Sarvapriya Sangwan

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सोशल मीडिया के दंगाई

akb कल ही एक सब-इंस्पेक्टर से बात हो रही थी जिन्होंने काफ़ी जानकारी दी। हालांकि उनकी कही कई बातें मैं बाद में एक रिपोर्ट में शामिल करना चाहती थी। लेकिन उस रिपोर्ट में अभी वक़्त है और शायद तब उनकी इजाज़त से नाम सहित उनकी कही बातें लिखूं। social-media-terrorism

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उन्होंने बताया कि 4 लड़के एक कमरे में रहते हैं। चारों एक ही धर्म के। उनमें से एक बनाता है मुसलमान के नाम से फेक आईडी। बाकी 3 बनते हैं हिंदुत्व के रक्षक। अब वो फेक मुसलमान कुछ आपत्तिजनक पोस्ट करेगा। तो वो तीन उसे जवाब देंगे, लड़ने लगेंगे। वो फेक मुस्लिम भी और ज़हरीला लिखेगा। वो फेक हिन्दू भी फिर कुछ आपत्तिजनक लिखेंगे मुसलमानों के बारे में। लेकिन क्या ये बात सिर्फ उन चार लोगों में रही? नहीं। उनकी ये सारी बातें कितने और लोग भी तो फेसबुक पर पढ़ रहे थे। वो पढ़ कर क्या सोच रहे होंगे! उनके मन में ना राम के प्रति श्रद्धा जागी होगी और ना इस्लाम के लिए। उनकी नफ़रत दूसरे धर्म के आदमी के लिए बढ़ गयी होगी।
पश्चिम बंगाल में बदुरिया और कुछ और जगहों पर साम्प्रदायिक हिंसा हो रही है और वो भी एक फेसबुक पोस्ट के पीछे। मुझे नहीं पता कि फेसबुक पोस्ट झूठी है या सच्ची। मुझे नहीं पता कि राम सच्चा है या इस्लाम सच्चा है लेकिन इन्हें मानने वाला आदमी तो सच्चा कतई नहीं है। दंगा बेशक़ करवाया जाता है लेकिन करते तो आप ही हैं। सोशल मीडिया पर आप क्या पढ़ना चाहते हैं ये भी आपके ही हाथ में है। कहते हैं ना कि जो देखेंगे, वही बनेंगे। अब जब नए किस्म के दंगाई हथियार आ गए हैं तो ये राज्य सरकारों का काम है कि इनके हिसाब से नए नियम भी लाएं। हमारी पुलिस को ना सोशल मीडिया की जानकारी है और ना साइबर क्राइम की। ये पूरी ज़िम्मेदारी मुख्यमंत्री की है। हिंसा ना रोक पाने की भी। एक और किस्म के दंगाई भी होते हैं जो किसी हिंसा की भर्त्सना बाद में करते हैं, पहले ये एक भ्रम बनाते हैं कि बाकी लोग इस पर नहीं बोलेंगे। ये इनकी सोची-समझी रणनीति होती है। ये भ्रम बनाया गया कि मोहम्मद अयूब की हत्या पर प्रोटेस्ट नहीं हुआ, जुनैद के लिए हुआ। डॉ नारंग के लिए नहीं हुआ। डॉ नारंग के केस में 2 दिन में अपराधी पकड़े गए थे लेकिन क्या किसी ने उनको भगत सिंह कहा था? जैसे किसान पहलू खान के हत्यारों को कहा गया। अख़लाक़ के हत्यारे को तिरंगा ओढ़ाने पर क्या आपने विरोध किया था जो कि सिर्फ एक शहीद का हक़ है। हिन्दू-मुसलमान को परे रख दीजिए, एक नागरिक होने के नाते भी ये सब बातें नागवारा हैं। सेलेक्टिव ये लोग ख़ुद होते हैं लेकिन दूसरे को घटिया कहकर ही तो अपने बेहतर होने का भ्रम बनाया जा सकता है।

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सोशल मीडिया के दंगाई

akb कल ही एक सब-इंस्पेक्टर से बात हो रही थी जिन्होंने काफ़ी जानकारी दी। हालांकि उनकी कही कई बातें मैं बाद में एक रिपोर्ट में शामिल करना चाहती थी। लेकिन उस रिपोर्ट में अभी वक़्त है और शायद तब उनकी इजाज़त से नाम सहित उनकी कही बातें लिखूं। social-media-terrorism

