपनी विचारधारा को मज़बूती से पेश किया जा सकता है। हर वोटर की अपनी-अपनी नज़र होती है और अपनी-अपनी प्राथमिकताएं। विकल्पों के अभाव में कभी वोटर इधर चला जाता है और कभी उधर। हार-जीत अलग बात है लेकिन समीक्षा तो होगी ही। मायावती की आलोचना को अब सिर्फ दलित-विरोधी कह कर नहीं टाला जाना चाहिए। उन्हें इन सवालों को एड्रेस करना ही होगा। वरना किसी ज़माने में अधर्मी के टैग लगते ही थे और इस ज़माने में देशद्रोही के लगते ही हैं। एक और सही।

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मायावती और मीडिया

akb     इन दिनों मायावती की चर्चा इस बात पर काफी हो रही है कि मीडिया में उनकी चर्चा नहीं हो रही। खुद मायावती भी इसे अब अपनी रैलियों में कहने लगी हैं। रैलियों में जाकर महसूस किया कि मायावती जिस समाज से आती हैं, उस समाज के लोग उन्हें बहुत आशा भरी निगाहों से देखते हैं, उन्हें किसी हीरो की तरह मानते हैं। मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जायेगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं। मूर्तियां और पत्थर लगाने से कई लोगों को नाराज़गी रही। लेकिन किसी लोकप्रिय नेता के नाम पर कब्ज़ा कर लेना और फिर मूर्तियां लगवा देना इस देश के सभी राजनीतिक दलों की राजनीति का हिस्सा रहा है। मायावती ने जो जगहें बनवायीं वो आज लोगों के काम भी आ रही हैं। जैसे हरियाणा में ताऊ देवीलाल पार्क लगभग सभी ज़िलों में मौजूद है। लेकिन जीते-जी खुद की मूर्ति लगवाना भी अपने आप में एक अलग घटना थी। मायावती को बारीक नज़र से तब भी देखा गया जब उन्होंने 2007 में अपने दम पर सरकार बनायी। उनके हेयर स्टाइल से लेकर उनके पर्स तक पर आर्टिकल लिखे गए। नोटों की माला पर तंज किये गए। बेशक़ मायावती का ये आचरण अगड़ी जाति वालों को और मीडिया को चुभा होगा लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि उस बदलाव में एक रिवोल्ट यानि विद्रोह छुपा हुआ था। उनका ऐसा करना दलित समाज में एक आत्मविश्वास भर रहा था। ये देश के लिए एक ऐतिहासिक मंज़र था जब एक दलित महिला अगड़ी जाति के समर्थन के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई। महिला होने पर ज़ोर है क्योंकि जयललिता हों या ममता बैनर्जी हों, पुरुष सत्ता से लड़ना इतना आसान कभी नहीं रहा जहाँ कानून बनाने वालों ने किसी महिला नेत्री की साड़ी खींची और कभी किसी के बाल खींचे। इस पूरे पक्ष को मीडिया ने महसूस कम किया। मीडिया को कम से कम इस पहलू के लिए हमेशा ही मायावती और वंचित समाज के दूसरे नेताओं को बढ़त देनी चाहिए। उनके संघर्ष को आप दूसरे किसी नेता के समकक्ष नहीं रख सकते। दलित समाज के लिए तो ये बड़ी बात थी ही। उनके समाज का नेता हेलीकॉप्टर में आ रहा है। महँगे जूते पहन रहा है। शान से चल रहा है। लेकिन जब मायावती की सरकार पर भ्रष्टाचार के दाग लगे तो ये पहलू और हल्का पड़ता चला गया। 'नेशनल रूरल हेल्थ मिशन' में कैग ने 4900 करोड़ का घोटाला पकड़ा जिसके बाद मायावती के दो मंत्रियों को इस्तीफा भी देना पड़ा। ये घोटाला सुर्ख़ियों में आया जब उत्तर प्रदेश में दो चीफ मेडिकल अफसरों की संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी। परिवार कल्याण मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा को जेल भी काटनी पड़ी। इसके अलावा स्वास्थ्य मंत्री रहे अनंत कुमार मिश्रा पर सीबीआई जांच भी चल ही रही है। मिश्रा के साथ महेंद्र पांडेय और गुड्डू खान घोटाले में हाथ बंटाते थे। 779 एम्बुलेंस खरीदी गयी जिनमें से 620 तो टाटा मोटर्स के यार्ड में ही खड़ी रहीं। आज की तारीख में हम सब जानते हैं कि देश के कितने हिस्सों में एम्बुलेंस का अभाव किस समाज को झेलना पड़ता है। कितने लोगों को अपने परिजनों की शव को कंधे पर ढो कर चलना पड़ता है। कुशवाहा वोट के लिए समाजवादी पार्टी ने उनकी पत्नी और भाई को अपने साथ शामिल किया और बीजेपी ने भी खुद बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल किया लेकिन कड़ी आलोचना के बाद निकाल दिया। मायावती ने पहले मुख़्तार अंसारी को उनके आपराधिक मामलों की वजह से 2010 में निकाला और अब फिर से शामिल कर लिया है। भाजपा तो अपनी एंटी-मुस्लिम छवि के लिए शर्मिंदा भी नहीं होती बल्कि उसे और भुना रही है। राजनीति यही है। अपनी मनचाही पार्टी को आप बरी कर लें। मायावती का हेलीकाप्टर में आना और शानो-शौकत को अब लोग देख चुके हैं। वो तिलिस्म अब काम नहीं करेगा। मायावती को देखना होगा कि वाल्मीकि समाज उनसे क्यों छिटक गया। उस समाज से कितने लोगों को उन्होंने टिकट दी। क्या ऊना और रोहित वेमुला मामले में मायावती ने अगुवाई करना गैर-ज़रूरी समझा? मायावती राजनीतिक हमले तो कर रही हैं लेकिन विचारधारा के सवाल पर कमज़ोर पड़ रही हैं। वो मुसलमानों को टिकट तो दे रही हैं लेकिन उनके मुद्दों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही हैं। नामलेवा के लिए तो नरेंद्र मोदी ने भी कह ही दिया था कि वो पिछड़ी जाति से हैं। जहाँ तक मीडिया में कवरेज की बात है तो ये मीडिया को मायावती के लिए नहीं करना है। मीडिया को ये उस वंचित समाज के लिए करना है जिसकी असुरक्षा की भावना को राजनेता उभारते हैं। मीडिया एंटी-दलित है या प्रो-दलित है, इसका फैसला कैसे हो पायेगा जब प्रधानमंत्री मोदी एक मंच से मीडिया का मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं कि मीडिया वाले हैडलाइन लगाते हैं कि बीएमडब्ल्यू कार ने दलित को कुचला। ये एक सच्चाई तो है कि मायावती को दूसरे नेताओं की अपेक्षा कम कवरेज दिया जा रहा है। इस बात के पीछे मीडिया का एलीटिस्म यानी कुलीन आचरण भी हो सकता है और मायावती का मीडिया से दूर रहना भी। मीडिया से जुड़कर, कई प्रवक्ता बनाकर अपनी विचारधारा को मज़बूती से पेश किया जा सकता है। हर वोटर की अपनी-अपनी नज़र होती है और अपनी-अपनी प्राथमिकताएं। विकल्पों के अभाव में कभी वोटर इधर चला जाता है और कभी उधर। हार-जीत अलग बात है लेकिन समीक्षा तो होगी ही। मायावती की आलोचना को अब सिर्फ दलित-विरोधी कह कर नहीं टाला जाना चाहिए। उन्हें इन सवालों को एड्रेस करना ही होगा। वरना किसी ज़माने में अधर्मी के टैग लगते ही थे और इस ज़माने में देशद्रोही के लगते ही हैं। एक और सही।

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मायावती और मीडिया

akb     इन दिनों मायावती की चर्चा इस बात पर काफी हो रही है कि मीडिया में उनकी चर्चा नहीं हो रही। खुद मायावती भी इसे अब अपनी रैलियों में कहने लगी हैं। रैलियों में जाकर महसूस किया कि मायावती जिस समाज से आती हैं, उस समाज के लोग उन्हें बहुत आशा भरी निगाहों से देखते हैं, उन्हें किसी हीरो की तरह मानते हैं। मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जायेगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं। मूर्तियां और पत्थर लगाने से कई लोगों को नाराज़गी रही। लेकिन किसी लोकप्रिय नेता के नाम पर कब्ज़ा कर लेना और फिर मूर्तियां लगवा देना इस देश के सभी राजनीतिक दलों की राजनीति का हिस्सा रहा है। मायावती ने जो जगहें बनवायीं वो आज लोगों के काम भी आ रही हैं। जैसे हरियाणा में ताऊ देवीलाल पार्क लगभग सभी ज़िलों में मौजूद है। लेकिन जीते-जी खुद की मूर्ति लगवाना भी अपने आप में एक अलग घटना थी। मायावती को बारीक नज़र से तब भी देखा गया जब उन्होंने 2007 में अपने दम पर सरकार बनायी। उनके हेयर स्टाइल से लेकर उनके पर्स तक पर आर्टिकल लिखे गए। नोटों की माला पर तंज किये गए। बेशक़ मायावती का ये आचरण अगड़ी जाति वालों को और मीडिया को चुभा होगा लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि उस बदलाव में एक रिवोल्ट यानि विद्रोह छुपा हुआ था। उनका ऐसा करना दलित समाज में एक आत्मविश्वास भर रहा था। ये देश के लिए एक ऐतिहासिक मंज़र था जब एक दलित महिला अगड़ी जाति के समर्थन के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई। महिला होने पर ज़ोर है क्योंकि जयललिता हों या ममता बैनर्जी हों, पुरुष सत्ता से लड़ना इतना आसान कभी नहीं रहा जहाँ कानून बनाने वालों ने किसी महिला नेत्री की साड़ी खींची और कभी किसी के बाल खींचे। इस पूरे पक्ष को मीडिया ने महसूस कम किया। मीडिया को कम से कम इस पहलू के लिए हमेशा ही मायावती और वंचित समाज के दूसरे नेताओं को बढ़त देनी चाहिए। उनके संघर्ष को आप दूसरे किसी नेता के समकक्ष नहीं रख सकते। दलित समाज के लिए तो ये बड़ी बात थी ही। उनके समाज का नेता हेलीकॉप्टर में आ रहा है। महँगे जूते पहन रहा है। शान से चल रहा है। लेकिन जब मायावती की सरकार पर भ्रष्टाचार के दाग लगे तो ये पहलू और हल्का पड़ता चला गया। 'नेशनल रूरल हेल्थ मिशन' में कैग ने 4900 करोड़ का घोटाला पकड़ा जिसके बाद मायावती के दो मंत्रियों को इस्तीफा भी देना पड़ा। ये घोटाला सुर्ख़ियों में आया जब उत्तर प्रदेश में दो चीफ मेडिकल अफसरों की संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी। परिवार कल्याण मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा को जेल भी काटनी पड़ी। इसके अलावा स्वास्थ्य मंत्री रहे अनंत कुमार मिश्रा पर सीबीआई जांच भी चल ही रही है। मिश्रा के साथ महेंद्र पांडेय और गुड्डू खान घोटाले में हाथ बंटाते थे। 779 एम्बुलेंस खरीदी गयी जिनमें से 600 तो टाटा मोटर्स के यार्ड में ही खड़ी रहीं। आज की तारीख में हम सब जानते हैं कि देश के कितने हिस्सों में एम्बुलेंस का अभाव किस समाज को झेलना पड़ता है। कितने लोगों को अपने परिजनों की शव को कंधे पर ढो कर चलना पड़ता है। कुशवाहा वोट के लिए समाजवादी पार्टी ने उनकी पत्नी और भाई को अपने साथ शामिल किया और बीजेपी ने भी खुद बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल किया लेकिन कड़ी आलोचना के बाद निकाल दिया। मायावती ने पहले मुख़्तार अंसारी को उनके आपराधिक मामलों की वजह से 2010 में निकाला और अब फिर से शामिल कर लिया है। भाजपा तो अपनी एंटी-मुस्लिम छवि के लिए शर्मिंदा भी नहीं होती बल्कि उसे और भुना रही है। राजनीति यही है। अपनी मनचाही पार्टी को आप बरी कर लें। मायावती का हेलीकाप्टर में आना और शानो-शौकत को अब लोग देख चुके हैं। वो तिलिस्म अब काम नहीं करेगा। मायावती को देखना होगा कि वाल्मीकि समाज उनसे क्यों छिटक गया। उस समाज से कितने लोगों को उन्होंने टिकट दी। क्या ऊना और रोहित वेमुला मामले में मायावती ने अगुवाई करना गैर-ज़रूरी समझा? मायावती राजनीतिक हमले तो कर रही हैं लेकिन विचारधारा के सवाल पर कमज़ोर पड़ रही हैं। वो मुसलमानों को टिकट तो दे रही हैं लेकिन उनके मुद्दों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही हैं। नामलेवा के लिए तो नरेंद्र मोदी ने भी कह ही दिया था कि वो पिछड़ी जाति से हैं। जहाँ तक मीडिया में कवरेज की बात है तो ये मीडिया को मायावती के लिए नहीं करना है। मीडिया को ये उस वंचित समाज के लिए करना है जिसकी असुरक्षा की भावना को राजनेता उभारते हैं। मीडिया एंटी-दलित है या प्रो-दलित है, इसका फैसला कैसे हो पायेगा जब प्रधानमंत्री मोदी एक मंच से मीडिया का मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं कि मीडिया वाले हैडलाइन लगाते हैं कि बीएमडब्ल्यू कार ने दलित को कुचला। ये एक सच्चाई तो है कि मायावती को दूसरे नेताओं की अपेक्षा कम कवरेज दिया जा रहा है। इस बात के पीछे मीडिया का एलीटिस्म यानी कुलीन आचरण भी हो सकता है और मायावती का मीडिया से दूर रहना भी। मीडिया से जुड़कर, कई प्रवक्ता बनाकर अपनी विचारधारा को मज़बूती से पेश किया जा सकता है। हर वोटर की अपनी-अपनी नज़र होती है और अपनी-अपनी प्राथमिकताएं। विकल्पों के अभाव में कभी वोटर इधर चला जाता है और कभी उधर। हार-जीत अलग बात है लेकिन समीक्षा तो होगी ही। मायावती की आलोचना को अब सिर्फ दलित-विरोधी कह कर नहीं टाला जाना चाहिए। उन्हें इन सवालों को एड्रेस करना ही होगा। वरना किसी ज़माने में अधर्मी के टैग लगते ही थे और इस ज़माने में देशद्रोही के लगते ही हैं। एक और सही।

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मायावती और मीडिया

akb     इन दिनों मायावती की चर्चा इस बात पर काफी हो रही है कि मीडिया में उनकी चर्चा नहीं हो रही। खुद मायावती भी इसे अब अपनी रैलियों में कहने लगी हैं। रैलियों में जाकर महसूस किया कि मायावती जिस समाज से आती हैं, उस समाज के लोग उन्हें बहुत आशा भरी निगाहों से देखते हैं, उन्हें किसी हीरो की तरह मानते हैं। मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जायेगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं। मूर्तियां और पत्थर लगाने से कई लोगों को नाराज़गी रही। लेकिन किसी लोकप्रिय नेता के नाम पर कब्ज़ा कर लेना और फिर मूर्तियां लगवा देना इस देश के सभी राजनीतिक दलों की राजनीति का हिस्सा रहा है। मायावती ने जो जगहें बनवायीं वो आज लोगों के काम भी आ रही हैं। जैसे हरियाणा में ताऊ देवीलाल पार्क लगभग सभी ज़िलों में मौजूद है। लेकिन जीते-जी खुद की मूर्ति लगवाना भी अपने आप में एक अलग घटना थी। मायावती को बारीक नज़र से तब भी देखा गया जब उन्होंने 2007 में अपने दम पर सरकार बनायी। उनके हेयर स्टाइल से लेकर उनके पर्स तक पर आर्टिकल लिखे गए। नोटों की माला पर तंज किये गए। बेशक़ मायावती का ये आचरण अगड़ी जाति वालों को और मीडिया को चुभा होगा लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि उस बदलाव में एक रिवोल्ट यानि विद्रोह छुपा हुआ था। उनका ऐसा करना दलित समाज में एक आत्मविश्वास भर रहा था। ये देश के लिए एक ऐतिहासिक मंज़र था जब एक दलित महिला अगड़ी जाति के समर्थन के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई। महिला होने पर ज़ोर है क्योंकि जयललिता हों या ममता बैनर्जी हों, पुरुष सत्ता से लड़ना इतना आसान कभी नहीं रहा जहाँ कानून बनाने वालों ने किसी महिला नेत्री की साड़ी खींची और कभी किसी के बाल खींचे। इस पूरे पक्ष को मीडिया ने महसूस कम किया। मीडिया को कम से कम इस पहलू के लिए हमेशा ही मायावती और वंचित समाज के दूसरे नेताओं को बढ़त देनी चाहिए। उनके संघर्ष को आप दूसरे किसी नेता के समकक्ष नहीं रख सकते। दलित समाज के लिए तो ये बड़ी बात थी ही। उनके समाज का नेता हेलीकॉप्टर में आ रहा है। महँगे जूते पहन रहा है। शान से चल रहा है। लेकिन जब मायावती की सरकार पर भ्रष्टाचार के दाग लगे तो ये पहलू और हल्का पड़ता चला गया। 'नेशनल रूरल हेल्थ मिशन' में कैग ने 4900 करोड़ का घोटाला पकड़ा जिसके बाद मायावती के दो मंत्रियों को इस्तीफा भी देना पड़ा। ये घोटाला सुर्ख़ियों में आया जब उत्तर प्रदेश में दो चीफ मेडिकल अफसरों की संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी। परिवार कल्याण मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा को जेल भी काटनी पड़ी। इसके अलावा स्वास्थ्य मंत्री रहे अनंत कुमार मिश्रा पर सीबीआई जांच भी चल ही रही है। मिश्रा के साथ महेंद्र पांडेय और गुड्डू खान घोटाले में हाथ बंटाते थे। 779 एम्बुलेंस खरीदी गयी जिनमें से 600 तो टाटा मोटर्स के यार्ड में ही खड़ी रहीं। आज की तारीख में हम सब जानते हैं कि देश के कितने हिस्सों में एम्बुलेंस का अभाव किस समाज को झेलना पड़ता है। कितने लोगों को अपने परिजनों की शव को कंधे पर ढो कर चलना पड़ता है। कुशवाहा वोट के लिए समाजवादी पार्टी ने उनकी पत्नी और भाई को अपने साथ शामिल किया और बीजेपी ने भी खुद बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल किया लेकिन कड़ी आलोचना के बाद निकाल दिया। मायावती ने पहले मुख़्तार अंसारी को उनके आपराधिक मामलों की वजह से 2010 में निकाला और अब फिर से शामिल कर लिया है। भाजपा तो अपनी एंटी-मुस्लिम छवि के लिए शर्मिंदा भी नहीं होती बल्कि उसे और भुना रही है। राजनीति यही है। अपनी मनचाही पार्टी को आप बरी कर लें। मायावती का हेलीकाप्टर में आना और शानो-शौकत को अब लोग देख चुके हैं। वो तिलिस्म अब काम नहीं करेगा। मायावती को देखना होगा कि वाल्मीकि समाज उनसे क्यों छिटक गया। उस समाज से कितने लोगों को उन्होंने टिकट दी। क्या ऊना और रोहित वेमुला मामले में मायावती ने अगुवाई करना गैर-ज़रूरी समझा? मायावती राजनीतिक हमले तो कर रही हैं लेकिन विचारधारा के सवाल पर कमज़ोर पड़ रही हैं। वो मुसलमानों को टिकट तो दे रही हैं लेकिन उनके मुद्दों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही हैं। नामलेवा के लिए तो नरेंद्र मोदी ने भी कह ही दिया था कि वो पिछड़ी जाति से हैं। जहाँ तक मीडिया में प्रचार की बात है तो ये मीडिया को मायावती के लिए नहीं करना है। मीडिया को ये उस वंचित समाज के लिए करना है जिसकी असुरक्षा की भावना को राजनेता उभारते हैं। मीडिया एंटी-दलित है या प्रो-दलित है, इसका फैसला कैसे हो पायेगा जब प्रधानमंत्री मोदी एक मंच से मीडिया का मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं कि मीडिया वाले हैडलाइन लगाते हैं कि बीएमडब्ल्यू कार ने दलित को कुचला। ये एक सच्चाई तो है कि मायावती को दूसरे नेताओं की अपेक्षा कम कवरेज दिया जा रहा है। इस बात के पीछे मीडिया का एलीटिस्म यानी कुलीन आचरण भी हो सकता है और मायावती का मीडिया से दूर रहना भी। मीडिया से जुड़कर, कई प्रवक्ता बनाकर अपनी विचारधारा को मज़बूती से पेश किया जा सकता है। हर वोटर की अपनी-अपनी नज़र होती है और अपनी-अपनी प्राथमिकताएं। विकल्पों के अभाव में कभी वोटर इधर चला जाता है और कभी उधर। हार-जीत अलग बात है लेकिन समीक्षा तो होगी ही। मायावती की आलोचना को अब सिर्फ दलित-विरोधी कह कर नहीं टाला जाना चाहिए। उन्हें इन सवालों को एड्रेस करना ही होगा। वरना किसी ज़माने में अधर्मी के टैग लगते ही थे और इस ज़माने में देशद्रोही के लगते ही हैं। एक और सही।

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मायावती और मीडिया

akb इन दिनों मायावती की चर्चा इस बात पर काफी हो रही है कि मीडिया में उनकी चर्चा नहीं हो रही। खुद मायावती भी इसे अब अपनी रैलियों में कहने लगी हैं। रैलियों में जाकर महसूस किया कि मायावती जिस समाज से आती हैं, उस समाज के लोग उन्हें बहुत आशा भरी निगाहों से देखते हैं, उन्हें किसी हीरो की तरह मानते हैं। मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जायेगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं। मूर्तियां और पत्थर लगाने से कई लोगों को नाराज़गी रही। लेकिन किसी लोकप्रिय नेता के नाम पर कब्ज़ा कर लेना और फिर मूर्तियां लगवा देना इस देश के सभी राजनीतिक दलों की राजनीति का हिस्सा रहा है। मायावती ने जो जगहें बनवायीं वो आज लोगों के काम भी आ रही हैं। जैसे हरियाणा में ताऊ देवीलाल पार्क लगभग सभी ज़िलों में मौजूद है। लेकिन जीते-जी खुद की मूर्ति लगवाना भी अपने आप में एक अलग घटना थी। मायावती को बारीक नज़र से तब भी देखा गया जब उन्होंने 2007 में अपने दम पर सरकार बनायी। उनके हेयर स्टाइल से लेकर उनके पर्स तक पर आर्टिकल लिखे गए। नोटों की माला पर तंज किये गए। बेशक़ मायावती का ये आचरण अगड़ी जाति वालों को और मीडिया को चुभा होगा लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि उस बदलाव में एक रिवोल्ट यानि विद्रोह छुपा हुआ था। उनका ऐसा करना दलित समाज में एक आत्मविश्वास भर रहा था। ये देश के लिए एक ऐतिहासिक मंज़र था जब एक दलित महिला अगड़ी जाति के समर्थन के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई। महिला होने पर ज़ोर है क्योंकि जयललिता हों या ममता बैनर्जी हों, पुरुष सत्ता से लड़ना इतना आसान कभी नहीं रहा जहाँ कानून बनाने वालों ने किसी महिला नेत्री की साड़ी खींची और कभी किसी के बाल खींचे। इस पूरे पक्ष को मीडिया ने महसूस कम किया। मीडिया को कम से कम इस पहलू के लिए हमेशा ही मायावती और वंचित समाज के दूसरे नेताओं को बढ़त देनी चाहिए। उनके संघर्ष को आप दूसरे किसी नेता के समकक्ष नहीं रख सकते। दलित समाज के लिए तो ये बड़ी बात थी ही। उनके समाज का नेता हेलीकॉप्टर में आ रहा है। महँगे जूते पहन रहा है। शान से चल रहा है। लेकिन जब मायावती की सरकार पर भ्रष्टाचार के दाग लगे तो ये पहलू और हल्का पड़ता चला गया। 'नेशनल रूरल हेल्थ मिशन' में कैग ने 4900 करोड़ का घोटाला पकड़ा जिसके बाद मायावती के दो मंत्रियों को इस्तीफा भी देना पड़ा। ये घोटाला सुर्ख़ियों में आया जब उत्तर प्रदेश में दो चीफ मेडिकल अफसरों की संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी। परिवार कल्याण मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा को जेल भी काटनी पड़ी। इसके अलावा स्वास्थ्य मंत्री रहे अनंत कुमार मिश्रा पर सीबीआई जांच भी चल ही रही है। मिश्रा के साथ महेंद्र पांडेय और गुड्डू खान घोटाले में हाथ बंटाते थे। 779 एम्बुलेंस खरीदी गयी जिनमें से 600 तो टाटा मोटर्स के यार्ड में ही खड़ी रहीं। आज की तारीख में हम सब जानते हैं कि देश के कितने हिस्सों में एम्बुलेंस का अभाव किस समाज को झेलना पड़ता है। कितने लोगों को अपने परिजनों की शव को कंधे पर ढो कर चलना पड़ता है। कुशवाहा वोट के लिए समाजवादी पार्टी ने उनकी पत्नी और भाई को अपने साथ शामिल किया और बीजेपी ने भी खुद बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल किया लेकिन कड़ी आलोचना के बाद निकाल दिया। मायावती ने पहले मुख़्तार अंसारी को उनके आपराधिक मामलों की वजह से 2010 में निकाला और अब फिर से शामिल कर लिया है। भाजपा तो अपनी एंटी-मुस्लिम छवि के लिए शर्मिंदा भी नहीं होती बल्कि उसे और भुना रही है। राजनीति यही है। अपनी मनचाही पार्टी को आप बरी कर लें। मायावती का हेलीकाप्टर में आना और शानो-शौकत को अब लोग देख चुके हैं। वो तिलिस्म अब काम नहीं करेगा। मायावती को देखना होगा कि वाल्मीकि समाज उनसे क्यों छिटक गया। उस समाज से कितने लोगों को इस बार उन्होंने टिकट दी। क्यों वाल्मीकि समाज ने 2014 में किसी और पार्टी को वोट दी। क्यों वाल्मीकि नेता दर्शन रत्न रावण का कहना है कि मायावती मजबूरी हैं। दलित समाज का नेता सबसे पहले भाजपा का ही रुख क्यों करता है। क्या ऊना और रोहित वेमुला मामले में मायावती ने अगुवाई करना गैर-ज़रूरी समझा? मायावती राजनीतिक हमले तो कर रही हैं लेकिन विचारधारा के सवाल पर कमज़ोर पड़ रही हैं। वो मुसलमानों को टिकट तो दे रही हैं लेकिन उनके मुद्दों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही हैं। नामलेवा के लिए तो नरेंद्र मोदी ने भी कह ही दिया था कि वो पिछड़ी जाति से हैं। जहाँ तक मीडिया में कवरेज की बात है तो ये मीडिया को मायावती के लिए नहीं करना है। मीडिया को ये उस वंचित समाज के लिए करना है जिसकी असुरक्षा की भावना को राजनेता उभारते हैं। मीडिया एंटी-दलित है या प्रो-दलित है, इसका फैसला कैसे हो पायेगा जब प्रधानमंत्री मोदी एक मंच से मीडिया का मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं कि मीडिया वाले हैडलाइन लगाते हैं कि बीएमडब्ल्यू कार ने दलित को कुचला। ये एक सच्चाई तो है कि मायावती को दूसरे नेताओं की अपेक्षा कम कवरेज दिया जा रहा है। इस बात के पीछे मीडिया का एलीटिस्म यानी कुलीन आचरण भी हो सकता है और मायावती का मीडिया से दूर रहना भी। मीडिया से जुड़कर, कई प्रवक्ता बनाकर अपनी विचारधारा को मज़बूती से पेश किया जा सकता है। हर वोटर की अपनी-अपनी नज़र होती है और अपनी-अपनी प्राथमिकताएं। विकल्पों के अभाव में कभी वोटर इधर चला जाता है और कभी उधर। हार-जीत अलग बात है लेकिन समीक्षा तो होगी ही। मायावती की आलोचना को अब सिर्फ दलित-विरोधी कह कर नहीं टाला जाना चाहिए। उन्हें इन सवालों को एड्रेस करना ही होगा। वरना किसी ज़माने में अधर्मी के टैग लगते ही थे और इस ज़माने में देशद्रोही के लगते ही हैं। एक और सही।

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साक्षरता को लेकर प्रतिनिधियों को छूट क्यों? 

akb

पिछले कुछ वक़्त से नज़र आ रहा है कि राजनीति में सुधारों के पैरोकार भी उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता के मामले में बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। उनकी दलील होती है कि ये लोकतंत्र के खिलाफ है, संविधान के खिलाफ है। ये किसी गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी के लिए नुकसानदायक होगा।

जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था कि जिन अनपढ़ लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब झोंक दिया, शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता लगाकर उन्हें चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।

प्रथम प्रधानमंत्री की इस दलील से मैं बिलकुल सहमत हूँ। लेकिन क्या नेहरू आज के सन्दर्भ में भी यही कहते? उस वक़्त के स्वतंत्रता सेनानी आज चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। 1947 से 2017 के मानव संसाधन में अंतर भी आया है। उस वक़्त देश की बड़ी संख्या के लिए संसाधन मुहैया नहीं थे तो देश को ये हक़ भी नहीं था कि इस तरह की कोई अनिवार्यता थोपी जाये। तब देश के लोग 90 साल तक आज़ादी के लिए जूझ रहे थे। साक्षरता दर 12% थी। आज माहौल अलग है, संसाधन बेहतर हैं। देश की साक्षरता 74% के आस-पास है। ऐसे में क्या न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता आठवीं पास भी नहीं रखी जा सकती? संविधान सभा के इस मामले में सन्दर्भ को समझिये और वक़्त को ध्यान में रखिये, ज़रूरी नहीं कि वो आज भी प्रासंगिक है।

कुछ राज्यों ने ग्राम पंचायतों के चुनाव के लिए शैक्षणिक अनिवार्यता की है लेकिन वो भी पांचवी, आठवीं और दसवीं पास तक ही। मसलन, हरियाणा सरकार ने ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए शैक्षणिक योग्यता दसवीं पास रखी। महिलाओं और दलितों के लिए पैमाना दसवीं से कम ही रखा गया है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गयी लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले में गैर-कानूनी या भेदभाव जैसा कुछ नहीं लगा। हालांकि ये फैसला दो जजों की बेंच ने ही दिया था। इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में कहा है कि चुनाव लड़ना कानूनी अधिकार है, संवैधानिक नहीं। कुछ फैसलों में इसे संवैधानिक भी कहा गया। लेकिन राजबाला vs स्टेट ऑफ़ हरियाणा में सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम पंचायत में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को सही ठहराया। इस फैसले की आलोचना भी हुई जिसमें मुख्य बिंदु यही रहा कि एक बड़े तबके का चुनाव लड़ने का अधिकार छीन लिया गया। लेकिन ये अधिकार किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है और ना ही इसे कोई साबित कर पाया। संविधान के आर्टिकल 243F के अनुसार अगर राज्य ने ऐसा कोई कानून बनाया है जिससे ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अयोग्य घोषित होता है तो ये जायज़ है। किस आधार पर इसे असंवैधानिक बताया जा रहा है। इस फैसले के बाद मौजूदा प्रधान दसवीं की परीक्षा दे रहे हैं क्योंकि अगली बार उन्हें चुनाव लड़ने में दिक्कत हो सकती है। इसका तो स्वागत होना चाहिए।

हालांकि इस कानून को बनाने वाली हरियाणा सरकार की विधानसभा के अपने कुछ विधायकों के पास ये पात्रता नहीं है। ऐसे मैं ये भी ज़रूरी होता है कि विधायकों और सांसदों के लिए भी एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शुरुआत की जाये।

क्या एक प्रतिनिधि के लिए आठवीं और दसवीं पास करना भी दूभर है? देश में ओपन स्कूल भी चल रहे हैं। हक़ छीना नहीं जा रहा, आपको हक़ के लिए मेहनत करने को कहा जा रहा है जैसे देश में तमाम सरकारी नौकरियों और अलग-अलग पेशों के लिए योग्यता निर्धारित की गयी है। ये योग्यता कुछ छूट के साथ दलित, पिछड़ों, आदिवासी सबके लिए है। अगर दलितों और आदिवासियों को इस मामले में हानि हो रही है तो फिर बाकी क्षेत्रों में भी हो रही होगी। तो सिर्फ राजनीतिज्ञों के लिए ही छूट क्यों ली जा रही है? हालाँकि सभी क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था है।

ये भी गौर करने वाली बात है कि कैसे लोग हमारे लोकतंत्र में प्रतिनिधि बन रहे हैं, ये 'कास्ट' से ज़्यादा 'क्लास' निर्धारित करती है। पैसे वाला ही चुनाव लड़ पा रहा है। टिकट उसी को मिल पा रही है या किसी नेता के बहुत ख़ास व्यक्ति को। रिश्तेदार तो पहली पसंद हैं ही। सहानुभूति पैदा करने के लिए एक और आयाम दिखाया जाता है कि प्रत्याशी दलित है, पिछड़ा है, मुस्लिम है। उसका कम पढ़ा-लिखा होना जायज़ ठहराने की कोशिश भी होती है। याद कीजिये कि आज कितने ऐसे राजनेता हैं जो सच में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक की ज़िन्दगी जी रहे हैं। उत्तर प्रदेश चुनावों में पहले चरण में 231 करोड़पति उम्मीदवार खड़े हुए। इनमें बसपा के 52 करोड़पति उम्मीदवार थे, 44 सपा+कांग्रेस के और इनमें मुस्लिम और पिछड़े और दलित सब हैं। सालों से आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का रिकॉर्ड बनता आ रहा है और लगभग सभी दल ऐसे उम्मीदवारों का पार्टी में स्वागत करते हैं, फिर चाहे उस पार्टी की छवि गरीबों के रहनुमा की हो या दलितों/पिछड़ों/अल्पसंख्यकों के रहनुमा की।

बिहार के मंत्री तेजस्वी यादव को किस बात की कमी रह गयी कि वो आठवीं तक ही पढ़ पाए। सिर्फ तेजस्वी यादव ही क्यों, और भी कई समृद्ध पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि कम-पढ़े लिखे या अनपढ़ मिल जायेंगे। क्यों किसी पढ़े-लिखे दलित/पिछड़ी/गरीब पृष्ठभूमि के नौकरशाह को या कर्मचारी को मजबूर किया जाये कि वो ऐसे मंत्री/सांसद/विधायक के मातहत काम करे।जिस तरह के प्रतिनिधि हमें राज्य और केंद्र में मिल रहे हैं, उन्हें देख कर कतई नहीं लग रहा कि उन्हें दसवीं या बारहवीं पास भी नहीं होना चाहिए। किस हिसाब से कुछ लोगों को लग रहा है कि एक आम गरीब पिछड़ा व्यक्ति या आदिवासी आसानी से चुनाव लड़ने का अपना हक़ ले पा रहा है, जीत पा रहा है और उसके दसवीं पास होने की शर्त उसे रोक लेगी।

आज हर बसपा, सपा, जदयू, शिवसेना, बीजेपी आदि का उम्मीदवार सोशल मीडिया पर आने की कोशिश कर रहा है। ये कौनसी स्थिति की बात की जा रही है जहाँ पांचवी पास होना भी अनिवार्य नहीं हो सकता।

एक अजीब सा तर्क दिया जाता है कि किसी अनपढ़ ने भ्रष्टाचार नहीं किया। खैर, ये तो एक रिसर्च का विषय है। चलिए, मान लिया जाये कि पढ़े-लिखे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त थे, लेकिन क्या भ्रष्टाचार करने की वजह उनका पढ़ा-लिखा होना है? दूसरा सवाल ये भी उठता है कि क्या अनपढ़ लोग भ्रष्टाचार पकड़ पाते हैं? उसे रोक पाएंगे?

Representation of the People Act, 1951 में संशोधन किया जा सकता है और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को शामिल किया जा सकता है लेकिन दिलचस्पी कोई नहीं ले रहा और ज़ाहिर है ग्राम पंचायत के चुनावी नियम की तमाम आलोचनाओं के बीच कोई दबाव भी बनाया नहीं जा रहा।

जब भी हम मुस्लिमों का ज़िक्र करते हैं तब हम उनकी शिक्षा के लिए बड़े फिक्रमंद हो जाते हैं। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट को लागू करने की बात करते हैं। लेकिन मुसलमानों के प्रतिनिधि जब खुद शिक्षा को कुछ नहीं समझेंगे तब अपने समाज में बदलाव क्या लाएंगे। अम्बेडकर भी शिक्षित होकर ही दलितों का प्रतिनिधित्व बेहतर कर सके। सावित्रीबाई फुले क्यों शिक्षा के लिए लोगों का कीचड़ झेल रहीं थीं अगर देश को शिक्षित प्रतिनिधियों की ज़रुरत नहीं। चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि राजनीतिक समझ होना एक अलग बात है, उसके लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं। लेकिन क्या सिर्फ वोट बटोरने तक की ही राजनीतिक समझ ज़रूरी है? गवर्नेंस के बारे में क्या ख्याल है!