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उन्होंने बताया कि 4 लड़के एक कमरे में रहते हैं। चारों एक ही धर्म के। उनमें से एक बनाता है मुसलमान के नाम से फेक आईडी। बाकी 3 बनते हैं हिंदुत्व के रक्षक। अब वो फेक मुसलमान कुछ आपत्तिजनक पोस्ट करेगा। तो वो तीन उसे जवाब देंगे, लड़ने लगेंगे। वो फेक मुस्लिम भी और ज़हरीला लिखेगा। वो फेक हिन्दू भी फिर कुछ आपत्तिजनक लिखेंगे मुसलमानों के बारे में। लेकिन क्या ये बात सिर्फ उन चार लोगों में रही? नहीं। उनकी ये सारी बातें कितने और लोग भी तो फेसबुक पर पढ़ रहे थे। वो पढ़ कर क्या सोच रहे होंगे! उनके मन में ना राम के प्रति श्रद्धा जागी होगी और ना इस्लाम के लिए। उनकी नफ़रत दूसरे धर्म के आदमी के लिए बढ़ गयी होगी।
पश्चिम बंगाल में बदुरिया और कुछ और जगहों पर साम्प्रदायिक हिंसा हो रही है और वो भी एक फेसबुक पोस्ट के पीछे। मुझे नहीं पता कि फेसबुक पोस्ट झूठी है या सच्ची। मुझे नहीं पता कि राम सच्चा है या इस्लाम सच्चा है लेकिन इन्हें मानने वाला आदमी तो सच्चा कतई नहीं है। दंगा बेशक़ करवाया जाता है लेकिन करते तो आप ही हैं। सोशल मीडिया पर आप क्या पढ़ना चाहते हैं ये भी आपके ही हाथ में है। कहते हैं ना कि जो देखेंगे, वही बनेंगे। अब जब नए किस्म के दंगाई हथियार आ गए हैं तो ये राज्य सरकारों का काम है कि इनके हिसाब से नए नियम भी लाएं। हमारी पुलिस को ना सोशल मीडिया की जानकारी है और ना साइबर क्राइम की। ये पूरी ज़िम्मेदारी मुख्यमंत्री की है। हिंसा ना रोक पाने की भी। एक और किस्म के दंगाई भी होते हैं जो किसी हिंसा की भर्त्सना बाद में करते हैं, पहले ये एक भ्रम बनाते हैं कि बाकी लोग इस पर नहीं बोलेंगे। ये इनकी सोची-समझी रणनीति होती है। ये भ्रम बनाया गया कि मोहम्मद अयूब की हत्या पर प्रोटेस्ट नहीं हुआ, जुनैद के लिए हुआ। डॉ नारंग के लिए नहीं हुआ। डॉ नारंग के केस में 2 दिन में अपराधी पकड़े गए थे लेकिन क्या किसी ने उनको भगत सिंह कहा था? जैसे किसान पहलू खान के हत्यारों को कहा गया। अख़लाक़ के हत्यारे को तिरंगा ओढ़ाने पर क्या आपने विरोध किया था जो कि सिर्फ एक शहीद का हक़ है। हिन्दू-मुसलमान को परे रख दीजिए, एक नागरिक होने के नाते भी ये सब बातें नागवारा हैं। सेलेक्टिव ये लोग ख़ुद होते हैं लेकिन दूसरे को घटिया कहकर ही तो अपने बेहतर होने का भ्रम बनाया जा सकता है।

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वेंकैया नायडू जी, आपके लिए चिट्ठी है

akb माननीय मंत्री श्री वेंकैया नायडू जी, हम समझते हैं कि आपकी राजनीति का तक़ाज़ा है लेकिन भटकाने की भी एक सीमा तो रखिये। वैसे तो इस देश के एजुकेशन सिस्टम के बारे में मैं हमेशा ही निराश रही हूँ लेकिन आपकी सरकार ने तो मुझे नाउम्मीद कर दिया है क्योंकि लोगों में जानकारी का अभाव आपको उन्हें भटकाने में मदद ही दे रहा है।

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24 अप्रैल 2017 को सुकमा में CRPF जवानों पर हमला हुआ। कितने ही जवान मारे गए (मैं शहीद इसलिए नहीं लिख रही क्योंकि आप उन्हें शहीद का दर्जा नहीं देते)। नक्सल समस्या का कोई हल ढूंढने की बजाय या कोई नई रणनीति अपनाने की बजाय आप सीधा बयान छपवाते हैं 'Human Rights' की पैरवी करने वालों के खिलाफ़। यूं तो मानवाधिकार वाले मरने वाले बेगुनाह आदिवासियों की बात करते हैं और इस सरकार में तो अब वो बोलते हुए भी नहीं दिखाई देते। फिर ये अचानक कहाँ से मानवाधिकार के खिलाफ़ रुदन टपक पड़ा। अभी कश्मीर में सेना ने एक कश्मीरी को जीप से बांधा था और ह्यूमन राइट्स कमीशन ने आपको सुझाव दिया कि उसे 10 लाख रुपये का मुआवज़ा दीजिये जिसे आपने मानने से इनकार भी कर दिया। आपके एमपी परेश रावल तो अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की कड़ी निंदा भी नहीं करते, वो सीधा तंज करते हैं कि ह्यूमन राइट कमीशन उनको भी पैसे दिलवाएगा क्या। पहली बात तो National human rights commission और State human rights commision आम लोग नहीं बनाते...सरकारें बनाती हैं। आपको जानकर अचरज होगा कि कानून के मुताबिक केंद्र सरकार NHRC का गठन करेगी जिसमें 8 सदस्य होंगे और उसके चेयरपर्सन सुप्रीम कोर्ट के कोई भी पूर्व मुख्य न्यायाधीश होंगे। बाकी सदस्य - सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज हाई कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा मानव अधिकार में एक्सपर्ट 2 लोग इन सभी सदस्यों का चुनाव सरकार की एक कमिटी करती हैं जिसके अध्यक्ष होते हैं प्रधानमंत्री। मानव अधिकारों से कोई दिक्कत है तो आप इन सभी आयोगों को ख़त्म कर दीजिए। आर्मी से संबंधित केस तो NHRC/SHRC के दायरे में भी नहीं है। वो किसी की शिकायत पर सिर्फ आपसे रिपोर्ट मांग सकते हैं। उन्होंने आपसे रिपोर्ट मांगी थी और आपकी रिपोर्ट पर सुझाव दिया कि उक्त व्यक्ति के साथ गलत हुआ और उसे मुआवज़ा दीजिये। ध्यान रहे कि वो रिपोर्ट आपकी थी और कमिशन के सुझाव से साफ़ है कि आपने अपनी रिपोर्ट में किसकी गलती बताई है। जिन कानून के जानकारों को आपने नियुक्त किया, उनके प्रति इतना गुस्सा? आप तो बड़े लोग हैं। आप लोगों के पास पैसा है, ताक़त है। आपके खिलाफ़ कुछ करने वाले को आसानी से उसके अंजाम तक पहुंचा सकते हैं। आप लोग तो मानहानि के केस भी ठोक देते हैं। आम लोगों के पास तो बस संविधान ही है जिसमें हमारे अधिकार सुरक्षित हैं। कोर्ट हमें सालों तक चप्पल घिसने के बाद वही दिलवा सकता है। आप उन्हें भी छिनने पर उतारूँ हैं। मानवाधिकार वहीं हैं जो संविधान में लिखे हुए हैं। हमने अपने घर में तो बनाये नहीं। आपको ही इनका सहारा लेना पड़ता है UN में छाती चौड़ी करने के लिए। आपके अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने UN में याकूब मेमन के लिए रात को कोर्ट का दरवाज़ा खुलवाने की मिसाल पेश की। आपके समर्थक हमें बोलते हैं कि अच्छा, देश के खिलाफ़ इतना रिसर्च। जैसे देश के नागरिक को अधिकार की ज़रूरत ही नहीं। अमरनाथ यात्रियों के साथ जो हुआ, वो हमारी तरह ही आम लोग थे। आप चाहते हैं कि उसमें भी आपकी लापरवाही पर सवाल ना किया जाए। आप चाहते हैं कि पहले देश के आम नागरिक से सवाल हो कि कहां थे तुम। सर, हम अपने घरों में ही थे और मृतकों के परिजन भी ये सोचकर कि सरकार है, इंटेलिजेंस है, सुरक्षा है। वरना हमला होने के खतरे के बारे में तो उन्होंने भी खबरों में पढ़ा ही होगा। निंदा करने के अलावा हम कुछ नहीं कर सकते। हमारी तो सरकार ही नहीं सुन रही, हमारे ट्वीट आतंकवादी क्या ख़ाक पढ़ेंगे। मैं आतंकवाद से लड़ने में आपके साथ हूँ, अपने देश के लोगों से सोशल मीडिया पर नहीं लड़ूंगी। ऐसी कोशिशों पर लगाम लगाइए।