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साक्षरता को लेकर प्रतिनिधियों को छूट क्यों? 

akb

पिछले कुछ वक़्त से नज़र आ रहा है कि राजनीति में सुधारों के पैरोकार भी उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता के मामले में बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। उनकी दलील होती है कि ये लोकतंत्र के खिलाफ है, संविधान के खिलाफ है। ये किसी गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी के लिए नुकसानदायक होगा।

जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था कि जिन अनपढ़ लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब झोंक दिया, शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता लगाकर उन्हें चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।

प्रथम प्रधानमंत्री की इस दलील से मैं बिलकुल सहमत हूँ। लेकिन क्या नेहरू आज के सन्दर्भ में भी यही कहते? उस वक़्त के स्वतंत्रता सेनानी आज चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। 1947 से 2017 के मानव संसाधन में अंतर भी आया है। उस वक़्त देश की बड़ी संख्या के लिए संसाधन मुहैया नहीं थे तो देश को ये हक़ भी नहीं था कि इस तरह की कोई अनिवार्यता थोपी जाये। तब देश के लोग 90 साल तक आज़ादी के लिए जूझ रहे थे। साक्षरता दर 12% थी। आज माहौल अलग है, संसाधन बेहतर हैं। देश की साक्षरता 74% के आस-पास है। ऐसे में क्या न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता आठवीं पास भी नहीं रखी जा सकती? संविधान सभा के इस मामले में सन्दर्भ को समझिये और वक़्त को ध्यान में रखिये, ज़रूरी नहीं कि वो आज भी प्रासंगिक है।

कुछ राज्यों ने ग्राम पंचायतों के चुनाव के लिए शैक्षणिक अनिवार्यता की है लेकिन वो भी पांचवी, आठवीं और दसवीं पास तक ही। मसलन, हरियाणा सरकार ने ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए शैक्षणिक योग्यता दसवीं पास रखी। महिलाओं और दलितों के लिए पैमाना दसवीं से कम ही रखा गया है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गयी लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले में गैर-कानूनी या भेदभाव जैसा कुछ नहीं लगा। हालांकि ये फैसला दो जजों की बेंच ने ही दिया था। इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में कहा है कि चुनाव लड़ना कानूनी अधिकार है, संवैधानिक नहीं। कुछ फैसलों में इसे संवैधानिक भी कहा गया। लेकिन राजबाला vs स्टेट ऑफ़ हरियाणा में सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम पंचायत में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को सही ठहराया। इस फैसले की आलोचना भी हुई जिसमें मुख्य बिंदु यही रहा कि एक बड़े तबके का चुनाव लड़ने का अधिकार छीन लिया गया। लेकिन ये अधिकार किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है और ना ही इसे कोई साबित कर पाया। संविधान के आर्टिकल 243F के अनुसार अगर राज्य ने ऐसा कोई कानून बनाया है जिससे ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अयोग्य घोषित होता है तो ये जायज़ है। किस आधार पर इसे असंवैधानिक बताया जा रहा है। इस फैसले के बाद मौजूदा प्रधान दसवीं की परीक्षा दे रहे हैं क्योंकि अगली बार उन्हें चुनाव लड़ने में दिक्कत हो सकती है। इसका तो स्वागत होना चाहिए।

हालांकि इस कानून को बनाने वाली हरियाणा सरकार की विधानसभा के अपने कुछ विधायकों के पास ये पात्रता नहीं है। ऐसे मैं ये भी ज़रूरी होता है कि विधायकों और सांसदों के लिए भी एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शुरुआत की जाये।

क्या एक प्रतिनिधि के लिए आठवीं और दसवीं पास करना भी दूभर है? देश में ओपन स्कूल भी चल रहे हैं। हक़ छीना नहीं जा रहा, आपको हक़ के लिए मेहनत करने को कहा जा रहा है जैसे देश में तमाम सरकारी नौकरियों और अलग-अलग पेशों के लिए योग्यता निर्धारित की गयी है। ये योग्यता कुछ छूट के साथ दलित, पिछड़ों, आदिवासी सबके लिए है। अगर दलितों और आदिवासियों को इस मामले में हानि हो रही है तो फिर बाकी क्षेत्रों में भी हो रही होगी। तो सिर्फ राजनीतिज्ञों के लिए ही छूट क्यों ली जा रही है? हालाँकि सभी क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था है।

ये भी गौर करने वाली बात है कि कैसे लोग हमारे लोकतंत्र में प्रतिनिधि बन रहे हैं, ये 'कास्ट' से ज़्यादा 'क्लास' निर्धारित करती है। पैसे वाला ही चुनाव लड़ पा रहा है। टिकट उसी को मिल पा रही है या किसी नेता के बहुत ख़ास व्यक्ति को। रिश्तेदार तो पहली पसंद हैं ही। सहानुभूति पैदा करने के लिए एक और आयाम दिखाया जाता है कि प्रत्याशी दलित है, पिछड़ा है, मुस्लिम है। उसका कम पढ़ा-लिखा होना जायज़ ठहराने की कोशिश भी होती है। याद कीजिये कि आज कितने ऐसे राजनेता हैं जो सच में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक की ज़िन्दगी जी रहे हैं। उत्तर प्रदेश चुनावों में पहले चरण में 231 करोड़पति उम्मीदवार खड़े हुए। इनमें बसपा के 52 करोड़पति उम्मीदवार थे, 44 सपा+कांग्रेस के और इनमें मुस्लिम और पिछड़े और दलित सब हैं। सालों से आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का रिकॉर्ड बनता आ रहा है और लगभग सभी दल ऐसे उम्मीदवारों का पार्टी में स्वागत करते हैं, फिर चाहे उस पार्टी की छवि गरीबों के रहनुमा की हो या दलितों/पिछड़ों/अल्पसंख्यकों के रहनुमा की।

बिहार के मंत्री तेजस्वी यादव को किस बात की कमी रह गयी कि वो आठवीं तक ही पढ़ पाए। सिर्फ तेजस्वी यादव ही क्यों, और भी कई समृद्ध पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि कम-पढ़े लिखे या अनपढ़ मिल जायेंगे। क्यों किसी पढ़े-लिखे दलित/पिछड़ी/गरीब पृष्ठभूमि के नौकरशाह को या कर्मचारी को मजबूर किया जाये कि वो ऐसे मंत्री/सांसद/विधायक के मातहत काम करे।जिस तरह के प्रतिनिधि हमें राज्य और केंद्र में मिल रहे हैं, उन्हें देख कर कतई नहीं लग रहा कि उन्हें दसवीं या बारहवीं पास भी नहीं होना चाहिए। किस हिसाब से कुछ लोगों को लग रहा है कि एक आम गरीब पिछड़ा व्यक्ति या आदिवासी आसानी से चुनाव लड़ने का अपना हक़ ले पा रहा है, जीत पा रहा है और उसके दसवीं पास होने की शर्त उसे रोक लेगी।

आज हर बसपा, सपा, जदयू, शिवसेना, बीजेपी आदि का उम्मीदवार सोशल मीडिया पर आने की कोशिश कर रहा है। राज्यसभा और लोकसभा में ज़्यादातर प्रतिनिधि  फिर ये कौनसी स्थिति की बात की जा रही है जहाँ पांचवी पास होना भी अनिवार्य नहीं हो सकता।

एक अजीब सा तर्क दिया जाता है कि किसी अनपढ़ ने भ्रष्टाचार नहीं किया। खैर, ये तो एक रिसर्च का विषय है। चलिए, मान लिया जाये कि पढ़े-लिखे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त थे, लेकिन क्या भ्रष्टाचार करने की वजह उनका पढ़ा-लिखा होना है? दूसरा सवाल ये भी उठता है कि क्या अनपढ़ लोग भ्रष्टाचार पकड़ पाते हैं? उसे रोक पाएंगे?

Representation of the People Act, 1951 में संशोधन किया जा सकता है और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को शामिल किया जा सकता है लेकिन दिलचस्पी कोई नहीं ले रहा और ज़ाहिर है ग्राम पंचायत के चुनावी नियम की तमाम आलोचनाओं के बीच कोई दबाव भी बनाया नहीं जा रहा।

जब भी हम मुस्लिमों का ज़िक्र करते हैं तब हम उनकी शिक्षा के लिए बड़े फिक्रमंद हो जाते हैं। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट को लागू करने की बात करते हैं। लेकिन मुसलमानों के प्रतिनिधि जब खुद शिक्षा को कुछ नहीं समझेंगे तब अपने समाज में बदलाव क्या लाएंगे। अम्बेडकर भी शिक्षित होकर ही दलितों का प्रतिनिधित्व बेहतर कर सके। सावित्रीबाई फुले क्यों शिक्षा के लिए लोगों का कीचड़ झेल रहीं थीं अगर देश को शिक्षित प्रतिनिधियों की ज़रुरत नहीं। चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि राजनीतिक समझ होना एक अलग बात है, उसके लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं। लेकिन क्या सिर्फ वोट बटोरने तक की ही राजनीतिक समझ ज़रूरी है? गवर्नेंस के बारे में क्या ख्याल है!

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साक्षरता को लेकर प्रतिनिधियों को छूट क्यों? 

akb

पिछले कुछ वक़्त से नज़र आ रहा है कि राजनीति में सुधारों के पैरोकार भी उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता के मामले में बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। उनकी दलील होती है कि ये लोकतंत्र के खिलाफ है, संविधान के खिलाफ है। ये किसी गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी के लिए नुकसानदायक होगा।

जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था कि जिन अनपढ़ लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब झोंक दिया, शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता लगाकर उन्हें चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।

प्रथम प्रधानमंत्री की इस दलील से मैं बिलकुल सहमत हूँ। लेकिन क्या नेहरू आज के सन्दर्भ में भी यही कहते? उस वक़्त के स्वतंत्रता सेनानी आज चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। 1947 से 2017 के मानव संसाधन में अंतर भी आया है। उस वक़्त देश की बड़ी संख्या के लिए संसाधन मुहैया नहीं थे तो देश को ये हक़ भी नहीं था कि इस तरह की कोई अनिवार्यता थोपी जाये। तब देश के लोग 90 साल तक आज़ादी के लिए जूझ रहे थे। साक्षरता दर 12% थी। आज माहौल अलग है, संसाधन बेहतर हैं। देश की साक्षरता 74% के आस-पास है। ऐसे में क्या न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता आठवीं पास भी नहीं रखी जा सकती? संविधान सभा के इस मामले में सन्दर्भ को समझिये और वक़्त को ध्यान में रखिये, ज़रूरी नहीं कि वो आज भी प्रासंगिक है।

कुछ राज्यों ने ग्राम पंचायतों के चुनाव के लिए शैक्षणिक अनिवार्यता की है लेकिन वो भी पांचवी, आठवीं और दसवीं पास तक ही। मसलन, हरियाणा सरकार ने ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए शैक्षणिक योग्यता दसवीं पास रखी। महिलाओं और दलितों के लिए पैमाना दसवीं से कम ही रखा गया है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गयी लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले में गैर-कानूनी या भेदभाव जैसा कुछ नहीं लगा। हालांकि ये फैसला दो जजों की बेंच ने ही दिया था। इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में कहा है कि चुनाव लड़ना कानूनी अधिकार है, संवैधानिक नहीं। कुछ फैसलों में इसे संवैधानिक भी कहा गया। लेकिन राजबाला vs स्टेट ऑफ़ हरियाणा में सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम पंचायत में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को सही ठहराया। इस फैसले की आलोचना भी हुई जिसमें मुख्य बिंदु यही रहा कि एक बड़े तबके का चुनाव लड़ने का अधिकार छीन लिया गया। लेकिन ये अधिकार किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है और ना ही इसे कोई साबित कर पाया। संविधान के आर्टिकल 243F के अनुसार अगर राज्य ने ऐसा कोई कानून बनाया है जिससे ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अयोग्य घोषित होता है तो ये जायज़ है। किस आधार पर इसे असंवैधानिक बताया जा रहा है। इस फैसले के बाद मौजूदा प्रधान दसवीं की परीक्षा दे रहे हैं क्योंकि अगली बार उन्हें चुनाव लड़ने में दिक्कत हो सकती है। इसका तो स्वागत होना चाहिए।

हालांकि इस कानून को बनाने वाली हरियाणा सरकार की विधानसभा के अपने कुछ विधायकों के पास ये पात्रता नहीं है। ऐसे मैं ये भी ज़रूरी होता है कि विधायकों और सांसदों के लिए भी एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शुरुआत की जाये।

क्या एक प्रतिनिधि के लिए आठवीं और दसवीं पास करना भी दूभर है? देश में ओपन स्कूल भी चल रहे हैं। हक़ छीना नहीं जा रहा, आपको हक़ के लिए मेहनत करने को कहा जा रहा है जैसे देश में तमाम सरकारी नौकरियों और अलग-अलग पेशों के लिए योग्यता निर्धारित की गयी है। ये योग्यता कुछ छूट के साथ दलित, पिछड़ों, आदिवासी सबके लिए है। अगर दलितों और आदिवासियों को इस मामले में हानि हो रही है तो फिर बाकी क्षेत्रों में भी हो रही होगी। तो सिर्फ राजनीतिज्ञों के लिए ही छूट क्यों ली जा रही है? हालाँकि सभी क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था है।

ये भी गौर करने वाली बात है कि कैसे लोग हमारे लोकतंत्र में प्रतिनिधि बन रहे हैं, ये 'कास्ट' से ज़्यादा 'क्लास' निर्धारित करती है। पैसे वाला ही चुनाव लड़ पा रहा है। टिकट उसी को मिल पा रही है या किसी नेता के बहुत ख़ास व्यक्ति को। रिश्तेदार तो पहली पसंद हैं ही। सहानुभूति पैदा करने के लिए एक और आयाम दिखाया जाता है कि प्रत्याशी दलित है, पिछड़ा है, मुस्लिम है। उसका कम पढ़ा-लिखा होना जायज़ ठहराने की कोशिश भी होती है। याद कीजिये कि आज कितने ऐसे राजनेता हैं जो सच में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक की ज़िन्दगी जी रहे हैं। उत्तर प्रदेश चुनावों में पहले चरण में 231 करोड़पति उम्मीदवार खड़े हुए। इनमें बसपा के 52 करोड़पति उम्मीदवार थे, 44 सपा+कांग्रेस के और इनमें मुस्लिम और पिछड़े और दलित सब हैं। सालों से आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का रिकॉर्ड बनता आ रहा है और लगभग सभी दल ऐसे उम्मीदवारों का पार्टी में स्वागत करते हैं, फिर चाहे उस पार्टी की छवि गरीबों के रहनुमा की हो या दलितों/पिछड़ों/अल्पसंख्यकों के रहनुमा की।

बिहार के मंत्री तेजस्वी यादव को किस बात की कमी रह गयी कि वो आठवीं तक ही पढ़ पाए। सिर्फ तेजस्वी यादव ही क्यों, और भी कई समृद्ध पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि कम-पढ़े लिखे या अनपढ़ मिल जायेंगे। क्यों किसी पढ़े-लिखे दलित/पिछड़ी/गरीब पृष्ठभूमि के नौकरशाह को या कर्मचारी को मजबूर किया जाये कि वो ऐसे मंत्री/सांसद/विधायक के मातहत काम करे।जिस तरह के प्रतिनिधि हमें राज्य और केंद्र में मिल रहे हैं, उन्हें देख कर कतई नहीं लग रहा कि उन्हें दसवीं या बारहवीं पास भी नहीं होना चाहिए। किस हिसाब से कुछ लोगों को लग रहा है कि एक आम गरीब पिछड़ा व्यक्ति या आदिवासी आसानी से चुनाव लड़ने का अपना हक़ ले पा रहा है, जीत पा रहा है और उसके दसवीं पास होने की शर्त उसे रोक लेगी।

आज हर बसपा, सपा, जदयू, शिवसेना, बीजेपी आदि का उम्मीदवार सोशल मीडिया पर आने की कोशिश कर रहा है। राज्यसभा और लोकसभा में ज़्यादातर प्रतिनिधि  फिर ये कौनसी स्थिति की बात की जा रही है जहाँ पांचवी पास होना भी अनिवार्य नहीं हो सकता।

एक अजीब सा तर्क दिया जाता है कि किसी अनपढ़ ने भ्रष्टाचार नहीं किया। खैर, ये तो एक रिसर्च का विषय है। चलिए, मान लिया जाये कि पढ़े-लिखे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त थे, लेकिन क्या भ्रष्टाचार करने की वजह उनका पढ़ा-लिखा होना है? दूसरा सवाल ये भी उठता है कि क्या अनपढ़ लोग भ्रष्टाचार पकड़ पाते हैं? उसे रोक पाएंगे?

Representation of the People Act, 1951 में संशोधन किया जा सकता है और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को शामिल किया जा सकता है लेकिन दिलचस्पी कोई नहीं ले रहा और ज़ाहिर है ग्राम पंचायत के चुनावी नियम की तमाम आलोचनाओं के बीच कोई दबाव भी बनाया नहीं जा रहा।

जब भी हम मुस्लिमों का ज़िक्र करते हैं तब हम उनकी शिक्षा के लिए बड़े फिक्रमंद हो जाते हैं। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट को लागू करने की बात करते हैं। लेकिन मुसलमानों के प्रतिनिधि जब खुद शिक्षा को कुछ नहीं समझेंगे तब अपने समाज में बदलाव क्या लाएंगे। अम्बेडकर भी शिक्षित होकर ही दलितों का प्रतिनिधित्व बेहतर कर सके। सावित्रीबाई फुले क्यों शिक्षा के लिए लोगों का कीचड़ झेल रहीं थीं अगर देश को शिक्षित प्रतिनिधियों की ज़रुरत नहीं। चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि राजनीतिक समझ होना एक अलग बात है, उसके लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं। लेकिन क्या सिर्फ वोट बटोरने तक की ही राजनीतिक समझ ज़रूरी है? गवर्नेंस के बारे में क्या ख्याल है!

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साक्षरता को लेकर प्रतिनिधियों को छूट क्यों? 