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वेंकैया नायडू जी, आपके लिए चिट्ठी है

akb माननीय मंत्री श्री वेंकैया नायडू जी, हम समझते हैं कि आपकी राजनीति का तकादा है लेकिन भटकाने की भी एक सीमा तो रखिये। वैसे तो इस देश के एजुकेशन सिस्टम के बारे में मैं हमेशा ही निराश रही हूँ लेकिन आपकी सरकार ने तो मुझे नाउम्मीद कर दिया है क्योंकि लोगों में जानकारी का अभाव आपको उन्हें भटकाने में मदद ही दे रहा है।

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24 अप्रैल 2017 को सुकमा में CRPF जवानों पर हमला हुआ। कितने ही जवान मारे गए (मैं शहीद इसलिए नहीं लिख रही क्योंकि आप उन्हें शहीद का दर्जा नहीं देते)। नक्सल समस्या का कोई हल ढूंढने की बजाय या कोई नई रणनीति अपनाने की बजाय आप सीधा बयान छपवाते हैं 'Human Rights' की पैरवी करने वालों के खिलाफ़। यूं तो मानवाधिकार वाले मरने वाले बेगुनाह आदिवासियों की बात करते हैं और इस सरकार में तो अब वो बोलते हुए भी नहीं दिखाई देते। फिर ये अचानक कहाँ से मानवाधिकार के खिलाफ़ रुदन टपक पड़ा। अभी कश्मीर में सेना ने एक कश्मीरी को जीप से बांधा था और ह्यूमन राइट्स कमीशन ने आपको सुझाव दिया कि उसे 10 लाख रुपये का मुआवज़ा दीजिये जिसे आपने मानने से इनकार भी कर दिया। आपके एमपी परेश रावल तो अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की कड़ी निंदा भी नहीं करते, वो सीधा तंज करते हैं कि ह्यूमन राइट कमीशन उनको भी पैसे दिलवाएगा क्या। पहली बात तो National human rights commission और State human rights commision आम लोग नहीं बनाते...सरकारें बनाती हैं। आपको जानकर अचरज होगा कि कानून के मुताबिक केंद्र सरकार NHRC का गठन करेगी जिसमें 8 सदस्य होंगे और उसके चेयरपर्सन सुप्रीम कोर्ट के कोई भी पूर्व मुख्य न्यायाधीश होंगे। बाकी सदस्य - सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज हाई कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा मानव अधिकार में एक्सपर्ट 2 लोग इन सभी सदस्यों का चुनाव सरकार की एक कमिटी करती हैं जिसके अध्यक्ष होते हैं प्रधानमंत्री। मानव अधिकारों से कोई दिक्कत है तो आप इन सभी आयोगों को ख़त्म कर दीजिए। आर्मी से संबंधित केस तो NHRC/SHRC के दायरे में भी नहीं है। वो किसी की शिकायत पर सिर्फ आपसे रिपोर्ट मांग सकते हैं। उन्होंने आपसे रिपोर्ट मांगी थी और आपकी रिपोर्ट पर सुझाव दिया कि उक्त व्यक्ति के साथ गलत हुआ और उसे मुआवज़ा दीजिये। ध्यान रहे कि वो रिपोर्ट आपकी थी और कमिशन के सुझाव से साफ़ है कि आपने अपनी रिपोर्ट में किसकी गलती बताई है। जिन कानून के जानकारों को आपने नियुक्त किया, उनके प्रति इतना गुस्सा? आप तो बड़े लोग हैं। आप लोगों के पास पैसा है, ताक़त है। आपके खिलाफ़ कुछ करने वाले को आसानी से उसके अंजाम तक पहुंचा सकते हैं। आप लोग तो मानहानि के केस भी ठोक देते हैं। आम लोगों के पास तो बस संविधान ही है जिसमें हमारे अधिकार सुरक्षित हैं। कोर्ट हमें सालों तक चप्पल घिसने के बाद वही दिलवा सकता है। आप उन्हें भी छिनने पर उतारूँ हैं। मानवाधिकार वहीं हैं जो संविधान में लिखे हुए हैं। हमने अपने घर में तो बनाये नहीं। आपको ही इनका सहारा लेना पड़ता है UN में छाती चौड़ी करने के लिए। आपके अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने UN में याकूब मेमन के लिए रात को कोर्ट का दरवाज़ा खुलवाने की मिसाल पेश की। आपके समर्थक हमें बोलते हैं कि अच्छा, देश के खिलाफ़ इतना रिसर्च। जैसे देश के नागरिक को अधिकार की ज़रूरत ही नहीं। अमरनाथ यात्रियों के साथ जो हुआ, वो हमारी तरह ही आम लोग थे। आप चाहते हैं कि उसमें भी आपकी लापरवाही पर सवाल ना किया जाए। आप चाहते हैं कि पहले देश के आम नागरिक से सवाल हो कि कहां थे तुम। सर, हम अपने घरों में ही थे और मृतकों के परिजन भी ये सोचकर कि सरकार है, इंटेलिजेंस है, सुरक्षा है। वरना हमला होने के खतरे के बारे में तो उन्होंने भी खबरों में पढ़ा ही होगा। निंदा करने के अलावा हम कुछ नहीं कर सकते। हमारी तो सरकार ही नहीं सुन रही, हमारे ट्वीट आतंकवादी क्या ख़ाक पढ़ेंगे। मैं आतंकवाद से लड़ने में आपके साथ हूँ, अपने देश के लोगों से सोशल मीडिया पर नहीं लड़ूंगी। ऐसी कोशिशों पर लगाम लगाइए।