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पिछले कुछ वक़्त से नज़र आ रहा है कि राजनीति में सुधारों के पैरोकार भी उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता के मामले में बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। उनकी दलील होती है कि ये लोकतंत्र के खिलाफ है, संविधान के खिलाफ है। ये किसी गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी के लिए नुकसानदायक होगा।

जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था कि जिन अनपढ़ लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब झोंक दिया, शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता लगाकर उन्हें चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।

प्रथम प्रधानमंत्री की इस दलील से मैं बिलकुल सहमत हूँ। लेकिन क्या नेहरू आज के सन्दर्भ में भी यही कहते? उस वक़्त के स्वतंत्रता सेनानी आज चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। 1947 से 2017 के मानव संसाधन में अंतर भी आया है। उस वक़्त देश की बड़ी संख्या के लिए संसाधन मुहैया नहीं थे तो देश को ये हक़ भी नहीं था कि इस तरह की कोई अनिवार्यता थोपी जाये। तब देश के लोग 90 साल तक आज़ादी के लिए जूझ रहे थे। साक्षरता दर 12% थी। आज माहौल अलग है, संसाधन बेहतर हैं। देश की साक्षरता 74% के आस-पास है। ऐसे में क्या न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता आठवीं पास भी नहीं रखी जा सकती? संविधान सभा के इस मामले में सन्दर्भ को समझिये और वक़्त को ध्यान में रखिये, ज़रूरी नहीं कि वो आज भी प्रासंगिक है।

कुछ राज्यों ने ग्राम पंचायतों के चुनाव के लिए शैक्षणिक अनिवार्यता की है लेकिन वो भी पांचवी, आठवीं और दसवीं पास तक ही। मसलन, हरियाणा सरकार ने ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए शैक्षणिक योग्यता दसवीं पास रखी। महिलाओं और दलितों के लिए पैमाना दसवीं से कम ही रखा गया है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गयी लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले में गैर-कानूनी या भेदभाव जैसा कुछ नहीं लगा। हालांकि ये फैसला दो जजों की बेंच ने ही दिया था। इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में कहा है कि चुनाव लड़ना कानूनी अधिकार है, संवैधानिक नहीं। कुछ फैसलों में इसे संवैधानिक भी कहा गया। लेकिन राजबाला vs स्टेट ऑफ़ हरियाणा में सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम पंचायत में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को सही ठहराया। इस फैसले की आलोचना भी हुई जिसमें मुख्य बिंदु यही रहा कि एक बड़े तबके का चुनाव लड़ने का अधिकार छीन लिया गया। लेकिन ये अधिकार किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है और ना ही इसे कोई साबित कर पाया। संविधान के आर्टिकल 243F के अनुसार अगर राज्य ने ऐसा कोई कानून बनाया है जिससे ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अयोग्य घोषित होता है तो ये जायज़ है। किस आधार पर इसे असंवैधानिक बताया जा रहा है। इस फैसले के बाद मौजूदा प्रधान दसवीं की परीक्षा दे रहे हैं क्योंकि अगली बार उन्हें चुनाव लड़ने में दिक्कत हो सकती है। इसका तो स्वागत होना चाहिए।

हालांकि इस कानून को बनाने वाली हरियाणा सरकार की विधानसभा के अपने कुछ विधायकों के पास ये पात्रता नहीं है। ऐसे मैं ये भी ज़रूरी होता है कि विधायकों और सांसदों के लिए भी एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शुरुआत की जाये।

क्या एक प्रतिनिधि के लिए आठवीं और दसवीं पास करना भी दूभर है? देश में ओपन स्कूल भी चल रहे हैं। हक़ छीना नहीं जा रहा, आपको हक़ के लिए मेहनत करने को कहा जा रहा है जैसे देश में तमाम सरकारी नौकरियों और अलग-अलग पेशों के लिए योग्यता निर्धारित की गयी है। ये योग्यता कुछ छूट के साथ दलित, पिछड़ों, आदिवासी सबके लिए है। अगर दलितों और आदिवासियों को इस मामले में हानि हो रही है तो फिर बाकी क्षेत्रों में भी हो रही होगी। तो सिर्फ राजनीतिज्ञों के लिए ही छूट क्यों ली जा रही है? हालाँकि सभी क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था है।

ये भी गौर करने वाली बात है कि कैसे लोग हमारे लोकतंत्र में प्रतिनिधि बन रहे हैं, ये 'कास्ट' से ज़्यादा 'क्लास' निर्धारित करती है। पैसे वाला ही चुनाव लड़ पा रहा है। टिकट उसी को मिल पा रही है या किसी नेता के बहुत ख़ास व्यक्ति को। रिश्तेदार तो पहली पसंद हैं ही। सहानुभूति पैदा करने के लिए एक और आयाम दिखाया जाता है कि प्रत्याशी दलित है, पिछड़ा है, मुस्लिम है। उसका कम पढ़ा-लिखा होना जायज़ ठहराने की कोशिश भी होती है। याद कीजिये कि आज कितने ऐसे राजनेता हैं जो सच में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक की ज़िन्दगी जी रहे हैं। उत्तर प्रदेश चुनावों में पहले चरण में 231 करोड़पति उम्मीदवार खड़े हुए। इनमें बसपा के 52 करोड़पति उम्मीदवार थे, 44 सपा+कांग्रेस के और इनमें मुस्लिम और पिछड़े और दलित सब हैं। सालों से आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का रिकॉर्ड बनता आ रहा है और लगभग सभी दल ऐसे उम्मीदवारों का पार्टी में स्वागत करते हैं, फिर चाहे उस पार्टी की छवि गरीबों के रहनुमा की हो या दलितों/पिछड़ों/अल्पसंख्यकों के रहनुमा की।

बिहार के मंत्री तेजस्वी यादव को किस बात की कमी रह गयी कि वो आठवीं तक ही पढ़ पाए। सिर्फ तेजस्वी यादव ही क्यों, और भी कई समृद्ध पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि कम-पढ़े लिखे या अनपढ़ मिल जायेंगे। क्यों किसी पढ़े-लिखे दलित/पिछड़ी/गरीब पृष्ठभूमि के नौकरशाह को या कर्मचारी को मजबूर किया जाये कि वो ऐसे मंत्री/सांसद/विधायक के मातहत काम करे।जिस तरह के प्रतिनिधि हमें राज्य और केंद्र में मिल रहे हैं, उन्हें देख कर कतई नहीं लग रहा कि उन्हें दसवीं या बारहवीं पास भी नहीं होना चाहिए। किस हिसाब से कुछ लोगों को लग रहा है कि एक आम गरीब पिछड़ा व्यक्ति या आदिवासी आसानी से चुनाव लड़ने का अपना हक़ ले पा रहा है, जीत पा रहा है और उसके दसवीं पास होने की शर्त उसे रोक लेगी।

आज हर बसपा, सपा, जदयू, शिवसेना, बीजेपी आदि का उम्मीदवार सोशल मीडिया पर आने की कोशिश कर रहा है। राज्यसभा और लोकसभा में ज़्यादातर प्रतिनिधि  फिर ये कौनसी स्थिति की बात की जा रही है जहाँ पांचवी पास होना भी अनिवार्य नहीं हो सकता।

एक अजीब सा तर्क दिया जाता है कि किसी अनपढ़ ने भ्रष्टाचार नहीं किया। खैर, ये तो एक रिसर्च का विषय है। चलिए, मान लिया जाये कि पढ़े-लिखे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त थे, लेकिन क्या भ्रष्टाचार करने की वजह उनका पढ़ा-लिखा होना है? दूसरा सवाल ये भी उठता है कि क्या अनपढ़ लोग भ्रष्टाचार पकड़ पाते हैं? उसे रोक पाएंगे?

Representation of the People Act, 1951 में संशोधन किया जा सकता है और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को शामिल किया जा सकता है लेकिन दिलचस्पी कोई नहीं ले रहा और ज़ाहिर है ग्राम पंचायत के चुनावी नियम की तमाम आलोचनाओं के बीच कोई दबाव भी बनाया नहीं जा रहा।

जब भी हम मुस्लिमों का ज़िक्र करते हैं तब हम उनकी शिक्षा के लिए बड़े फिक्रमंद हो जाते हैं। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट को लागू करने की बात करते हैं। लेकिन मुसलमानों के प्रतिनिधि जब खुद शिक्षा को कुछ नहीं समझेंगे तब अपने समाज में बदलाव क्या लाएंगे। अम्बेडकर भी शिक्षित होकर ही दलितों का प्रतिनिधित्व बेहतर कर सके। सावित्रीबाई फुले क्यों शिक्षा के लिए लोगों का कीचड़ झेल रहीं थीं अगर देश को शिक्षित प्रतिनिधियों की ज़रुरत नहीं। चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि राजनीतिक समझ होना एक अलग बात है, उसके लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं। लेकिन क्या सिर्फ वोट बटोरने तक की ही राजनीतिक समझ ज़रूरी है? गवर्नेंस के बारे में क्या ख्याल है!

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साक्षरता को लेकर प्रतिनिधियों को छूट क्यों? 

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पिछले कुछ वक़्त से नज़र आ रहा है कि राजनीति में सुधारों के पैरोकार भी उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता के मामले में बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। उनकी दलील होती है कि ये लोकतंत्र के खिलाफ है, संविधान के खिलाफ है। ये किसी गरीब, पिछड़े, दलित, आदिवासी के लिए नुकसानदायक होगा।

जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा था कि जिन अनपढ़ लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब झोंक दिया, शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता लगाकर उन्हें चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।

प्रथम प्रधानमंत्री की इस दलील से मैं बिलकुल सहमत हूँ। लेकिन क्या नेहरू आज के सन्दर्भ में भी यही कहते? उस वक़्त के स्वतंत्रता सेनानी आज चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। 1947 से 2017 के मानव संसाधन में अंतर भी आया है। उस वक़्त देश की बड़ी संख्या के लिए संसाधन मुहैया नहीं थे तो देश को ये हक़ भी नहीं था कि इस तरह की कोई अनिवार्यता थोपी जाये। तब देश के लोग 90 साल तक आज़ादी के लिए जूझ रहे थे। साक्षरता दर 12% थी। आज माहौल अलग है, संसाधन बेहतर हैं। देश की साक्षरता 74% के आस-पास है। ऐसे में क्या न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता आठवीं पास भी नहीं रखी जा सकती? संविधान सभा के इस मामले में सन्दर्भ को समझिये और वक़्त को ध्यान में रखिये, ज़रूरी नहीं कि वो आज भी प्रासंगिक है।

कुछ राज्यों ने ग्राम पंचायतों के चुनाव के लिए शैक्षणिक अनिवार्यता की है लेकिन वो भी पांचवी, आठवीं और दसवीं पास तक ही। मसलन, हरियाणा सरकार ने ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए शैक्षणिक योग्यता दसवीं पास रखी। महिलाओं और दलितों के लिए पैमाना दसवीं से कम ही रखा गया है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गयी लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले में गैर-कानूनी या भेदभाव जैसा कुछ नहीं लगा। हालांकि ये फैसला दो जजों की बेंच ने ही दिया था। इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में कहा है कि चुनाव लड़ना कानूनी अधिकार है, संवैधानिक नहीं। कुछ फैसलों में इसे संवैधानिक भी कहा गया। लेकिन राजबाला vs स्टेट ऑफ़ हरियाणा में सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम पंचायत में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को सही ठहराया। इस फैसले की आलोचना भी हुई जिसमें मुख्य बिंदु यही रहा कि एक बड़े तबके का चुनाव लड़ने का अधिकार छीन लिया गया। लेकिन ये अधिकार किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है और ना ही इसे कोई साबित कर पाया। संविधान के आर्टिकल 243F के अनुसार अगर राज्य ने ऐसा कोई कानून बनाया है जिससे ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार अयोग्य घोषित होता है तो ये जायज़ है। किस आधार पर इसे असंवैधानिक बताया जा रहा है। इस फैसले के बाद मौजूदा प्रधान दसवीं की परीक्षा दे रहे हैं क्योंकि अगली बार उन्हें चुनाव लड़ने में दिक्कत हो सकती है। इसका तो स्वागत होना चाहिए।

हालांकि इस कानून को बनाने वाली हरियाणा सरकार की विधानसभा के अपने कुछ विधायकों के पास ये पात्रता नहीं है। ऐसे मैं ये भी ज़रूरी होता है कि विधायकों और सांसदों के लिए भी एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की शुरुआत की जाये।

क्या एक प्रतिनिधि के लिए आठवीं और दसवीं पास करना भी दूभर है? देश में ओपन स्कूल भी चल रहे हैं। हक़ छीना नहीं जा रहा, आपको हक़ के लिए मेहनत करने को कहा जा रहा है जैसे देश में तमाम सरकारी नौकरियों और अलग-अलग पेशों के लिए योग्यता निर्धारित की गयी है। ये योग्यता कुछ छूट के साथ दलित, पिछड़ों, आदिवासी सबके लिए है। अगर दलितों और आदिवासियों को इस मामले में हानि हो रही है तो फिर बाकी क्षेत्रों में भी हो रही होगी। तो सिर्फ राजनीतिज्ञों के लिए ही छूट क्यों ली जा रही है? हालाँकि सभी क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था है।

ये भी गौर करने वाली बात है कि कैसे लोग हमारे लोकतंत्र में प्रतिनिधि बन रहे हैं, ये 'कास्ट' से ज़्यादा 'क्लास' निर्धारित करती है। पैसे वाला ही चुनाव लड़ पा रहा है। टिकट उसी को मिल पा रही है या किसी नेता के बहुत ख़ास व्यक्ति को। रिश्तेदार तो पहली पसंद हैं ही। सहानुभूति पैदा करने के लिए एक और आयाम दिखाया जाता है कि प्रत्याशी दलित है, पिछड़ा है, मुस्लिम है। उसका कम पढ़ा-लिखा होना जायज़ ठहराने की कोशिश भी होती है। याद कीजिये कि आज कितने ऐसे राजनेता हैं जो सच में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक की ज़िन्दगी जी रहे हैं। उत्तर प्रदेश चुनावों में पहले चरण में 231 करोड़पति उम्मीदवार खड़े हुए। इनमें बसपा के 52 करोड़पति उम्मीदवार थे, 44 सपा+कांग्रेस के और इनमें मुस्लिम और पिछड़े और दलित सब हैं। सालों से आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का रिकॉर्ड बनता आ रहा है और लगभग सभी दल ऐसे उम्मीदवारों का पार्टी में स्वागत करते हैं, फिर चाहे उस पार्टी की छवि गरीबों के रहनुमा की हो या दलितों/पिछड़ों/अल्पसंख्यकों के रहनुमा की।

बिहार के मंत्री तेजस्वी यादव को किस बात की कमी रह गयी कि वो आठवीं तक ही पढ़ पाए। सिर्फ तेजस्वी यादव ही क्यों, और भी कई समृद्ध पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि कम-पढ़े लिखे या अनपढ़ मिल जायेंगे। क्यों किसी पढ़े-लिखे दलित/पिछड़ी/गरीब पृष्ठभूमि के नौकरशाह को या कर्मचारी को मजबूर किया जाये कि वो ऐसे मंत्री/सांसद/विधायक के मातहत काम करे।जिस तरह के प्रतिनिधि हमें राज्य और केंद्र में मिल रहे हैं, उन्हें देख कर कतई नहीं लग रहा कि उन्हें दसवीं या बारहवीं पास भी नहीं होना चाहिए। किस हिसाब से कुछ लोगों को लग रहा है कि एक आम गरीब पिछड़ा व्यक्ति या आदिवासी आसानी से चुनाव लड़ने का अपना हक़ ले पा रहा है, जीत पा रहा है और उसके दसवीं पास होने की शर्त उसे रोक लेगी।

आज हर बसपा, सपा, जदयू, शिवसेना, बीजेपी आदि का उम्मीदवार सोशल मीडिया पर आने की कोशिश कर रहा है। ये कौनसी स्थिति की बात की जा रही है जहाँ पांचवी पास होना भी अनिवार्य नहीं हो सकता।

एक अजीब सा तर्क दिया जाता है कि किसी अनपढ़ ने भ्रष्टाचार नहीं किया। खैर, ये तो एक रिसर्च का विषय है। चलिए, मान लिया जाये कि पढ़े-लिखे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त थे, लेकिन क्या भ्रष्टाचार करने की वजह उनका पढ़ा-लिखा होना है? दूसरा सवाल ये भी उठता है कि क्या अनपढ़ लोग भ्रष्टाचार पकड़ पाते हैं? उसे रोक पाएंगे?

Representation of the People Act, 1951 में संशोधन किया जा सकता है और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को शामिल किया जा सकता है लेकिन दिलचस्पी कोई नहीं ले रहा और ज़ाहिर है ग्राम पंचायत के चुनावी नियम की तमाम आलोचनाओं के बीच कोई दबाव भी बनाया नहीं जा रहा।

जब भी हम मुस्लिमों का ज़िक्र करते हैं तब हम उनकी शिक्षा के लिए बड़े फिक्रमंद हो जाते हैं। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट को लागू करने की बात करते हैं। लेकिन मुसलमानों के प्रतिनिधि जब खुद शिक्षा को कुछ नहीं समझेंगे तब अपने समाज में बदलाव क्या लाएंगे। अम्बेडकर भी शिक्षित होकर ही दलितों का प्रतिनिधित्व बेहतर कर सके। सावित्रीबाई फुले क्यों शिक्षा के लिए लोगों का कीचड़ झेल रहीं थीं अगर देश को शिक्षित प्रतिनिधियों की ज़रुरत नहीं। चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि राजनीतिक समझ होना एक अलग बात है, उसके लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं। लेकिन क्या सिर्फ वोट बटोरने तक की ही राजनीतिक समझ ज़रूरी है? गवर्नेंस के बारे में क्या ख्याल है!

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'बींग ह्यूमन' आपने क्या किया सलमान

akb salman-khan कलीम कहता है कि सलमान खान को जेल हो या फांसी हो, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मुझे मुआवज़ा चाहिए बस। कलीम उन पीड़ितों में से एक है जिसे 2002 में सलमान खान ने अपनी गाड़ी से कुचल दिया था जब वो रात को फुटपाथ पर सो रहे थे। इस दुर्घटना में 4 लोग घायल हुए थे और एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थी। कलीम की बात से ज़ाहिर है कि लोगों के लिए इन्साफ के कितने अलग-अलग मायने हैं या शायद कोर्ट की तारीखें बदलते-बदलते ये मायने भी बदल जाते हैं। सलमान खान के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ग़मगीन है। लोगों की भावनाएं फेसबुक, ट्विटर पर उमड़ रही हैं। फिल्म में हीरो का किरदार करने वाले व्यक्ति को लोग असल में भी हीरो ही मानते हैं। हमारे लिए वो इन्साफ से भी ऊपर है। जब छवि टूटती है तो अपने अंदर भी कुछ टूटता है। शायद इसलिए हम कोई छोर तलाशते रहते हैं जिसको पकड़ कर हम उस छवि को टूटने से बचा लें। अपने मन को तसल्‍ली देते रहें। कितने ही लोग सलमान के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, उनके बचाव में पीड़ितों को गाली देकर कह रहे हैं कि फुटपाथ पर सोने वाले ऐसी ही मौत मरते हैं। फुटपाथ सोने के लिए नहीं है तो गाड़ी चढ़ाने के लिए भी नहीं होता है। हमारे हीरो को ये क्यों नहीं पता होता है कि शराब पीकर गाड़ी चलाना कानूनन जुर्म है। आप इतने रईस हैं, क्या आपके घर एक ड्राइवर भी नहीं था! फुटपाथ पर सोने वालों से सवाल करने वाले अपनी सरकारों से सवाल कीजिये कि बेघरों के लिए वो क्या करती है? गलती तो हीरो से भी हो सकती है। लेकिन गलती करके बचने के रास्ते खोजने वाला किसका हीरो है? सलमान खान ने शराब पीकर गाड़ी चलायी, बिना लाइसेंस के गाड़ी चलायी और नशे में कुछ लोगों को घायल कर के भाग गए। फिर 13 साल तक मानसिक तनाव के साथ बचने के रास्ते खोजते रहे। आखिर में ड्राइवर को भी फंसाने की कोशिश की। सोचिये, अगर सलमान खान वहां से ना भागते, घायलों को अस्पताल पहुंचा देते और खुद को पुलिस के हवाले करके कोर्ट के सामने अपनी गलती क़ुबूल करते हुए पीड़ितों की ज़िम्मेदारी उठाते तो क्या होता? आज कोर्ट ने उन्हें अधिकतम सज़ा ना देते हुए केवल 5 साल की सज़ा दी है। ये कम हुई सज़ा भी उन्हें अपनी 2007 में बनी 'बींग ह्यूमन' संस्था के कामों को मद्देनज़र रखते हुए दी गयी है। ये भी ध्यान रहे कि ये संस्था 2007 में बनी थी और तब तक 'काले हिरण' का मामला और 'हिट एंड रन' मामलों पर उन पर मुक़दमे पहले से चल रहे थे। इंडस्ट्री में भी अपने साथी कलाकारों के साथ बदसलूकी के किस्से भी सुर्खियां बन चुके थे। अगर 2002 में उन्होंने अपनी गलती मान ली होती तो कोर्ट शायद उन्हें 3 साल की सज़ा ही देता और उन्हें जेल ना जाना पड़ता। इस भयंकर मानसिक तनाव को 13 साल तक ना ढोते। मीडिया और मेरे जैसे कई लोगों के वो हीरो होते। लेकिन हम लोग अपने ज़मीर से ज़्यादा अपने वकीलों पर भरोसा करते हैं। इस पूरे मामले में एक गवाही थी कमाल खान की। गायक होने के साथ-साथ वो सलमान खान के रिश्तेदार भी हैं। हादसे की रात वो सलमान के साथ थे और उन्होंने अब तक सिर्फ एक ही बार गवाही दी है जिसमें उन्होंने क़ुबूल किया है कि उस रात सलमान खान गाड़ी चला रहे थे। अपने भाई के खिलाफ सच बोलने वाले कितने हैं? क्या सलमान खान उनसे बड़े हीरो हैं? आपने पसंदीदा शख्स के लिए हमदर्दी होना कोई बुरी बात नहीं है। मीडिया ने जिस तरह की कवरेज इस फैसले के दिन को दी है, उससे तो सलमान खान को पसंद ना करने वाले के दिल में भी हमदर्दी पैदा हो जाएगी। जो दिखेगा वही तो बिकेगा। उन पीड़ितों को कौन जानता है। वो फटेहाल लोग हमारी हीरो की इमेज में फिट नहीं बैठते। वो बेचारे तो खुद भी इन्साफ को पैसों से तोलते हैं जैसे कि हमारे नेता। लेकिन मैं और आप किसी कसूरवार को माफ़ करने वाले कौन होते हैं? ये हादसा हमारे साथ नहीं हुआ है। खुदा ना खास्ता ऐसा कोई हादसा हमारे मां-बाप, भाई के साथ हो तो क्या अपने हीरो को माफ़ कर पाएंगे आप? जहां तक कड़े सन्देश जाने की बात है तो इस पॉइंट को छोड़ ही दिया जाए तो बेहतर है। निचली अदालतों में बड़े-बड़े नेताओं और अभिनेताओं के खिलाफ भी फैसले आए हैं। कुछ ज़मानत पर बाहर बैठे हैं और कुछ पेरोल या तबियत के बहाने अंदर-बाहर तो होते रहते हैं। जैसा कि मैंने कहा.…तारीखों के साथ इन्साफ के मायने भी बदल जाते हैं। सब थक जाते हैं। सलमान बींग ह्यूमन गलतियां होती रहती हैं, पर बींग ह्यूमन आपको अपने ज़मीर की सुनकर गलती वक़्त रहते सुधार लेनी चाहिए थी।