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वेंकैया नायडू जी, आपके लिए चिट्ठी है

akb माननीय मंत्री श्री वेंकैया नायडू जी, हम समझते हैं कि आपकी राजनीति का तकादा है लेकिन भटकाने की भी एक सीमा तो रखिये। वैसे तो इस देश के एजुकेशन सिस्टम के बारे में मैं हमेशा ही निराश रही हूँ लेकिन आपकी सरकार ने तो मुझे नाउम्मीद कर दिया है क्योंकि लोगों में जानकारी का अभाव आपको उन्हें भटकाने में मदद ही दे रहा है।

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24 अप्रैल 2017 को सुकमा में CRPF जवानों पर हमला हुआ। कितने ही जवान मारे गए (मैं शहीद इसलिए नहीं लिख रही क्योंकि आप उन्हें शहीद का दर्जा नहीं देते)। नक्सल समस्या का कोई हल ढूंढने की बजाय या कोई नई रणनीति अपनाने की बजाय आप सीधा बयान छपवाते हैं 'Human Rights' की पैरवी करने वालों के खिलाफ़। यूं तो मानवाधिकार वाले मरने वाले बेगुनाह आदिवासियों की बात करते हैं और इस सरकार में तो अब वो बोलते हुए भी नहीं दिखाई देते। फिर ये अचानक कहाँ से मानवाधिकार के खिलाफ़ रुदन टपक पड़ा। अभी कश्मीर में सेना ने एक कश्मीरी को जीप से बांधा था और ह्यूमन राइट्स कमीशन ने आपको सुझाव दिया कि उसे 10 लाख रुपये का मुआवज़ा दीजिये जिसे आपने मानने से इनकार भी कर दिया। आपके एमपी परेश रावल तो अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की कड़ी निंदा भी नहीं करते, वो सीधा तंज करते हैं कि ह्यूमन राइट कमीशन उनको भी पैसे दिलवाएगा क्या। पहली बात तो National human rights commission और State human rights commision आम लोग नहीं बनाते...सरकारें बनाती हैं। आपको जानकर अचरज होगा कि कानून के मुताबिक केंद्र सरकार NHRC का गठन करेगी जिसमें 8 सदस्य होंगे और उसके चेयरपर्सन सुप्रीम कोर्ट के कोई भी पूर्व मुख्य न्यायाधीश होंगे। बाकी सदस्य - सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज हाई कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा मानव अधिकार में एक्सपर्ट 2 लोग इन सभी सदस्यों का चुनाव सरकार की एक कमिटी करती हैं जिसके अध्यक्ष होते हैं प्रधानमंत्री। मानव अधिकारों से कोई दिक्कत है तो आप इन सभी आयोगों को ख़त्म कर दीजिए। आर्मी से संबंधित केस तो NHRC/SHRC के दायरे में भी नहीं है। वो किसी की शिकायत पर सिर्फ आपसे रिपोर्ट मांग सकते हैं। उन्होंने आपसे रिपोर्ट मांगी थी और आपकी रिपोर्ट पर सुझाव दिया कि उक्त व्यक्ति के साथ गलत हुआ और उसे मुआवज़ा दीजिये। ध्यान रहे कि वो रिपोर्ट आपकी थी और कमिशन के सुझाव से साफ़ है कि आपने अपनी रिपोर्ट में किसकी गलती बताई है। जिन कानून के जानकारों को आपने नियुक्त किया, उनके प्रति इतना गुस्सा? आप तो बड़े लोग हैं। आप लोगों के पास पैसा है, ताक़त है। आपके खिलाफ़ कुछ करने वाले को आसानी से उसके अंजाम तक पहुंचा सकते हैं। आप लोग तो मानहानि के केस भी ठोक देते हैं। आम लोगों के पास तो बस संविधान ही है जिसमें हमारे अधिकार सुरक्षित हैं। कोर्ट हमें सालों तक चप्पल घिसने के बाद वही दिलवा सकता है। आप उन्हें भी छिनने पर उतारूँ हैं। मानवाधिकार वहीं हैं जो संविधान में लिखे हुए हैं। हमने अपने घर में तो बनाये नहीं। आपको ही इनका सहारा लेना पड़ता है UN में छाती चौड़ी करने के लिए। आपके अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने UN में याकूब मेमन के लिए रात को कोर्ट का दरवाज़ा खुलवाने की मिसाल पेश की। आपके समर्थक हमें बोलते हैं कि अच्छा, देश के खिलाफ़ इतना रिसर्च। जैसे देश के नागरिक को अधिकार की ज़रूरत ही नहीं। अमरनाथ यात्रियों के साथ जो हुआ, वो हमारी तरह ही आम लोग थे। आप चाहते हैं कि उसमें भी आपकी लापरवाही पर सवाल ना किया जाए। आप चाहते हैं कि पहले देश के आम नागरिक से सवाल हो कि कहां थे तुम। सर, हम अपने घरों में ही थे और मृतकों के परिजन भी ये सोचकर कि सरकार है, इंटेलिजेंस है, सुरक्षा है। वरना हमला होने के खतरे के बारे में तो उन्होंने भी खबरों में पढ़ा ही होगा। निंदा करने के अलावा हम कुछ नहीं कर सकते। हमारी तो सरकार ही नहीं सुन रही, हमारे ट्वीट आतंकवादी क्या ख़ाक पढ़ेंगे। मैं आतंकवाद से लड़ने में आपके साथ हूँ, अपने देश के लोगों से सोशल मीडिया पर नहीं लड़ूंगी। ऐसी कोशिशों पर लगाम लगाइए।

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वेंकैया नायडू जी, आपके लिए चिट्ठी है

akb माननीय मंत्री श्री वेंकैया नायडू जी, हम समझते हैं कि आपकी राजनीति का तकादा है लेकिन भटकाने की भी एक सीमा तो रखिये। वैसे तो इस देश के एजुकेशन सिस्टम के बारे में मैं हमेशा ही निराश रही हूँ लेकिन आपकी सरकार ने तो मुझे नाउम्मीद कर दिया है क्योंकि लोगों में जानकारी का अभाव आपको उन्हें भटकाने में मदद ही दे रहा है।

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24 अप्रैल 2017 को सुकमा में CRPF जवानों पर हमला हुआ। कितने ही जवान मारे गए (मैं शहीद इसलिए नहीं लिख रही क्योंकि आप उन्हें शहीद का दर्जा नहीं देते)। नक्सल समस्या का कोई हल ढूंढने की बजाय या कोई नई रणनीति अपनाने की बजाय आप सीधा बयान छपवाते हैं 'Human Rights' की पैरवी करने वालों के खिलाफ़। यूं तो मानवाधिकार वाले मरने वाले बेगुनाह आदिवासियों की बात करते हैं और इस सरकार में तो अब वो बोलते हुए भी नहीं दिखाई देते। फिर ये अचानक कहाँ से मानवाधिकार के खिलाफ़ रुदन टपक पड़ा। अभी कश्मीर में सेना ने एक कश्मीरी को जीप से बांधा था और ह्यूमन राइट्स कमीशन ने आपको सुझाव दिया कि उसे 10 लाख रुपये का मुआवज़ा दीजिये जिसे आपने मानने से इनकार भी कर दिया। आपके एमपी परेश रावल तो अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की कड़ी निंदा भी नहीं करते, वो सीधा तंज करते हैं कि ह्यूमन राइट कमीशन उनको भी पैसे दिलवाएगा क्या। पहली बात तो National human rights commission और State human rights commision आम लोग नहीं बनाते...सरकारें बनाती हैं। आपको जानकर अचरज होगा कि कानून के मुताबिक केंद्र सरकार NHRC का गठन करेगी जिसमें 8 सदस्य होंगे और उसके चेयरपर्सन सुप्रीम कोर्ट के कोई भी पूर्व मुख्य न्यायाधीश होंगे। बाकी सदस्य - सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज हाई कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा मानव अधिकार में एक्सपर्ट 2 लोग इन सभी सदस्यों का चुनाव सरकार की एक कमिटी करती हैं जिसके अध्यक्ष होते हैं प्रधानमंत्री। मानव अधिकारों से कोई दिक्कत है तो आप इन सभी आयोगों को ख़त्म कर दीजिए। आर्मी से संबंधित केस तो NHRC/SHRC के दायरे में भी नहीं है। वो किसी की शिकायत पर सिर्फ आपसे रिपोर्ट मांग सकते हैं। उन्होंने आपसे रिपोर्ट मांगी थी और आपकी रिपोर्ट पर सुझाव दिया कि उक्त व्यक्ति के साथ गलत हुआ और उसे मुआवज़ा दीजिये। ध्यान रहे कि वो रिपोर्ट आपकी थी और कमिशन के सुझाव से साफ़ है कि आपने अपनी रिपोर्ट में किसकी गलती बताई है। जिन कानून के जानकारों को आपने नियुक्त किया, उनके प्रति इतना गुस्सा? आप तो बड़े लोग हैं। आप लोगों के पास पैसा है, ताक़त है। आपके खिलाफ़ कुछ करने वाले को आसानी से उसके अंजाम तक पहुंचा सकते हैं। आप लोग तो मानहानि के केस भी ठोक देते हैं। आम लोगों के पास तो बस संविधान ही है जिसमें हमारे अधिकार सुरक्षित हैं। कोर्ट हमें सालों तक चप्पल घिसने के बाद वही दिलवा सकता है। आप उन्हें भी छिनने पर उतारूँ हैं। मानवाधिकार वहीं हैं जो संविधान में लिखे हुए हैं। हमने अपने घर में तो बनाये नहीं। आपको ही इनका सहारा लेना पड़ता है UN में छाती चौड़ी करने के लिए। आपके अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने UN में याकूब मेमन के लिए रात को कोर्ट का दरवाज़ा खुलवाने की मिसाल पेश की। आपके समर्थक हमें बोलते हैं कि अच्छा, देश के खिलाफ़ इतना रिसर्च। जैसे देश के नागरिक को अधिकार की ज़रूरत ही नहीं। अमरनाथ यात्रियों के साथ जो हुआ, वो हमारी तरह ही आम लोग थे। आप चाहते हैं कि उसमें भी आपकी लापरवाही पर सवाल ना किया जाए। आप चाहते हैं कि पहले देश के आम नागरिक से सवाल हो कि कहां थे तुम। सर, हम अपने घरों में ही थे और मृतकों के परिजन भी ये सोचकर कि सरकार है, इंटेलिजेंस है, सुरक्षा है। वरना हमला होने के खतरे के बारे में तो उन्होंने भी खबरों में पढ़ा ही होगा। निंदा करने के अलावा हम कुछ नहीं कर सकते। हमारी तो सरकार ही नहीं सुन रही, हमारे ट्वीट आतंकवादी क्या ख़ाक पढ़ेंगे। मैं आतंकवाद से लड़ने में आपके साथ हूँ, अपने देश के लोगों से सोशल मीडिया पर नहीं लड़ूंगी। ऐसी कोशिशों पर लगाम लगाइए।