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यूपी में है इंडिया का पहला ग्रीन ढाबा

akb bhajan-dhaba ये एक संजोग ही है कि विश्व पर्यावरण दिवस के दिन हमें लखनऊ से दिल्ली के रास्ते पर गजरौला में ये ग्रीन ढाबा दिख गया। नेशनल हाईवे 24 पर मेकडोनाल्डस और केएफसी के साथ स्थित 'भजन' ढाबे को हिंदुस्तान का पहला ग्रीन ढाबा कहना गलत नहीं होगा, क्योंकि अभी तक यूपी या देश के किसी और हिस्से में हमें ऐसा ढाबा नहीं मिला है। किसी ढाबे की या रेस्तरां की ज़्यादा तारीफ़ आपने उसके खाने के बारे में ही सुनी होगी। लेकिन भजन ढाबे की खासियत इसके आर्किटेक्चर से शुरू होती है। 'लॉरी बेकर' स्टाइल आर्किटेक्चर में दीवारों के अंदर स्पेस रखा जाता है, जिससे ये हवा या गर्मी को ट्रैप नहीं करती और इसलिए गर्मियों में कमरे का तापमान ठंडा और सर्दियों में गरम रहता है। इतनी गर्मी में भी इस जगह आप सिर्फ पंखे के सहारे आराम से बैठ सकते हैं। dhaba पूरे ढाबे में कहीं भी सरिये का इस्तेमाल नहीं किया गया है। ईंटों की छतों को कर्व देकर इस तरह बनाया गया है ताकि सारा भार दोनों तरफ 'बीम' पर पड़े और सरिये की ज़रूरत ना पड़े। सीमेंट के कम से कम इस्तेमाल के लिए घड़ों का ढक्कन बीच-बीच में लगाया गया है जो सीमेंट की बचत के साथ-साथ इसे एक खूबसूरत डिज़ाइन भी बनाता है। हर जगह पुरानी लकड़ी लगायी गयी है। पुराने घरों से निकले दरवाज़े फिट किए गए हैं। पुरानी ईंटे काम में लायी गयी हैं। क्योंकि इसका आर्किटेक्चर भारत में आम नहीं है, इसलिए इसके लिए पहले मज़दूरों को ट्रेनिंग दी जाती थी और फिर बनाना शुरू किया जाता था। इससे ज़्यादा खालिस खाना आप और कहां खाएंगे, जब ढाबे के पीछे पड़ी खाली ज़मीन पर उगाई सब्जियां सीधे ढाबे के खाने के लिए इस्तेमाल होती हैं। बचे हुए खाने को बायो गैस बनाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इसी बायो गैस से ढाबे की दो-तिहाई गैस की आपूर्ति हो जाती है। bhajan-kitechenढाबे के मालिक विक्रमजीत सिंह बेदी का दावा है कि ये बायो गैस प्लांट उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा बायो गैस प्लांट है। बायो गैस से निकली खाद फिर पीछे उगाई सब्जियों के काम आती है। साथ ही एक रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम भी है जो बारिश के पानी का संचय करता है। शौचालयों और सफाई के लिए रीसाईकल किये पानी का इस्तेमाल होता है। अनुमान है कि अगले कुछ सालों में बारिश के पानी के संचय से ज़मीन का ग्राउंड वाटर लेवल 3-4 फ़ीट ऊपर आ जायेगा। ढाबे में सन विंडो लगायी गयी हैं ताकि सूरज छिपने तक यहां छोटा सा बल्ब जलाने की भी ज़रूरत नहीं पड़े और इस तरह तकरीबन 30% बिजली बचा ली जाती है। bhajan-biogas विक्रमजीत ने बताया कि इस तरह के उनके 3 और ढाबे हैं। लेकिन वहां पर अभी सिर्फ इस तरह की रसोई ही काम में लायी जाती है। 1969 से उनके पिता के वक़्त से ये ढाबे अस्तित्व में हैं। इस ग्रीन ढाबे का पिछले साल अक्टूबर में उद्घाटन किया गया लेकिन अभी उनका काम पूरा नहीं हुआ है। वो इस ढाबे में अभी कई और नए प्रयोग करना चाहते हैं। विक्रमजीत के पिता का कहना था कि जिस ज़मीन ने इतना दिया है, उसे ज़्यादा से ज़्यादा लौटाया जाये। विक्रमजीत की मां मधु चतुर्वेदी हिंदी की मशहूर कवयित्री भी हैं। लोगों को अच्छा खाना खिलाने के साथ-साथ ये परिवार लोगों को अपने ढाबे के बारे में ख़ुशी-ख़ुशी बताता भी है और चाहता है कि बाकी लोग भी इस तरह की शुरुआत करें। green-dhaba भजन ढाबा सिर्फ खाने की जगह नहीं, बल्कि पर्यावरण की एक पाठशाला भी है। विक्रमजीत सिंह बेदी ने कुछ स्कूलों से अनुरोध भी किया है कि वो अपने विद्यार्थियों को यहां लाएं ताकि वो छोटी उम्र से ही पर्यावरण और ऊर्जा संचय के बारे में सीख सकें। अपनी सोच और लगन से इतना सब करने के बाद भी ये परिवार इस ढाबे में बिजली के लिए बिजली विभाग के चक्कर लगा रहा है। लेकिन पिछले 15 महीने से इन्हें बिजली नहीं मिल पायी है। कारण आप समझ ही गए होंगे। पर्यावरण दिवस पर अब पर्यावरण के लिए सिर्फ सोचना और बोलना ही काफी नहीं बल्कि बेदी परिवार की तरह कुछ नए सकारात्मक कदम उठाने की भी ज़रूरत है।

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सर्वप्रिया सांगवान : हम सब आहत हैं

akb we-all-are-hurt हर चोट का इलाज दुनिया में है लेकिन ये बार-बार छोटी छोटी बात पर आहत होने वाली भावनाओं वाली बीमारी लाइलाज है। देश अपने कमाने-खाने में व्यस्त है और राजनीति भावनाओं को बचाने में। उसके अलावा मुद्दा है ही क्या। एक किस्सा है कर्नाटक राज्य का। 2012 में कर्नाटक के डिप्टी सीएम के.एस. ईश्वरप्पा गांधी जयंती के दिन मांसाहार करते पकड़े गए और कांग्रेस ने मौका भांप कर गवर्नर को याचिका दे दी कि ईश्वरप्पा को तुरंत बर्खास्त किया जाये क्योंकि उन्होंने गांधीवादी लोगों की भावनाएं आहत की हैं। भावनाओं के कई प्रकार हैं। सिर्फ धर्म की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी, नेता, इतिहास, जाति, विचारधारा, दर्शन, फिल्मों, किताबों और कभी-कभी यूंही आहत हो जाती हैं। फिलहाल महाराष्ट्र में सरकार के द्वारा जैन धर्म के धार्मिक त्यौहार पर्युषण के दौरान मीट पर बैन लगाये जाने के खिलाफ पूरे विपक्ष और उनके साथी दल शिवसेना ने भी मोर्चा संभाल लिया है। शिवसेना और मनसे वही दल हैं जो गौ-मांस पर प्रतिबन्ध लगाने को लेकर भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़ी थी। देखा जाये तो हिन्दू धर्म की भावनाओं का खयाल रखते हुए गौ-मांस बंद हो सकता है तो फिर जैन धर्म के लोगों की भावनाओं के सम्मान में 4 दिन का मीट बैन तो न्यायोचित है। प्रतिबन्ध की समय सीमा भी दोनों धर्मों के लोगों की संख्या के अनुपातिक लगती है। अगर भाजपा शासित महाराष्ट्र की सरकार ऐसा नहीं करती है तो फिर तो उस पर सिर्फ हिन्दुओं के तुष्टिकरण का आरोप लगना तय है। गणेश चतुर्थी पर भी महाराष्ट्र में एक दिन के लिए मीट पर बैन लगता ही है। ये तो राजनीतिक न्याय की बात हुई। लेकिन देश के संविधान में साफ़-साफ़ लिखा है कि आप बिना किसी खौफ के अपने-अपने धर्म का पालन कर सकें। वहां ये बिलकुल नहीं लिखा है कि आप पूरे देश से अपने धर्म का पालन करवाएं। इस देश में नास्तिकों का भी आपकी तरह एक अल्पसंख्यक समुदाय है। इसलिए किसी भी समाज के द्वारा सरकार से इस तरह के प्रतिबन्ध का अनुरोध करना सरासर गलत है। महाराष्ट्र में ही नहीं, ये बैन कई और राज्यों में भी लगता रहा है। गुजरात में पिछले कई वर्षों से पर्युषण के दौरान ऐसा प्रतिबन्ध लगाया जाता रहा है। इसके खिलाफ 2008 में कुरैशी जमात ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाली थी लेकिन मार्कण्डेय काटजू और एच.के. सेमा की बेंच ने मुग़ल बादशाह अकबर की मिसाल देते हुए अपने फैसले में कहा कि अकबर भी हफ्ते में कुछ दिन अपनी हिन्दू पत्नी और शाकाहारी हिन्दुस्तानियों के सम्मान में शाकाहार का पालन करता था और इसलिए हमें भी दूसरे लोगों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। बेशक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए लेकिन उससे पहले भावनाओं पर एक किताब छप जानी चाहिए जिसे पढ़ कर हम और आप दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना सीख जाएं। फिर तो कानून की किताब भी मोटी होते रहने से बच जाएगी। अगर भावनाओं पर ही कानून बनते तो आज आपका या मेरा लिखना भी मुनासिब नहीं होता।

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पब्लिक जी, आप सब नहीं जानते हैं

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public-you-dont-know-everything-writes बुधवार को ही खबर आई कि देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने विजय माल्या की बंद हो चुकी कंपनी किंगफिशर एयरलाइंस को दिए 1,200 करोड़ रुपये के कर्ज़ को अपनी बही के बट्टे खाते (वह कर्ज़, जिसकी वसूली संभव न हो) में दर्ज कर लिया है. एसबीआई के एक पूर्व चेयरमैन ने NDTV को बताया कि एयूसीए कैटेगरी में कर्ज़ों को डाल देना इसी बात का संकेत है कि बैंक कमोबेश किंगफिशर से कर्ज़ की वसूली की उम्मीद छोड़ चुका है. जिसे संघर्ष करना है, करे. लेकिन सही वजह जानकर करे. SBI की चेयरमैन हों या बाकी बैंकर्स, सरकार के फैसले से काफी खुश हैं. हालांकि यूपीए सरकार के दौरान भी इन्हें कभी सरकार के फैसलों के खिलाफ बोलते देखा नहीं गया. ये बात भी खुल चुकी है कि बैंकों ने रिस्क लेकर उद्योगपतियों को काफी पैसा उधार दिया. Non-Performing asset(NPA) जिसे अगर आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि बैंकों ने काफी उधार दिया ब्याज़ पर, लेकिन वो ब्याज़ आना तो बंद हो ही गया, साथ ही मूल वापस आने की गुंजाइश भी कम ही है. तो आप ये जान लीजिये, फिलहाल इस NPA की वजह से पूरी दुनिया में भारत सबसे बुरी अर्थव्यवस्था के तौर पर खड़ा है.
 विभिन्न अख़बारी रिपोर्ट के आधार पर कुछ आंकड़े जुटाए हैं. 38 बैंको ने अपने नतीजे घोषित किये हैं जिनमें से 23 सरकारी/पब्लिक बैंक हैं और 15 प्राइवेट बैंक. इनके नतीजों से पता चलता है कि हालत बेहद खराब है. मुनाफ़ा 26% तक गिर गया है. ब्याज़ से होने वाली आमदनी ख़ास नहीं बढ़ी. NPA इस साल बढ़ कर 6.5 लाख करोड़ रुपये के हो गए हैं, 2015 में 3.3 लाख करोड़ थे.
मतलब इतना क़र्ज़ रूपी पैसा जिस पर अब ब्याज़ से आमदनी नहीं हो रही और इसका मूल भी वापस नहीं आया. सबसे बुरा हाल सरकारी बैंकों का है. 90 फीसदी NPA तो इनका है. कुछ सरकारी बैंक तो दिवालिया होने की कगार पर हैं. प्राइवेट बैंक जैसे एक्सिस बैंक का लाभ भी 84% तक गिर गया है. आईसीआईसीआई बैंक ने पिछले 10 साल के रिकॉर्ड में सबसे बुरा प्रदर्शन किया है. इस बैंक का NPA 76% बढ़ गया है. 16 फरवरी को इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया जिसमें खुलासा हुआ था कि सरकारी बैंकों ने 2013 और 2015 के बीच 1.14 लाख करोड़ के क़र्ज़ को घाटे के तौर पर दिखाया यानी राइट-ऑफ कर दिया. सरकारी बैंकों का दोबारा पूंजीकरण करना है तो कम से कम 2 लाख करोड़ रुपये चाहिए होंगे. सरकार ये पैसा कहां से लाती. तो क्या किया जा सकता था, आपके पास पड़ा हुआ पैसा बैंकों में जमा होना चाहिए और आपको कम से कम पैसा निकालने की इजाज़त. प्रधानमंत्री ने 50 दिन कह कर मांगे ही हैं. इकोनॉमिक टाइम्स में छपे एक लेख के अनुसार नए नोटों को छपने में कम से कम दो महीने का वक़्त लगेगा.
 एसबीआई का एक शेयर 8 नवंबर को 243 रुपये का था, 11 नवंबर को 287 रुपये पहुंच  गया. मतलब बैंक तो खुश हैं. जब पैसा आएगा तो दोबारा उधार दिया जा सकेगा उद्योगपतियों को.
भ्रष्टाचार और आतंकवाद से लड़ने का कदम तो इसलिए बताया गया है क्योंकि आम लोगों का समर्थन मिल सके. भ्रष्टाचार तो नए नोटों से फिर से शुरू होगा ही. ये एक साइकिल है, उद्योगपति पैसा देंगे राजनीतिक पार्टियों को जिसका हिसाब सार्वजनिक तो होता नहीं, पार्टियां जीतने के बाद उन्हें फायदे देंगी, उनके व्यापार के लिए कर्ज़े दिलवाएंगी, काला धन बाहर जमा होता रहेगा, उद्योगपति पैसा चुकाएंगे नहीं, यहां बैंकों की हालत खस्ता होती रहेगी. जब कोई विकल्प नज़र नहीं आएगा तो फिर से पाकिस्तान का मुद्दा गर्म हो जाएगा. कोई भी दल अपने चंदे को लेकर साफ़ नहीं है. जब तक काले धन की पहली सीढ़ी पर ही इसे रोका नहीं जायेगा, तब तक कुछ भी करते रहिये, फायदा कुछ नहीं. जो काम राजनीतिक दलों के हाथ में है, पहले उसे क्यों ना किये जाये, बजाय की जनता को परेशान करने के. बाकी आप अपने आस-पास देख ही रहे होंगे कि लोग किस तरह अपने काले धन को सफ़ेद कर रहे हैं और बड़े-बड़े उद्योगपति इस फैसले पर तालियां बजा रहे हैं. इस देश में योजनाएं हमेशा से बनती आ रही हैं, चाहे आधार कार्ड हो या मनरेगा लेकिन इन योजनाओं के लागू होने पर ही सवाल उठाये जाते हैं और ये देशद्रोह नहीं है. पब्लिक जी, आप सब नहीं जानते हैं.

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पब्लिक जी, आप सब नहीं जानते हैं

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  बुधवार को ही खबर आई कि देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने विजय माल्या की बंद हो चुकी कंपनी किंगफिशर एयरलाइंस को दिए 1,200 करोड़ रुपये के कर्ज़ को अपनी बही के बट्टे खाते (वह कर्ज़, जिसकी वसूली संभव न हो) में दर्ज कर लिया है. एसबीआई के एक पूर्व चेयरमैन ने NDTV को बताया कि एयूसीए कैटेगरी में कर्ज़ों को डाल देना इसी बात का संकेत है कि बैंक कमोबेश किंगफिशर से कर्ज़ की वसूली की उम्मीद छोड़ चुका है. जिसे संघर्ष करना है, करे. लेकिन सही वजह जानकर करे. SBI की चेयरमैन हों या बाकी बैंकर्स, सरकार के फैसले से काफी खुश हैं. हालांकि यूपीए सरकार के दौरान भी इन्हें कभी सरकार के फैसलों के खिलाफ बोलते देखा नहीं गया. ये बात भी खुल चुकी है कि बैंकों ने रिस्क लेकर उद्योगपतियों को काफी पैसा उधार दिया. Non-Performing asset(NPA) जिसे अगर आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि बैंकों ने काफी उधार दिया ब्याज़ पर, लेकिन वो ब्याज़ आना तो बंद हो ही गया, साथ ही मूल वापस आने की गुंजाइश भी कम ही है. तो आप ये जान लीजिये, फिलहाल इस NPA की वजह से पूरी दुनिया में भारत सबसे बुरी अर्थव्यवस्था के तौर पर खड़ा है.
 विभिन्न अख़बारी रिपोर्ट के आधार पर कुछ आंकड़े जुटाए हैं. 38 बैंको ने अपने नतीजे घोषित किये हैं जिनमें से 23 सरकारी/पब्लिक बैंक हैं और 15 प्राइवेट बैंक. इनके नतीजों से पता चलता है कि हालत बेहद खराब है. मुनाफ़ा 26% तक गिर गया है. ब्याज़ से होने वाली आमदनी ख़ास नहीं बढ़ी. NPA इस साल बढ़ कर 6.5 लाख करोड़ रुपये के हो गए हैं, 2015 में 3.3 लाख करोड़ थे.
मतलब इतना क़र्ज़ रूपी पैसा जिस पर अब ब्याज़ से आमदनी नहीं हो रही और इसका मूल भी वापस नहीं आया. सबसे बुरा हाल सरकारी बैंकों का है. 90 फीसदी NPA तो इनका है. कुछ सरकारी बैंक तो दिवालिया होने की कगार पर हैं. प्राइवेट बैंक जैसे एक्सिस बैंक का लाभ भी 84% तक गिर गया है. आईसीआईसीआई बैंक ने पिछले 10 साल के रिकॉर्ड में सबसे बुरा प्रदर्शन किया है. इस बैंक का NPA 76% बढ़ गया है. 16 फरवरी को इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया जिसमें खुलासा हुआ था कि सरकारी बैंकों ने 2013 और 2015 के बीच 1.14 लाख करोड़ के क़र्ज़ को घाटे के तौर पर दिखाया यानी राइट-ऑफ कर दिया. सरकारी बैंकों का दोबारा पूंजीकरण करना है तो कम से कम 2 लाख करोड़ रुपये चाहिए होंगे. सरकार ये पैसा कहां से लाती. तो क्या किया जा सकता था, आपके पास पड़ा हुआ पैसा बैंकों में जमा होना चाहिए और आपको कम से कम पैसा निकालने की इजाज़त. प्रधानमंत्री ने 50 दिन कह कर मांगे ही हैं. इकोनॉमिक टाइम्स में छपे एक लेख के अनुसार नए नोटों को छपने में कम से कम दो महीने का वक़्त लगेगा.
 एसबीआई का एक शेयर 8 नवंबर को 243 रुपये का था, 11 नवंबर को 287 रुपये पहुंच  गया. मतलब बैंक तो खुश हैं. जब पैसा आएगा तो दोबारा उधार दिया जा सकेगा उद्योगपतियों को.
भ्रष्टाचार और आतंकवाद से लड़ने का कदम तो इसलिए बताया गया है क्योंकि आम लोगों का समर्थन मिल सके. भ्रष्टाचार तो नए नोटों से फिर से शुरू होगा ही. ये एक साइकिल है, उद्योगपति पैसा देंगे राजनीतिक पार्टियों को जिसका हिसाब सार्वजनिक तो होता नहीं, पार्टियां जीतने के बाद उन्हें फायदे देंगी, उनके व्यापार के लिए कर्ज़े दिलवाएंगी, काला धन बाहर जमा होता रहेगा, उद्योगपति पैसा चुकाएंगे नहीं, यहां बैंकों की हालत खस्ता होती रहेगी. जब कोई विकल्प नज़र नहीं आएगा तो फिर से पाकिस्तान का मुद्दा गर्म हो जाएगा. कोई भी दल अपने चंदे को लेकर साफ़ नहीं है. जब तक काले धन की पहली सीढ़ी पर ही इसे रोका नहीं जायेगा, तब तक कुछ भी करते रहिये, फायदा कुछ नहीं. जो काम राजनीतिक दलों के हाथ में है, पहले उसे क्यों ना किये जाये, बजाय की जनता को परेशान करने के. बाकी आप अपने आस-पास देख ही रहे होंगे कि लोग किस तरह अपने काले धन को सफ़ेद कर रहे हैं और बड़े-बड़े उद्योगपति इस फैसले पर तालियां बजा रहे हैं. इस देश में योजनाएं हमेशा से बनती आ रही हैं, चाहे आधार कार्ड हो या मनरेगा लेकिन इन योजनाओं के लागू होने पर ही सवाल उठाये जाते हैं और ये देशद्रोह नहीं है. पब्लिक जी, आप सब नहीं जानते हैं.

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आप राष्ट्रवादी हैं या देशप्रेमी? अंतर समझने की करें कोशिश

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are-you-a-nationalist-or-a-patriot जेएनयू में जो भी घटनाक्रम चल रहा है, धीरे-धीरे उसकी असलियत सामने आ जाएगी लेकिन उस घटना के बाद आम लोग इस तरह भड़के हुए हैं कि खुले आम गोली मार देने की बात करने लगे हैं। राष्ट्रवाद और देशप्रेम के अंतर को समझने की कोशिश कीजियेगा। कुछ साल पहले एक फिल्म देखने के दौरान राष्ट्रगान बजा तो रोहतक के थिएटर हॉल में सिर्फ तीन लड़कियां खड़ी हुईं। मैं और मेरा परिवार बैठा रहा। मेरे पापा ने जब ये देखा तो उन्हें महसूस हुआ। उन्होंने मुझे बताया कि देखो, सिर्फ तीन लड़कियां खड़ी हुईं। हम सभी को ये बात इतनी छू गयी कि उसके बाद से गणतंत्र दिवस की परेड के बाद बजने वाले राष्ट्रगान पर घर में भी खड़े हो जाते थे। 3 लड़कियों ने सिर्फ अपना फ़र्ज़ निभाकर दूसरों को फर्ज़ निभाने के लिए प्रेरित कर दिया। प्रेम कोई भी हो, महसूस होने की चीज़ है। मार-पीट कर महसूस नहीं करवाया जा सकता, आप ऐसा करते हैं तो आप किसी कुंठा के शिकार हैं जिसके बारे में शायद आप ही पता लगा पाएं। भारत के संविधान की प्रस्तावना में साफ़-साफ़ कुछ शब्द लिखे हैं। जिस किसी ने दसवीं तक भी पढ़ाई की है, वो इससे वाकिफ़ होगा। प्रस्तावना में लिखा है कि हम समाजवादी हैं, हम धर्मनिरपेक्ष हैं, हम लोकतांत्रिक हैं। तो समझिए कि इनमें से किसी भी बात को गाली देने वाला राष्ट्र का अपमान कर रहा है। लेकिन हम लोग इस अपमान को नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं। अपने देश में न्याय और बराबरी के लिए लड़िये और अच्छे नागरिक के फ़र्ज़ पूरे करिये, संविधान में लिखे गए कर्तव्यों को निभाइए। संविधान में लिखे कर्त्तव्य भी थोपे नहीं जा सकते हैं। कोई भारत की जय नहीं बोले तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है लेकिन किसी के साथ मार-पीट करने पर आप कानून की नज़र में दोषी ज़रूर होते हैं। आप ऐसी मानसिकता रखते हैं या ऐसा काम करते हैं तो आप बिलकुल राष्ट्र का अपमान कर रहे हैं। इस प्रस्तावना में कहीं भी राष्ट्रवादी होने का ज़िक्र नहीं है। अगर आप किसी पर राष्ट्रवादी होने का दबाव बना रहे हैं तो ये वैसा ही है जैसे आप लड़कियों को कपड़े पहनने की तमीज़ सीखा रहे हैं।
भारत के ज़्यादातर नागरिक अपने देश से प्यार करते हैं, देश के खिलाड़ी अच्छा खेलते हैं तो खुश होते हैं, गर्व करते हैं। ये देशप्रेम है। वही खिलाड़ी अगर बुरा प्रदर्शन करें और आपका घमंड इस तरह चूर-चूर हो जाये कि आप उसके घर पर पत्थर फेंकने लगें तो ये राष्ट्रवाद है। अगर आप समझते हैं कि हम एक अच्छे देश में पैदा हुए तो ये आपका देशप्रेम है, अगर आप समझते हैं कि बाकी देश घटिया हैं तो आप राष्ट्रवादी हैं। देश का मतलब देश के नक़्शे से प्रेम करना नहीं होता। देश सरहद का नाम नहीं है। देश लोगों से बनता है। जिन्होंने ‘एयरलिफ्ट’ फिल्म देखी है, उनके लिए भी ये बात समझना आसान है कि रणजीत किसी देश को नहीं बचा रहा था, लोगों को बचा रहा था, उन्हें भी जो उसे बुरा-भला कह रहे थे। राष्ट्र के लिए प्रेम कभी मानवता के बिना नहीं आ सकता। जिनमें देशप्रेम ज़्यादा जागृत होता दिख रहा है, क्या वो किसी लड़की पर गलत बयानबाज़ी या छेड़खानी पर आवाज़ उठाने की हिम्मत रखते हैं? प्रदूषण ख़त्म करने के लिए भी क्या कभी एकता दिखाते हैं? रिश्वत देने की बजाय लड़ना पसंद करते हैं? कोई फांसी पर लटकता है तो क्या एक बार रुक कर सोचते हैं कि उसके परिवार का अब क्या हो रहा होगा? ज़रा एक बार अपने घर के किसी सदस्य की मौत या उसके साथ हुए अन्याय के बारे में सोचिये। अगर आपके देश के लोगों को अब भी न्याय सुलभ नहीं है तो आपको चिंता करनी चाहिए। अगर आपके देश में एक गरीब व्यक्ति को जेल में डाल दिया जाये और रसूख वाले व्यक्ति आराम से निकल जाएं तो आपको भयभीत होना चाहिए। हमारा टैक्स किसी पर एहसान नहीं है। हमारे लिए सरकार की सुविधाएं भी एहसान नहीं हैं। इस देश की एक अर्थव्यवस्था है और सभी लोग किसी ना किसी तरह इस देश को चला रहे हैं। रही बात सुरक्षा की तो कुछ सरहद पर और कुछ सरहद के अंदर हमारी रक्षा कर रहे हैं और वो सभी आदर के लायक हैं। जो अपना काम भी ईमानदारी से नहीं करते, वो अपने अंदर देशप्रेम को ज़रूर टटोलें। जिस दिन सरकार आपको रोटी मुहैया नहीं करवा पायेगी, साफ़ पानी उपलब्ध नहीं करवा पायेगी, 10 घंटे के लिए बिजली काटने लगेगी, सोचियेगा कि क्या तब आप इस देश के सिस्टम पर सवाल उठाएंगे या नहीं। क्या आपने कभी सवाल उठाएं हैं या नहीं? सवाल उठाते हैं तो आप देशद्रोही नहीं हो जाते हैं। इस देश में हर तरह के असामाजिक तत्व हैं, अपराधी हैं, बलात्कारी हैं, भ्रष्टाचारी हैं, दंगाई हैं। इनके होने से भी इस देश के टुकड़े नहीं हुए और किसी के नारे लगाने से भी नहीं होंगे।
 जब दूसरे देशों में रहने वाले भारतीय भी अपने देश से लगाव रखते हैं तो यहां रहने वाले भी ज़रूर रखते होंगे। जो देश के बारे में ज़्यादा बात नहीं करते वो भी और जो देश की कमियों के बारे में बात करते हैं वो भी। दूसरे देशों की नागरिकता वाले भारतीय जब भारत की क्रिकेट टीम की जीत पर तालियां बजाते हैं तो उन पर देशद्रोह का मुक़दमा तो नहीं ठोक दिया जाता। इस मामले में पाकिस्तान से बराबरी क्यों करना चाहते हैं आप?
बाकी देशों की तरह हमारे देश में भी कमियां हैं, इस पर बात होनी चाहिए ताकि उन्हें दूर किया जा सके। सवा सौ करोड़ भारतीय मिल कर चीख लें कि भारत एक महान देश है, तब भी दुनिया उसे महान नहीं मान लेगी। किसी के इशारों पर मत नाचिये, कोई सरकार या पार्टी हमें नहीं सीखा सकती कि देश से लगाव रखना क्या होता है। किसी किताब में नहीं लिखा कि देशप्रेम क्या होता है और कितनी मात्रा में होता है। राजनीति के लिए धर्म और राष्ट्रवाद तो हथियार रहा है, दुनिया का इतिहास इसका गवाह है। जब बात सत्ता की आती है तो अपराधियों से भी समझौते कर लिए जाते हैं। हम लोग नासमझी में किसी का एजेंडा पूरा करने लगते हैं। इतना ही प्रेम राजनीति ने देश से किया होता तो घोटाले और अन्याय जैसे शब्द हमें याद ना रहते। अगर कानून की नज़र में कोई दोषी है तो उसे सज़ा ज़रूर मिले लेकिन आप देश के प्रति कम-ज़्यादा भावना होने के नाम पर मत बंट जाइये।

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आप राष्ट्रवादी हैं या देशप्रेमी? अंतर समझने की करें कोशिश

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  जेएनयू में जो भी घटनाक्रम चल रहा है, धीरे-धीरे उसकी असलियत सामने आ जाएगी लेकिन उस घटना के बाद आम लोग इस तरह भड़के हुए हैं कि खुले आम गोली मार देने की बात करने लगे हैं। राष्ट्रवाद और देशप्रेम के अंतर को समझने की कोशिश कीजियेगा। कुछ साल पहले एक फिल्म देखने के दौरान राष्ट्रगान बजा तो रोहतक के थिएटर हॉल में सिर्फ तीन लड़कियां खड़ी हुईं। मैं और मेरा परिवार बैठा रहा। मेरे पापा ने जब ये देखा तो उन्हें महसूस हुआ। उन्होंने मुझे बताया कि देखो, सिर्फ तीन लड़कियां खड़ी हुईं। हम सभी को ये बात इतनी छू गयी कि उसके बाद से गणतंत्र दिवस की परेड के बाद बजने वाले राष्ट्रगान पर घर में भी खड़े हो जाते थे। 3 लड़कियों ने सिर्फ अपना फ़र्ज़ निभाकर दूसरों को फर्ज़ निभाने के लिए प्रेरित कर दिया। प्रेम कोई भी हो, महसूस होने की चीज़ है। मार-पीट कर महसूस नहीं करवाया जा सकता, आप ऐसा करते हैं तो आप किसी कुंठा के शिकार हैं जिसके बारे में शायद आप ही पता लगा पाएं। भारत के संविधान की प्रस्तावना में साफ़-साफ़ कुछ शब्द लिखे हैं। जिस किसी ने दसवीं तक भी पढ़ाई की है, वो इससे वाकिफ़ होगा। प्रस्तावना में लिखा है कि हम समाजवादी हैं, हम धर्मनिरपेक्ष हैं, हम लोकतांत्रिक हैं। तो समझिए कि इनमें से किसी भी बात को गाली देने वाला राष्ट्र का अपमान कर रहा है। लेकिन हम लोग इस अपमान को नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं। अपने देश में न्याय और बराबरी के लिए लड़िये और अच्छे नागरिक के फ़र्ज़ पूरे करिये, संविधान में लिखे गए कर्तव्यों को निभाइए। संविधान में लिखे कर्त्तव्य भी थोपे नहीं जा सकते हैं। कोई भारत की जय नहीं बोले तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है लेकिन किसी के साथ मार-पीट करने पर आप कानून की नज़र में दोषी ज़रूर होते हैं। आप ऐसी मानसिकता रखते हैं या ऐसा काम करते हैं तो आप बिलकुल राष्ट्र का अपमान कर रहे हैं। इस प्रस्तावना में कहीं भी राष्ट्रवादी होने का ज़िक्र नहीं है। अगर आप किसी पर राष्ट्रवादी होने का दबाव बना रहे हैं तो ये वैसा ही है जैसे आप लड़कियों को कपड़े पहनने की तमीज़ सीखा रहे हैं।
भारत के ज़्यादातर नागरिक अपने देश से प्यार करते हैं, देश के खिलाड़ी अच्छा खेलते हैं तो खुश होते हैं, गर्व करते हैं। ये देशप्रेम है। वही खिलाड़ी अगर बुरा प्रदर्शन करें और आपका घमंड इस तरह चूर-चूर हो जाये कि आप उसके घर पर पत्थर फेंकने लगें तो ये राष्ट्रवाद है। अगर आप समझते हैं कि हम एक अच्छे देश में पैदा हुए तो ये आपका देशप्रेम है, अगर आप समझते हैं कि बाकी देश घटिया हैं तो आप राष्ट्रवादी हैं। देश का मतलब देश के नक़्शे से प्रेम करना नहीं होता। देश सरहद का नाम नहीं है। देश लोगों से बनता है। जिन्होंने ‘एयरलिफ्ट’ फिल्म देखी है, उनके लिए भी ये बात समझना आसान है कि रणजीत किसी देश को नहीं बचा रहा था, लोगों को बचा रहा था, उन्हें भी जो उसे बुरा-भला कह रहे थे। राष्ट्र के लिए प्रेम कभी मानवता के बिना नहीं आ सकता। जिनमें देशप्रेम ज़्यादा जागृत होता दिख रहा है, क्या वो किसी लड़की पर गलत बयानबाज़ी या छेड़खानी पर आवाज़ उठाने की हिम्मत रखते हैं? प्रदूषण ख़त्म करने के लिए भी क्या कभी एकता दिखाते हैं? रिश्वत देने की बजाय लड़ना पसंद करते हैं? कोई फांसी पर लटकता है तो क्या एक बार रुक कर सोचते हैं कि उसके परिवार का अब क्या हो रहा होगा? ज़रा एक बार अपने घर के किसी सदस्य की मौत या उसके साथ हुए अन्याय के बारे में सोचिये। अगर आपके देश के लोगों को अब भी न्याय सुलभ नहीं है तो आपको चिंता करनी चाहिए। अगर आपके देश में एक गरीब व्यक्ति को जेल में डाल दिया जाये और रसूख वाले व्यक्ति आराम से निकल जाएं तो आपको भयभीत होना चाहिए। हमारा टैक्स किसी पर एहसान नहीं है। हमारे लिए सरकार की सुविधाएं भी एहसान नहीं हैं। इस देश की एक अर्थव्यवस्था है और सभी लोग किसी ना किसी तरह इस देश को चला रहे हैं। रही बात सुरक्षा की तो कुछ सरहद पर और कुछ सरहद के अंदर हमारी रक्षा कर रहे हैं और वो सभी आदर के लायक हैं। जो अपना काम भी ईमानदारी से नहीं करते, वो अपने अंदर देशप्रेम को ज़रूर टटोलें। जिस दिन सरकार आपको रोटी मुहैया नहीं करवा पायेगी, साफ़ पानी उपलब्ध नहीं करवा पायेगी, 10 घंटे के लिए बिजली काटने लगेगी, सोचियेगा कि क्या तब आप इस देश के सिस्टम पर सवाल उठाएंगे या नहीं। क्या आपने कभी सवाल उठाएं हैं या नहीं? सवाल उठाते हैं तो आप देशद्रोही नहीं हो जाते हैं। इस देश में हर तरह के असामाजिक तत्व हैं, अपराधी हैं, बलात्कारी हैं, भ्रष्टाचारी हैं, दंगाई हैं। इनके होने से भी इस देश के टुकड़े नहीं हुए और किसी के नारे लगाने से भी नहीं होंगे।
 जब दूसरे देशों में रहने वाले भारतीय भी अपने देश से लगाव रखते हैं तो यहां रहने वाले भी ज़रूर रखते होंगे। जो देश के बारे में ज़्यादा बात नहीं करते वो भी और जो देश की कमियों के बारे में बात करते हैं वो भी। दूसरे देशों की नागरिकता वाले भारतीय जब भारत की क्रिकेट टीम की जीत पर तालियां बजाते हैं तो उन पर देशद्रोह का मुक़दमा तो नहीं ठोक दिया जाता। इस मामले में पाकिस्तान से बराबरी क्यों करना चाहते हैं आप?
बाकी देशों की तरह हमारे देश में भी कमियां हैं, इस पर बात होनी चाहिए ताकि उन्हें दूर किया जा सके। सवा सौ करोड़ भारतीय मिल कर चीख लें कि भारत एक महान देश है, तब भी दुनिया उसे महान नहीं मान लेगी। किसी के इशारों पर मत नाचिये, कोई सरकार या पार्टी हमें नहीं सीखा सकती कि देश से लगाव रखना क्या होता है। किसी किताब में नहीं लिखा कि देशप्रेम क्या होता है और कितनी मात्रा में होता है। राजनीति के लिए धर्म और राष्ट्रवाद तो हथियार रहा है, दुनिया का इतिहास इसका गवाह है। जब बात सत्ता की आती है तो अपराधियों से भी समझौते कर लिए जाते हैं। हम लोग नासमझी में किसी का एजेंडा पूरा करने लगते हैं। इतना ही प्रेम राजनीति ने देश से किया होता तो घोटाले और अन्याय जैसे शब्द हमें याद ना रहते। अगर कानून की नज़र में कोई दोषी है तो उसे सज़ा ज़रूर मिले लेकिन आप देश के प्रति कम-ज़्यादा भावना होने के नाम पर मत बंट जाइये।