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akb माननीय मंत्री श्री वेंकैया नायडू जी, हम समझते हैं कि आपकी राजनीति का तक़ाज़ा है लेकिन भटकाने की भी एक सीमा तो रखिये। वैसे तो इस देश के एजुकेशन सिस्टम के बारे में मैं हमेशा ही निराश रही हूँ लेकिन आपकी सरकार ने तो मुझे नाउम्मीद कर दिया है क्योंकि लोगों में जानकारी का अभाव आपको उन्हें भटकाने में मदद ही दे रहा है।

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24 अप्रैल 2017 को सुकमा में CRPF जवानों पर हमला हुआ। कितने ही जवान मारे गए (मैं शहीद इसलिए नहीं लिख रही क्योंकि आप उन्हें शहीद का दर्जा नहीं देते)। नक्सल समस्या का कोई हल ढूंढने की बजाय या कोई नई रणनीति अपनाने की बजाय आप सीधा बयान छपवाते हैं 'Human Rights' की पैरवी करने वालों के खिलाफ़। यूं तो मानवाधिकार वाले मरने वाले बेगुनाह आदिवासियों की बात करते हैं और इस सरकार में तो अब वो बोलते हुए भी नहीं दिखाई देते। फिर ये अचानक कहाँ से मानवाधिकार के खिलाफ़ रुदन टपक पड़ा। अभी कश्मीर में सेना ने एक कश्मीरी को जीप से बांधा था और ह्यूमन राइट्स कमीशन ने आपको सुझाव दिया कि उसे 10 लाख रुपये का मुआवज़ा दीजिये जिसे आपने मानने से इनकार भी कर दिया। आपके एमपी परेश रावल तो अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की कड़ी निंदा भी नहीं करते, वो सीधा तंज करते हैं कि ह्यूमन राइट कमीशन उनको भी पैसे दिलवाएगा क्या। पहली बात तो National human rights commission और State human rights commision आम लोग नहीं बनाते...सरकारें बनाती हैं। आपको जानकर अचरज होगा कि कानून के मुताबिक केंद्र सरकार NHRC का गठन करेगी जिसमें 8 सदस्य होंगे और उसके चेयरपर्सन सुप्रीम कोर्ट के कोई भी पूर्व मुख्य न्यायाधीश होंगे। बाकी सदस्य - सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज हाई कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा मानव अधिकार में एक्सपर्ट 2 लोग इन सभी सदस्यों का चुनाव सरकार की एक कमिटी करती हैं जिसके अध्यक्ष होते हैं प्रधानमंत्री। मानव अधिकारों से कोई दिक्कत है तो आप इन सभी आयोगों को ख़त्म कर दीजिए। आर्मी से संबंधित केस तो NHRC/SHRC के दायरे में भी नहीं है। वो किसी की शिकायत पर सिर्फ आपसे रिपोर्ट मांग सकते हैं। उन्होंने आपसे रिपोर्ट मांगी थी और आपकी रिपोर्ट पर सुझाव दिया कि उक्त व्यक्ति के साथ गलत हुआ और उसे मुआवज़ा दीजिये। ध्यान रहे कि वो रिपोर्ट आपकी थी और कमिशन के सुझाव से साफ़ है कि आपने अपनी रिपोर्ट में किसकी गलती बताई है। जिन कानून के जानकारों को आपने नियुक्त किया, उनके प्रति इतना गुस्सा? आप तो बड़े लोग हैं। आप लोगों के पास पैसा है, ताक़त है। आपके खिलाफ़ कुछ करने वाले को आसानी से उसके अंजाम तक पहुंचा सकते हैं। आप लोग तो मानहानि के केस भी ठोक देते हैं। आम लोगों के पास तो बस संविधान ही है जिसमें हमारे अधिकार सुरक्षित हैं। कोर्ट हमें सालों तक चप्पल घिसने के बाद वही दिलवा सकता है। आप उन्हें भी छिनने पर उतारूँ हैं। मानवाधिकार वहीं हैं जो संविधान में लिखे हुए हैं। हमने अपने घर में तो बनाये नहीं। आपको ही इनका सहारा लेना पड़ता है UN में छाती चौड़ी करने के लिए। आपके अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने UN में याकूब मेमन के लिए रात को कोर्ट का दरवाज़ा खुलवाने की मिसाल पेश की। आपके समर्थक हमें बोलते हैं कि अच्छा, देश के खिलाफ़ इतना रिसर्च। जैसे देश के नागरिक को अधिकार की ज़रूरत ही नहीं। अमरनाथ यात्रियों के साथ जो हुआ, वो हमारी तरह ही आम लोग थे। आप चाहते हैं कि उसमें भी आपकी लापरवाही पर सवाल ना किया जाए। आप चाहते हैं कि पहले देश के आम नागरिक से सवाल हो कि कहां थे तुम। सर, हम अपने घरों में ही थे और मृतकों के परिजन भी ये सोचकर कि सरकार है, इंटेलिजेंस है, सुरक्षा है। वरना हमला होने के खतरे के बारे में तो उन्होंने भी खबरों में पढ़ा ही होगा। निंदा करने के अलावा हम कुछ नहीं कर सकते। हमारी तो सरकार ही नहीं सुन रही, हमारे ट्वीट आतंकवादी क्या ख़ाक पढ़ेंगे। मैं आतंकवाद से लड़ने में आपके साथ हूँ, अपने देश के लोगों से सोशल मीडिया पर नहीं लड़ूंगी। ऐसी कोशिशों पर लगाम लगाइए।