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वो कौन है जो अचानक आकर पत्रकार और भीड़ को डरा कर चला जाता है

akb threaten-journalists इस बीच जब ये खबर आ रही है कि यूपी सरकार ने कल रवीश कुमार की प्राइम टाइम रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए खोड़ा के एसबीआई बैंक में काउंटर बढ़ा दिए और मोबाइल एटीएम का इंतज़ाम किया है तब मैं पिछले दो दिन की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव को लिखने बैठी हूं. बुधवार को खोड़ा में रवीश कुमार के साथ मैं भी रिपोर्टिंग पर गयी थी. वहां हमने देखा और रवीश ने भी कई बार दोहराया कि जैसे ही कोई नोटबंदी की वजह से आ रही परेशानियों पर कुछ कहता है तो कहीं से एक दबंग आवाज़ आती है कि क्या हो गया परेशानी है तो, मोदी जी ने ठीक किया. लोग अपनी बात फिर से संकोच के साथ शुरू करते हैं कि हां, हम भी साथ हैं लेकिन खाने को पैसे नहीं हैं. कल जब शूट खत्म हुआ तो दो बाइक सवार आये और रवीश से बोले कि आप ही के चैनल पर भीड़ दिख रही है बैंकों के सामने, कुछ और भी दिखाइए. उसका बोलना आरोप जैसा लग रहा था. 93% गांवों में बैंक ही नहीं हैं, देश के बैंकिंग सिस्टम की हालत साफ़ नज़र आ रही है और फिर भी पता नहीं कौन से सुहाने सपने दिखाने की उम्मीद कर रहे हैं ऐसे लोग. क्या मीडिया जनता का माइक नहीं होनी चाहिए? क्या वो सिर्फ सरकार और राजनीतिक दलों को प्रेस कांफ्रेंस दिखाने के लिए है? मैं नहीं जानती कि ऐसे लोग एक न्यूज़ चैनल पर और क्या देखना चाहते हैं. शायद, बागों में बहार, वो भी बेमौसम. आज बुलंदशहर पहुंचे. जिस बैंक में गए, वो 16 गांवों में अकेला बैंक था, लोग शिकायत करने लगे. हमारी गाड़ी के पीछे एक गाड़ी आकर खड़ी हुई जिस पर वीआईपी का स्टीकर लगा था. लोग अपनी समस्या कह ही रहे थे तभी एक व्यक्ति वहां आया जो पहले से उस भीड़ में मौजूद नहीं था. उसने रवीश को कहा कि परेशानी है तो क्या हुआ, बॉर्डर से ज़्यादा नहीं है, बॉर्डर पर 80% जाट मरते हैं और मैं भी जाट हूं. कल आरोप की तरह बात की गयी और आज ये व्यक्ति धमकाने लगा, अपने साथ कुछ लड़कों को लाया था और उनके साथ मिलकर मोदी मोदी चिल्लाने लगा. बाकी लोग उन नारों की आवाज़ से चुप हो गए जैसे किसी ने सावधान की मुद्रा में खड़े रहने को कहा हो. हम बिगड़ते हालात को देख कर वहां से निकल गए और ये व्यक्ति भी बिना पैसा लिए या बैंक की लाइन में लगे वहां से अपनी स्कूटी पर चला गया. वक़्त कुछ ऐसा ही है कि जान कोई दे रहा है और उसकी जान की कीमत उसकी जाति के लोग घर बैठे वसूल रहे हैं. बिना कुछ किये. गुंडागर्दी करते हुए आप बता रहे हैं कि जाट हैं तो क्या आप उस जाति की इज़्ज़त को बढ़ा रहे हैं या घटा रहे हैं? फिर हम एक अनाजमंडी पहुंचे, जहां लोग यूरिया खरीदने के लिए लाइन लगाये हुए थे. किसी ने बताया कि उसने अभी धान बेचा और नकद मिला जिसमें पुराने 500 और 1000 के नोट हैं लेकिन यूरिया इन पैसों से नहीं मिल रहा. मुझे उन लोगों में पीछे खड़ा हुआ एक 22-23 साल का एक लड़का दिखा जो उस भीड़ से अलग ही लग रहा था. चमड़े की जैकेट, चश्मा लगाया हुआ था. उसने जाकर किसी को फ़ोन मिलाया, मैं उसे नोट कर रही थी. अचानक उस मंडी का कोई पल्लेदार आया और रवीश के ऊपर चिल्लाने लगा कि आप किसलिए 500 के नोट दिखा रहे हैं, हमने तो दिए नहीं, आप खुद दे रहे हैं. बिना किसी वजह के इस तरह का हमला औचक था. रवीश को और कैमरामैन को घेरने की कोशिश की, लेकिन वो और टीम के लोग गेट से पैदल बाहर निकल गए. पल्लेदार ने अपने लोगों के साथ मिलकर गेट बंद कर दिया और हमारी गाड़ी अंदर ही रह गयी. मैं पहले ही थोड़ा अलग हो गयी थी और एक छोटे गेट से निकल आई. हम कुछ मीटर पैदल चले जब तक गाड़ी बाहर नहीं निकली. वो लड़का जो मंडी में दिखा था, वो अपने साथी के साथ बाइक पर लगातार पीछा कर रहा था. हमने पुलिस को बुलाया. मैं बाइक का नंबर नोट कर चुकी थी और पुलिस को दे दिया. पुलिस ने हमारी मदद की और बहुत जल्दी मदद के लिए पहुंची. उसके बाद भी जब हम दिल्ली की तरफ निकले तो एक और वीआईपी स्टीकर वाली गाड़ी ने काफी दूर तक पीछा किया. लग रहा था मानो हम किसी निगरानी में हैं. मैं फैसला नहीं कर पा रही हूं कि ग्राउंड रिपोर्टिंग करनी चाहिये या नहीं. आज भीड़ की आड़ में कुछ भी किया जा सकता था. मौका ढूंढा जा रहा है कि किसी तरह उस आवाज़ को ख़त्म कर दें जो आपको गवारा नहीं. कभी पत्रकारों के साथ वकील के भेस में गुंडे कोर्ट परिसर में मार-पीट करते हैं, कभी बैन लगाने की कोशिश होती है, कभी किसी ट्विटर पर ट्रेंड करा गिराना चाहते हैं तो कभी देशद्रोही का सर्टिफिकेट बांटने में देरी नहीं लगाते. ये किसी एक के साथ नहीं हो रहा. और ऐसा चाहने वाली जनता नहीं है. क्योंकि रवीश कुमार ने खोड़ा पर रवीश की रिपोर्ट पहले भी की है, दिल्ली के कई इलाकों में कांग्रेस सरकार के दौरान रिपोर्ट की है, तब भी तो यही जनता थी. हां, राजनीतिक दलों के आईटी सेल नहीं बने थे तब. आज हैं और बड़े आराम से सोशल मीडिया का अपने लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. योजनाएं तो इस देश में पहले भी बनीं और विपक्ष में रहते हुए आज की सरकार ने खूब सवाल किये. अगर आज किसी योजना के लागू होने में दिक्कतें आ रही हैं और लगातार कई दिन से आ रही हैं तो क्या किया जाना चाहिये, एक कीर्तन मंडली बैठा देनी चाहिए चैनल पर जो भजन गाती रहे. काफी 'कंस्ट्रक्टिव' होगा देश के लिए. सिस्टम की हालत तो पहले भी यही थी, लेकिन क्या सरकार को इसलिए बदला गया था कि सिस्टम को ज्यों का त्यों रखे? होना तो यही चाहिए कि एक सरकार मीडिया रिपोर्ट का संज्ञान लेकर सुधार करे लेकिन कुछ सरकारें ऐसी भी होती हैं जो सारे संसाधन ऐसी रिपोर्ट को बंद करवाने में खपा देती हैं. खैर, तोहमतें चन्द अपने ज़िम्मे धर चले... जिस लिए आये थे हम, सो कर चले.

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'दंगल' का बापू हानिकारक नहीं, क्रांतिकारक है !

akb dangal-and-mahavir-phogat दावे से तो नहीं कह सकती लेकिन मैंने कभी किसी लड़के या लड़की को ये कहते हुए नहीं सुना कि उसकी अपनी मां से नहीं बनती या कोई वैचारिक मतभेद हैं. हमेशा पिता ही इस ईगो की लड़ाई में एक पार्टी होता है. इतिहास ने भी बाप-बेटे में लड़ाइयां देखी हैं. समाज भी देखता आ रहा है. हक़, इज़्ज़त और 'मैं' के ये भाव पिता में ही ज़्यादा देखे जाते हैं. पितृसत्ता की एक शाखा यह भी मानी जा सकती है. फ़िल्म 'दंगल' का महावीर फोगाट शायद उसी 'ईगो' और सख्ती से काम लेता है जैसा आमतौर पर हर पिता. लेकिन फिर भी इस आम व्यक्ति में हम सबका हीरो होने के लिए गुंजाइश बनी रहती है. क्योंकि हम उसमें वह देख पा रहे हैं जो शायद हम अपने पिताओं में देखना चाहते थे. क्रांति भी तो सापेक्ष (रिलेटिव) है और नज़रिये से मुक्त नहीं है. इस पिता को देखने के दो नज़रिये बिल्कुल हो सकते हैं. हम सब इस फ़िल्म को एक बच्चे के नज़रिये से नहीं देख पाये. गौर से देखते तो पाते कि एक आम इंसान जितनी कमज़ोरियां और कमियां इस पिता में भी मौजूद हैं. हमें ना पिता की कमज़ोरियां नज़र आयीं और ना उनका घमंड. इस नज़रिये के लिए स्कोप भी कम ही रखा गया था. हम सबने इस पिता को ही हीरो माना क्योंकि हम अपने पिता में उस क्रांति के लिए हिम्मत और सहयोग देखना चाहते हैं जो महावीर फोगाट ने अपनी बेटियों के लिए दिखाया. ऐसी जगह पहली बार ऐसा कदम उठाया जहां की लड़कियों के लिए घर से बाहर पहला कदम ससुराल के लिए तय होता है. हो सकता है कि आज लड़कियां कामयाब हो गयी तो इसलिए हम सब उनके पिता की तारीफ़ कर रहे हैं लेकिन कामयाब ना भी होतीं तो क्या योगदान कम होता? बात यहां सिर्फ पिता और उसकी बेटियों तक सीमित नहीं रह जाती, सिर्फ पिता के सपनों तक सीमित नहीं रह जाती बल्कि समाज में एक विमर्श और साहस को जन्म देती है. mahavir-phogat जब 2016 ओलिंपिक्स चल रहे थे और बबीता कुमारी का मैच कुछ घंटे बाद होने वाला था. तब लिखा था कि एक पिता की हिम्मत कितनी बेटियों की राह आसान कर देती है. ओलिंपिक्स शुरू होने से पहले पापा ने यूं ही एक दिन महावीर फोगाट का ज़िक्र छेड़ा और मुझसे कहा कि 'देखो, वो पहलवान महावीर फोगाट पर फिल्म बन रही है और इस फ़िल्म में आमिर खान है.' फिर मां की ओर देख कर कहा कि 'सोचो, जब उसने उस ज़माने में अपनी सभी बेटियों को पहलवान बनाने का सोचा होगा, तब गांव वालों ने क्या-क्या नहीं कहा होगा उसे. कोई ताने के लहज़े में कहता होगा कि 'हाँ, यो बनावेगा छोरियां ने पहलवान!' किसी रिश्तेदार ने ज़रूर सलाह दी होगी कि इनकी शादी होनी मुश्किल हो जाएगी. लेकिन फिर भी उसने सुनी नहीं और सभी बेटियों को पहलवानी में उतारा. आज देखो, बेटियां मैडल जीत रही हैं, लोग फिल्म बना रहे हैं.'

 पूरी फ़िल्म और पापा की बातों में काफी समानता थी. शायद उनका हरियाणवी होना इसकी वजह हो. उस वक़्त तो मैं पापा से इतना ही कह पायी कि जो पहली बार हिम्मत करता है, ऐसी सफलता का वह ही हक़दार है. क्रांति के 'रिस्क' उसके सिर, तो सफलता का सेहरा भी उसी के सिर. दूसरे की सफलता को देख कर नक़ल करने वाले और ज़माने को देख कर चलने वाले तो देश में 90 फीसदी हैं ही. इस नक़ल के चक्कर में ज़बरदस्ती अपने बच्चों में वो क्षमता ढूंढने लगते हैं जो उनमें होती ही नहीं. दूसरे की सफलता को देख अपना सपना बुन लेते हैं और उसे बच्चों पर लादने लगते हैं. वो पहला कदम उठाने की हिम्मत नहीं कर पाते. लड़कियों में तो किसी क्षमता को देखना चाहते भी नहीं. क्योंकि उस क्षमता को कामयाबी बनाने की कीमत उन्हें ज़्यादा लगती है. इस बातचीत के बाद मन ही मन मैं भी सोचने लगी कि क्या मेरे पिता मुझे पहली महिला पत्रकार या महिला डॉक्टर होने देते?
Geeta Phogat ये बताना कई बार बहुत ज़रूरी हो जाता है कि जो लड़कियां सफल हो रही हैं, वो आखिर किस क्षेत्र और पृष्ठभूमि की हैं. पापा की बात से मुझे यह तो एहसास हो गया कि सफलता ज़रूरी है और खासकर लड़कियों की सफलता को जब दिल से सराहते हैं तो कितने ही पिताओं पर उसका असर होता है. फ़िल्म के आखिर में भी यही संदेश आमिर खान महावीर के मार्फ़त हमें दे रहे हैं. दंगल फ़िल्म के ज़रिये महावीर फोगाट के बारे में आज बहुत से लोग जान रहे हैं. उससे पहले हरियाणा के काफी लोग उन्हें उनकी बेटियों की सफलता की वजह से जान रहे थे. बहुत सी कामयाब लड़कियां दुनिया के सामने 'बोल्ड' होकर खड़ी हैं लेकिन ये वो ही जानती हैं कि कितनी लड़ाइयां उन्हें अपने घर में अकेले ही लड़नी पड़ीं. शायद आज भी लड़ ही रही हैं. कामयाबी के बाद मां-बाप को गले लगाते तो देखा है लेकिन कामयाबी से पहले दुनिया के सामने हाथ पकड़ कर खड़े होने वाले पिता कम ही देखे. महावीर में वो ही पिता हम सब देख पा रहे हैं. ये लड़कियां और उनके पिता ही हैं जो समाज में बदलाव ला रहे हैं, सरकारी योजनाएं और दिल बहलाऊ नारे नहीं. खिलाड़ी कहने को तो देश के लिए लड़ रहे हैं लेकिन ये कहते हुए उनके दिल के किसी कोने से हूक ज़रूर उठती होगी कि देश के लोगों से, देश के समाज से लड़कर ही तो आज देश के लिए मुक़ाबला करने पहुंचे हैं. उनकी मेहनत से मिली कामयाबी को देश की कामयाबी का नाम देकर हम भी थोड़ा गर्व चुरा लेते है. जबकि हम सिर्फ दर्शक होते हैं और दर्शक के रूप में ही अपना रोल समझते हैं, चाहे खेल हो या फ़िल्म हो. समाज में भी दर्शक का ही रोल निभाकर खुश हैं. फ़िल्म हरियाणा की पृष्ठभूमि पर बनी है. हरियाणा का सटीक चित्रण भी है. लेकिन फ़िल्म देख कर हरियाणा पर गर्व नहीं होता. होता है तो महावीर सिंह फोगाट पर और ऐसे विरले पिताओं पर जिन पर फ़िल्म तो नहीं बनी लेकिन कहीं ना कहीं अपनी बेटियों के साथ हम सब बेटियों का 'बोझ' कुछ हल्का कर रहे हैं.

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जेएनयू का फैसला क्या कानूनी तौर पर टिक पाएगा?

akb jnus-decision-will-stand-legally जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने तय किया है कि अब एम फिल और पीएचडी कोर्स में दाखिले के लिए एक क्वालीफाइंग परीक्षा होगी और उसके बाद उम्मीदवार का चयन इंटरव्यू के आधार पर होगा. विश्वविद्यालय का कहना है कि ये फैसला यूजीसी के नोटिफिकेशन के आधार पर लिया गया है. अब तक जो प्रवेश परीक्षा होती थी उसमें 70% अंक लिखित परीक्षा के लिए रखे गए थे और 30% मौखिक परीक्षा यानी इंटरव्यू के लिए. लेकिन अब आपको पहला पेपर सिर्फ 50% अंकों के साथ क्वालीफाई करना है और उसके बाद चयन सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर होगा यानी एक तरह से मौखिक परीक्षा के लिए 100% अंक रखे गए हैं. अगर यह यूजीसी का आदेश है तो बाकी केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर भी लागू होगा. हालांकि जेएनयू यूजीसी के सामने इस फैसले पर दोबारा गौर करने के लिए कह सकता था लेकिन जेएनयू ने इसे अपनाना बेहतर समझा. जेएनयू के इस फैसले को लिए जाने के वक्त जब कुछ छात्रों ने इसका विरोध किया तो नौ छात्रों को सस्पेंड भी कर दिया गया. जेएनयू के शिक्षक संगठन ने भी इसका विरोध किया है. फिलहाल पीएचडी का ही एक छात्र दिलीप यादव भूख हड़ताल पर है क्योंकि उनका मानना है कि इंटरव्यू में भेदभाव होने की काफी गुंजाइश है और यह गरीब और शोषित छात्रों के लिए नुकसानदेह है. अभी तक यह पता नहीं है कि इस फैसले के खिलाफ सिर्फ विरोध प्रदर्शन ही हो रहा है या कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया गया है. भेदभाव होने की गुंजाइश और इंटरव्यू के लिए इतने अंक तय करने को सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मुकदमों में अनुचित ठहराया है. अजय हसिया आदि बनाम खालिद मुजीब सेहरावती और अन्य - 13 नवंबर 1980' इस केस में जम्मू- कश्मीर के एक स्थानीय इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश परीक्षा को लेकर याचिका दाखिल की गई. इस याचिका पर अपने फैसले में कोर्ट ने लिखा जिसका हिंदी अनुवाद कर रही हूं- "इसमें कोई शक नहीं कि एक उम्मीदवार की क्षमता को मापने के लिए मौखिक परीक्षा कोई संतोषजनक परीक्षा नहीं है. लेकिन किसी के व्यक्तित्व को आंकने का कोई और बेहतर विकल्प अगर नहीं है तो मौखिक परीक्षा को फिलहाल तर्कहीन या व्यर्थ नहीं माना जा सकता हालांकि यह 'सब्जेक्टिव' है और 'फर्स्ट इम्प्रैशन' पर आधारित होता है. इसके नतीजे बहुत सी वजहों से प्रभावित भी हो सकते हैं और इसका दुरुपयोग भी संभव है. किसी कॉलेज में दाखिले के लिए या किसी सरकारी नौकरी के लिए भी मौखिक परीक्षा पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता. हां, इसे अतिरिक्त परीक्षा के तौर पर रखा जा सकता है. साथ ही बहुत ध्यान देना होगा कि जो लोग इंटरव्यू ले रहे हैं वे ईमानदार, सक्षम और योग्य हों. यह देखते हुए कि मौखिक परीक्षा में क्या नुकसान और कमियां हैं और साथ ही देश में जो स्थिति हैं, जहां नैतिकता गिर रही है और भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद बढ़ रहा है, ऐसे वक्त में मौखिक परीक्षा के लिए लिखित परीक्षा से ज्यादा अंक रखना 'आरबिटरेरी' है, यानी एक मनमाना फैसला है. 15% से ज्यादा अंक इंटरव्यू के लिए रखना अनुचित है." प्रवीण सिंह बनाम पंजाब राज्य और अन्य - 10 नवंबर 2000 इस केस में पब्लिक सर्विस कमीशन ने पंचायत अधिकारी के चुनाव के लिए एक 'क्वालीफाइंग' पेपर रखा जिसमें उम्मीदवार को कुल 45% नंबर लाने थे और उसके बाद चयन के लिए इंटरव्यू के 50 नंबर को तरजीह दी गई. यानी इंटरव्यू के आधार पर उम्मीदवार को चुना जाना था. सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, "मौखिक परीक्षा यानी इंटरव्यू को चयन का एकमात्र जरिया बनाए जाने में हमेशा संदेह की गुंजाइश होती है. आपने 400 नंबर का क्वालीफाइंग पेपर क्यों रखा जब इंटरव्यू के 50 नंबर ही चयन का आधार हैं. कोर्ट की नजर में यह उचित नहीं है." कानूनी तौर पर इस फैसले के टिक जाने की गुंजाइश कम ही है. लेकिन इंटरव्यू में भ्रष्टाचार होने की बात को प्रधानमंत्री भी मान चुके हैं. अक्टूबर 2015 में अपने मन की बात कार्यक्रम में उन्होंने केंद्र सरकार के ग्रुप ‘डी’, ग्रुप ‘सी’ और ग्रुप ‘बी के पदों में इंटरव्यू की प्रक्रिया को खत्म करते हुए बताया,"मैंने 15 अगस्त को लाल किले से यह कहा था कि कुछ बातें हैं जहां भ्रष्टाचार घर कर गया है. गरीब व्यक्ति जब छोटी-छोटी नौकरी के लिए जाता है, किसी की सिफारिश के लिए पता नहीं क्या-क्या उसको कष्ट झेलने पड़ते हैं और दलालों की टोली कैसे-कैसे उनसे रुपये हड़प लेती है. नौकरी मिले तो भी रुपये जाते हैं, नौकरी न मिले तो भी रुपये जाते हैं. सारी खबरें हम सुनते थे...और उसी में से मेरे मन में एक विचार आया था कि छोटी-छोटी नौकरियों के लिए इंटरव्यू की क्या जरूरत है. मैंने तो कभी सुना नहीं है कि दुनिया में कोई ऐसा मनोवैज्ञानिक है जो एक मिनट, दो मिनट के इंटरव्यू में किसी व्यक्ति को पूरी तरह जांच लेता है...और इसी विचार से मैंने घोषणा की थी कि क्यों न हम ये छोटी पायरी की नौकरियां है, वहां पर, इंटरव्यू की परम्परा खत्म करें.'' कम से कम 18 राज्यों ने जूनियर लेवल पोस्ट के लिए इंटरव्यू को खत्म कर दिया है. यूपीएससी की परीक्षा में भी क्वालीफाइंग पेपर होता है लेकिन उसके बाद लिखित परीक्षा और इंटरव्यू भी होता है. इंटरव्यू के लिए लिखित परीक्षा से कम अंक रखे गए हैं. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी खास पद के लिए इंटरव्यू को तरजीह दी जाती है जहां उस पद के लिए व्यक्तित्व का आकलन बेहद जरूरी हो. लेकिन जेएनयू प्रशासन और यूजीसी को यह साबित करना होगा कि एम फिल और पीएचडी में दाखिले के लिए व्यक्तित्व को आंकने की आखिर क्या जरूरत है. इंटरव्यू के आधार पर एक कोर्स में दाखिले के लिए इतने अंक तय करना बेशक सवाल खड़े करता है.

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जेएनयू का फैसला क्या कानूनी तौर पर टिक पाएगा?

akb jnus-decision-will-stand-legally जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने तय किया है कि अब एम फिल और पीएचडी कोर्स में दाखिले के लिए एक क्वालीफाइंग परीक्षा होगी और उसके बाद उम्मीदवार का चयन इंटरव्यू के आधार पर होगा. विश्वविद्यालय का कहना है कि ये फैसला यूजीसी के नोटिफिकेशन के आधार पर लिया गया है. अब तक जो प्रवेश परीक्षा होती थी उसमें 70% अंक लिखित परीक्षा के लिए रखे गए थे और 30% मौखिक परीक्षा यानी इंटरव्यू के लिए. लेकिन अब आपको पहला पेपर सिर्फ 50% अंकों के साथ क्वालीफाई करना है और उसके बाद चयन सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर होगा यानी एक तरह से मौखिक परीक्षा के लिए 100% अंक रखे गए हैं. अगर यह यूजीसी का आदेश है तो बाकी केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर भी लागू होगा. हालांकि जेएनयू यूजीसी के सामने इस फैसले पर दोबारा गौर करने के लिए कह सकता था लेकिन जेएनयू ने इसे अपनाना बेहतर समझा. जेएनयू के इस फैसले को लिए जाने के वक्त जब कुछ छात्रों ने इसका विरोध किया तो नौ छात्रों को सस्पेंड भी कर दिया गया. जेएनयू के शिक्षक संगठन ने भी इसका विरोध किया है. फिलहाल पीएचडी का ही एक छात्र दिलीप यादव भूख हड़ताल पर है क्योंकि उनका मानना है कि इंटरव्यू में भेदभाव होने की काफी गुंजाइश है और यह गरीब और शोषित छात्रों के लिए नुकसानदेह है. अभी तक यह पता नहीं है कि इस फैसले के खिलाफ सिर्फ विरोध प्रदर्शन ही हो रहा है या कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया गया है. भेदभाव होने की गुंजाइश और इंटरव्यू के लिए इतने अंक तय करने को सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मुकदमों में अनुचित ठहराया है. अजय हसिया आदि बनाम खालिद मुजीब सेहरावती और अन्य - 13 नवंबर 1980' इस केस में जम्मू- कश्मीर के एक स्थानीय इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश परीक्षा को लेकर याचिका दाखिल की गई. इस याचिका पर अपने फैसले में कोर्ट ने लिखा जिसका हिंदी अनुवाद कर रही हूं- "इसमें कोई शक नहीं कि एक उम्मीदवार की क्षमता को मापने के लिए मौखिक परीक्षा कोई संतोषजनक परीक्षा नहीं है. लेकिन किसी के व्यक्तित्व को आंकने का कोई और बेहतर विकल्प अगर नहीं है तो मौखिक परीक्षा को फिलहाल तर्कहीन या व्यर्थ नहीं माना जा सकता हालांकि यह 'सब्जेक्टिव' है और 'फर्स्ट इम्प्रैशन' पर आधारित होता है. इसके नतीजे बहुत सी वजहों से प्रभावित भी हो सकते हैं और इसका दुरुपयोग भी संभव है. किसी कॉलेज में दाखिले के लिए या किसी सरकारी नौकरी के लिए भी मौखिक परीक्षा पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता. हां, इसे अतिरिक्त परीक्षा के तौर पर रखा जा सकता है. साथ ही बहुत ध्यान देना होगा कि जो लोग इंटरव्यू ले रहे हैं वे ईमानदार, सक्षम और योग्य हों. यह देखते हुए कि मौखिक परीक्षा में क्या नुकसान और कमियां हैं और साथ ही देश में जो स्थिति हैं, जहां नैतिकता गिर रही है और भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद बढ़ रहा है, ऐसे वक्त में मौखिक परीक्षा के लिए लिखित परीक्षा से ज्यादा अंक रखना 'आरबिटरेरी' है, यानी एक मनमाना फैसला है. 15% से ज्यादा अंक इंटरव्यू के लिए रखना अनुचित है." प्रवीण सिंह बनाम पंजाब राज्य और अन्य - 10 नवंबर 2000 इस केस में पब्लिक सर्विस कमीशन ने पंचायत अधिकारी के चुनाव के लिए एक 'क्वालीफाइंग' पेपर रखा जिसमें उम्मीदवार को कुल 45% नंबर लाने थे और उसके बाद चयन के लिए इंटरव्यू के 50 नंबर को तरजीह दी गई. यानी इंटरव्यू के आधार पर उम्मीदवार को चुना जाना था. सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, "मौखिक परीक्षा यानी इंटरव्यू को चयन का एकमात्र जरिया बनाए जाने में हमेशा संदेह की गुंजाइश होती है. आपने 400 नंबर का क्वालीफाइंग पेपर क्यों रखा जब इंटरव्यू के 50 नंबर ही चयन का आधार हैं. कोर्ट की नजर में यह उचित नहीं है." कानूनी तौर पर इस फैसले के टिक जाने की गुंजाइश कम ही है. लेकिन इंटरव्यू में भ्रष्टाचार होने की बात को प्रधानमंत्री भी मान चुके हैं. अक्टूबर 2015 में अपने मन की बात कार्यक्रम में उन्होंने केंद्र सरकार के ग्रुप ‘डी’, ग्रुप ‘सी’ और ग्रुप ‘बी के पदों में इंटरव्यू की प्रक्रिया को खत्म करते हुए बताया,"मैंने 15 अगस्त को लाल किले से यह कहा था कि कुछ बातें हैं जहां भ्रष्टाचार घर कर गया है. गरीब व्यक्ति जब छोटी-छोटी नौकरी के लिए जाता है, किसी की सिफारिश के लिए पता नहीं क्या-क्या उसको कष्ट झेलने पड़ते हैं और दलालों की टोली कैसे-कैसे उनसे रुपये हड़प लेती है. नौकरी मिले तो भी रुपये जाते हैं, नौकरी न मिले तो भी रुपये जाते हैं. सारी खबरें हम सुनते थे...और उसी में से मेरे मन में एक विचार आया था कि छोटी-छोटी नौकरियों के लिए इंटरव्यू की क्या जरूरत है. मैंने तो कभी सुना नहीं है कि दुनिया में कोई ऐसा मनोवैज्ञानिक है जो एक मिनट, दो मिनट के इंटरव्यू में किसी व्यक्ति को पूरी तरह जांच लेता है...और इसी विचार से मैंने घोषणा की थी कि क्यों न हम ये छोटी पायरी की नौकरियां है, वहां पर, इंटरव्यू की परम्परा खत्म करें.'' कम से कम 18 राज्यों ने जूनियर लेवल पोस्ट के लिए इंटरव्यू को खत्म कर दिया है. यूपीएससी की परीक्षा में भी क्वालीफाइंग पेपर होता है लेकिन उसके बाद लिखित परीक्षा और इंटरव्यू भी होता है. इंटरव्यू के लिए लिखित परीक्षा से कम अंक रखे गए हैं. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी खास पद के लिए इंटरव्यू को तरजीह दी जाती है जहां उस पद के लिए व्यक्तित्व का आकलन बेहद जरूरी हो. लेकिन जेएनयू प्रशासन और यूजीसी को यह साबित करना होगा कि एम फिल और पीएचडी में दाखिले के लिए व्यक्तित्व को आंकने की आखिर क्या जरूरत है. इंटरव्यू के आधार पर एक कोर्स में दाखिले के लिए इतने अंक तय करना बेशक सवाल खड़े करता है.

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akb     jnus-decision-will-stand-legally जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने तय किया है कि अब एम फिल और पीएचडी कोर्स में दाखिले के लिए एक क्वालीफाइंग परीक्षा होगी और उसके बाद उम्मीदवार का चयन इंटरव्यू के आधार पर होगा. विश्वविद्यालय का कहना है कि ये फैसला यूजीसी के नोटिफिकेशन के आधार पर लिया गया है. अब तक जो प्रवेश परीक्षा होती थी उसमें 70% अंक लिखित परीक्षा के लिए रखे गए थे और 30% मौखिक परीक्षा यानी इंटरव्यू के लिए. लेकिन अब आपको पहला पेपर सिर्फ 50% अंकों के साथ क्वालीफाई करना है और उसके बाद चयन सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर होगा यानी एक तरह से मौखिक परीक्षा के लिए 100% अंक रखे गए हैं. अगर यह यूजीसी का आदेश है तो बाकी केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर भी लागू होगा. हालांकि जेएनयू यूजीसी के सामने इस फैसले पर दोबारा गौर करने के लिए कह सकता था लेकिन जेएनयू ने इसे अपनाना बेहतर समझा. जेएनयू के इस फैसले को लिए जाने के वक्त जब कुछ छात्रों ने इसका विरोध किया तो नौ छात्रों को सस्पेंड भी कर दिया गया. जेएनयू के शिक्षक संगठन ने भी इसका विरोध किया है. फिलहाल पीएचडी का ही एक छात्र दिलीप यादव भूख हड़ताल पर है क्योंकि उनका मानना है कि इंटरव्यू में भेदभाव होने की काफी गुंजाइश है और यह गरीब और शोषित छात्रों के लिए नुकसानदेह है. अभी तक यह पता नहीं है कि इस फैसले के खिलाफ सिर्फ विरोध प्रदर्शन ही हो रहा है या कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया गया है. भेदभाव होने की गुंजाइश और इंटरव्यू के लिए इतने अंक तय करने को सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मुकदमों में अनुचित ठहराया है. अजय हसिया आदि बनाम खालिद मुजीब सेहरावती और अन्य - 13 नवंबर 1980' इस केस में जम्मू- कश्मीर के एक स्थानीय इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश परीक्षा को लेकर याचिका दाखिल की गई. इस याचिका पर अपने फैसले में कोर्ट ने लिखा जिसका हिंदी अनुवाद कर रही हूं- "इसमें कोई शक नहीं कि एक उम्मीदवार की क्षमता को मापने के लिए मौखिक परीक्षा कोई संतोषजनक परीक्षा नहीं है. लेकिन किसी के व्यक्तित्व को आंकने का कोई और बेहतर विकल्प अगर नहीं है तो मौखिक परीक्षा को फिलहाल तर्कहीन या व्यर्थ नहीं माना जा सकता हालांकि यह 'सब्जेक्टिव' है और 'फर्स्ट इम्प्रैशन' पर आधारित होता है. इसके नतीजे बहुत सी वजहों से प्रभावित भी हो सकते हैं और इसका दुरुपयोग भी संभव है. किसी कॉलेज में दाखिले के लिए या किसी सरकारी नौकरी के लिए भी मौखिक परीक्षा पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता. हां, इसे अतिरिक्त परीक्षा के तौर पर रखा जा सकता है. साथ ही बहुत ध्यान देना होगा कि जो लोग इंटरव्यू ले रहे हैं वे ईमानदार, सक्षम और योग्य हों. यह देखते हुए कि मौखिक परीक्षा में क्या नुकसान और कमियां हैं और साथ ही देश में जो स्थिति हैं, जहां नैतिकता गिर रही है और भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद बढ़ रहा है, ऐसे वक्त में मौखिक परीक्षा के लिए लिखित परीक्षा से ज्यादा अंक रखना 'आरबिटरेरी' है, यानी एक मनमाना फैसला है. 15% से ज्यादा अंक इंटरव्यू के लिए रखना अनुचित है." प्रवीण सिंह बनाम पंजाब राज्य और अन्य - 10 नवंबर 2000 इस केस में पब्लिक सर्विस कमीशन ने पंचायत अधिकारी के चुनाव के लिए एक 'क्वालीफाइंग' पेपर रखा जिसमें उम्मीदवार को कुल 45% नंबर लाने थे और उसके बाद चयन के लिए इंटरव्यू के 50 नंबर को तरजीह दी गई. यानी इंटरव्यू के आधार पर उम्मीदवार को चुना जाना था. सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, "मौखिक परीक्षा यानी इंटरव्यू को चयन का एकमात्र जरिया बनाए जाने में हमेशा संदेह की गुंजाइश होती है. आपने 400 नंबर का क्वालीफाइंग पेपर क्यों रखा जब इंटरव्यू के 50 नंबर ही चयन का आधार हैं. कोर्ट की नजर में यह उचित नहीं है." कानूनी तौर पर इस फैसले के टिक जाने की गुंजाइश कम ही है. लेकिन इंटरव्यू में भ्रष्टाचार होने की बात को प्रधानमंत्री भी मान चुके हैं. अक्टूबर 2015 में अपने मन की बात कार्यक्रम में उन्होंने केंद्र सरकार के ग्रुप ‘डी’, ग्रुप ‘सी’ और ग्रुप ‘बी के पदों में इंटरव्यू की प्रक्रिया को खत्म करते हुए बताया,"मैंने 15 अगस्त को लाल किले से यह कहा था कि कुछ बातें हैं जहां भ्रष्टाचार घर कर गया है. गरीब व्यक्ति जब छोटी-छोटी नौकरी के लिए जाता है, किसी की सिफारिश के लिए पता नहीं क्या-क्या उसको कष्ट झेलने पड़ते हैं और दलालों की टोली कैसे-कैसे उनसे रुपये हड़प लेती है. नौकरी मिले तो भी रुपये जाते हैं, नौकरी न मिले तो भी रुपये जाते हैं. सारी खबरें हम सुनते थे...और उसी में से मेरे मन में एक विचार आया था कि छोटी-छोटी नौकरियों के लिए इंटरव्यू की क्या जरूरत है. मैंने तो कभी सुना नहीं है कि दुनिया में कोई ऐसा मनोवैज्ञानिक है जो एक मिनट, दो मिनट के इंटरव्यू में किसी व्यक्ति को पूरी तरह जांच लेता है...और इसी विचार से मैंने घोषणा की थी कि क्यों न हम ये छोटी पायरी की नौकरियां है, वहां पर, इंटरव्यू की परम्परा खत्म करें.'' कम से कम 18 राज्यों ने जूनियर लेवल पोस्ट के लिए इंटरव्यू को खत्म कर दिया है. यूपीएससी की परीक्षा में भी क्वालीफाइंग पेपर होता है लेकिन उसके बाद लिखित परीक्षा और इंटरव्यू भी होता है. इंटरव्यू के लिए लिखित परीक्षा से कम अंक रखे गए हैं. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी खास पद के लिए इंटरव्यू को तरजीह दी जाती है जहां उस पद के लिए व्यक्तित्व का आकलन बेहद जरूरी हो. लेकिन जेएनयू प्रशासन और यूजीसी को यह साबित करना होगा कि एम फिल और पीएचडी में दाखिले के लिए व्यक्तित्व को आंकने की आखिर क्या जरूरत है. इंटरव्यू के आधार पर एक कोर्स में दाखिले के लिए इतने अंक तय करना बेशक सवाल खड़े करता है.

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