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जीएसटी: राजनीति अलग इकोनॉमी अलग

akb GST-Politics-economy                                                                                 pic-google सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि 165 देश हैं जिन्होंने जीएसटी लागू किया है। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने कहा कि बाकी देशों में जीएसटी नहीं है, वैट सिस्टम लागू है। सिर्फ 7 देश हैं जहां जीएसटी है और उनमें से सिर्फ एक देश है जहां भारत की तरह ही संघीय ढांचा है - कैनेडा। कैनेडा में भी दो राज्यों ने इसे लागू नहीं किया है। ये परफेक्ट जीएसटी नहीं है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा कि अभी सुधार कि काफी गुंजाइश है, उनके हिसाब से रेट 2-3 ही होने चाहिए, अभी 4 हैं। हालांकि पहले वो सिर्फ एक रेट 15% रखने की वकालत करते रहे हैं। ये भी कहा कि सभी चीज़ों को जीएसटी में लाना होगा जैसे शराब, पेट्रोल, गैस, बिजली आदि। पहली बात तो अभी एक देश एक टैक्स जैसा कुछ नहीं हुआ है। सब चीज़ें जीएसटी में आई ही नहीं हैं। राज्यों ने जीएसटी मॉडल पास किया है लेकिन अपने अपने बदलावों के साथ। अगर आप 500 रुपये से नीचे का जूता लेते हैं तो उस पर 5% टैक्स है। अगर 500 से ऊपर का लेते हैं तो 18% है। 1000 से नीचे के कपड़ों पर 5% टैक्स। 1000 से ऊपर - 12%। सूती फाइबर -5%। कृत्रिम फाइबर - 18%। हमारे यहां 4 टैक्स स्लैब रखे गए हैं। बाकी देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ एक है। एक ही रेट की बात अरविंद सुब्रमण्यन कर रहे थे पहले। प्रधानमंत्री ने कहा कि इंस्पेक्टर राज, टैक्स टेररिज्म ख़त्म होगा। अभी तक जो कार्रवाई होती थी, उसमें था कि डिफाल्टर पर छापा होता था, FIR दर्ज होती थी और फिर आगे की कार्रवाई होती थी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और सांसद दीपेंद्र हुड्डा का कहना है कि जीएसटी में क्लॉज़ है कि अब सीधे गिरफ़्तारी हो सकती है। अफसरों को खुली छूट है। गैर ज़मानती अपराध कर दिया गया है जिसमें सज़ा भी 1-5 साल की है। तो ये इंस्पेक्टर राज की वापसी है। कल के आधी रात के जश्न में प्रधानमंत्री ने सभी सरकारों को इसका श्रेय दिया। कांग्रेस और टीएमसी ने इसका बहिष्कार किया था। लेकिन शायद उन्हें इसमें शामिल होना चाहिए था क्योंकि आलोचना तो आप कर सकते हैं किसी कार्यक्रम की लेकिन इस नए टैक्स सिस्टम को लाने में सबका योगदान है। आखिर संसद से ही पास हुआ है। खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि वित्त मंत्री के तौर पर वो इसकी रूपरेखा बनाने में शामिल थे। लेकिन इस जश्न में एक दिक्कत ये है कि इससे लोगों की उम्मीदों को बहुत ज़्यादा बढ़ाया जा रहा है। सभी अर्थशास्त्री बहुत संतुलित सी बात कह रहे हैं कि स्वागत होना चाहिए, ये एक शुरुआत है। महंगाई बढ़ेगी, दिक्कतें होंगी, सुधार की काफ़ी गुंजाइश है। अरविंद सुब्रमनियन ने तो इकोनॉमी पर भी बोलने से मना कर दिया क्योंकि वो जुलाई में आने वाले आर्थिक सर्वे का इंतज़ार करना चाहते हैं। लेकिन सरकार जश्न मनाने के लिए नतीजे का इंतज़ार नहीं करना चाहती। वो इतिहास में दर्ज हो जाना चाहती है। ऐतिहासिक तो ये है ही कि टैक्स सिस्टम में बड़ा बदलाव है। लेकिन ऐतिहासिक कदम अच्छा है या बुरा है, ये नतीजे बताएंगे। जापान में recession आ गया था। मलेशिया में 2015 में लागू हुआ और वहां कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। नोटबंदी जैसा कदम तो ये नहीं है। नोटबंदी जिन वजहों को बताकर की गई, उसमें तो कोई बदलाव आया नहीं। अर्थव्यवस्था ज़रूर धीमी हो गयी। जीएसटी काफी सोच-समझकर और काम करके लागू किया गया है। 20 साल लगे हैं। अभी काफ़ी और सुधार किए जाएंगे धीरे-धीरे। पर देखने वाली बात ये है कि अर्थशास्त्री और राजनेता एक बात नहीं बोलते और ना सोचते। वो कहते हैं ना कि पॉलिटिशियन इकोनॉमी नहीं समझता। इकोनॉमिस्ट पॉलिटिक्स नहीं समझता। और आम आदमी दोनों ही नहीं समझता।

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जीएसटी: राजनीति अलग इकोनॉमी अलग

akb GST-Politics-economyसड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि 165 देश हैं जिन्होंने जीएसटी लागू किया है। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने कहा कि बाकी देशों में जीएसटी नहीं है, वैट सिस्टम लागू है। सिर्फ 7 देश हैं जहां जीएसटी है और उनमें से सिर्फ एक देश है जहां भारत की तरह ही संघीय ढांचा है - कैनेडा। कैनेडा में भी दो राज्यों ने इसे लागू नहीं किया है। ये परफेक्ट जीएसटी नहीं है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा कि अभी सुधार कि काफी गुंजाइश है, उनके हिसाब से रेट 2-3 ही होने चाहिए, अभी 4 हैं। हालांकि पहले वो सिर्फ एक रेट 15% रखने की वकालत करते रहे हैं। ये भी कहा कि सभी चीज़ों को जीएसटी में लाना होगा जैसे शराब, पेट्रोल, गैस, बिजली आदि। पहली बात तो अभी एक देश एक टैक्स जैसा कुछ नहीं हुआ है। सब चीज़ें जीएसटी में आई ही नहीं हैं। राज्यों ने जीएसटी मॉडल पास किया है लेकिन अपने अपने बदलावों के साथ। अगर आप 500 रुपये से नीचे का जूता लेते हैं तो उस पर 5% टैक्स है। अगर 500 से ऊपर का लेते हैं तो 18% है। 1000 से नीचे के कपड़ों पर 5% टैक्स। 1000 से ऊपर - 12%। सूती फाइबर -5%। कृत्रिम फाइबर - 18%। हमारे यहां 4 टैक्स स्लैब रखे गए हैं। बाकी देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ एक है। एक ही रेट की बात अरविंद सुब्रमण्यन कर रहे थे पहले। प्रधानमंत्री ने कहा कि इंस्पेक्टर राज, टैक्स टेररिज्म ख़त्म होगा। अभी तक जो कार्रवाई होती थी, उसमें था कि डिफाल्टर पर छापा होता था, FIR दर्ज होती थी और फिर आगे की कार्रवाई होती थी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और सांसद दीपेंद्र हुड्डा का कहना है कि जीएसटी में क्लॉज़ है कि अब सीधे गिरफ़्तारी हो सकती है। अफसरों को खुली छूट है। गैर ज़मानती अपराध कर दिया गया है जिसमें सज़ा भी 1-5 साल की है। तो ये इंस्पेक्टर राज की वापसी है। कल के आधी रात के जश्न में प्रधानमंत्री ने सभी सरकारों को इसका श्रेय दिया। कांग्रेस और टीएमसी ने इसका बहिष्कार किया था। लेकिन शायद उन्हें इसमें शामिल होना चाहिए था क्योंकि आलोचना तो आप कर सकते हैं किसी कार्यक्रम की लेकिन इस नए टैक्स सिस्टम को लाने में सबका योगदान है। आखिर संसद से ही पास हुआ है। खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि वित्त मंत्री के तौर पर वो इसकी रूपरेखा बनाने में शामिल थे। लेकिन इस जश्न में एक दिक्कत ये है कि इससे लोगों की उम्मीदों को बहुत ज़्यादा बढ़ाया जा रहा है। सभी अर्थशास्त्री बहुत संतुलित सी बात कह रहे हैं कि स्वागत होना चाहिए, ये एक शुरुआत है। महंगाई बढ़ेगी, दिक्कतें होंगी, सुधार की काफ़ी गुंजाइश है। अरविंद सुब्रमनियन ने तो इकोनॉमी पर भी बोलने से मना कर दिया क्योंकि वो जुलाई में आने वाले आर्थिक सर्वे का इंतज़ार करना चाहते हैं। लेकिन सरकार जश्न मनाने के लिए नतीजे का इंतज़ार नहीं करना चाहती। वो इतिहास में दर्ज हो जाना चाहती है। ऐतिहासिक तो ये है ही कि टैक्स सिस्टम में बड़ा बदलाव है। लेकिन ऐतिहासिक कदम अच्छा है या बुरा है, ये नतीजे बताएंगे। जापान में recession आ गया था। मलेशिया में 2015 में लागू हुआ और वहां कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। नोटबंदी जैसा कदम तो ये नहीं है। नोटबंदी जिन वजहों को बताकर की गई, उसमें तो कोई बदलाव आया नहीं। अर्थव्यवस्था ज़रूर धीमी हो गयी। जीएसटी काफी सोच-समझकर और काम करके लागू किया गया है। 20 साल लगे हैं। अभी काफ़ी और सुधार किए जाएंगे धीरे-धीरे। पर देखने वाली बात ये है कि अर्थशास्त्री और राजनेता एक बात नहीं बोलते और ना सोचते। वो कहते हैं ना कि पॉलिटिशियन इकोनॉमी नहीं समझता। इकोनॉमिस्ट पॉलिटिक्स नहीं समझता। और आम आदमी दोनों ही नहीं समझता।

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 सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि 165 देश हैं जिन्होंने जीएसटी लागू किया है। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने कहा कि बाकी देशों में जीएसटी नहीं है, वैट सिस्टम लागू है। सिर्फ 7 देश हैं जहां जीएसटी है और उनमें से सिर्फ एक देश है जहां भारत की तरह ही संघीय ढांचा है - कैनेडा। कैनेडा में भी दो राज्यों ने इसे लागू नहीं किया है। ये परफेक्ट जीएसटी नहीं है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा कि अभी सुधार कि काफी गुंजाइश है, उनके हिसाब से रेट 2-3 ही होने चाहिए, अभी 4 हैं। हालांकि पहले वो सिर्फ एक रेट 15% रखने की वकालत करते रहे हैं। ये भी कहा कि सभी चीज़ों को जीएसटी में लाना होगा जैसे शराब, पेट्रोल, गैस, बिजली आदि। पहली बात तो अभी एक देश एक टैक्स जैसा कुछ नहीं हुआ है। सब चीज़ें जीएसटी में आई ही नहीं हैं। राज्यों ने जीएसटी मॉडल पास किया है लेकिन अपने अपने बदलावों के साथ। अगर आप 500 रुपये से नीचे का जूता लेते हैं तो उस पर 5% टैक्स है। अगर 500 से ऊपर का लेते हैं तो 18% है। 1000 से नीचे के कपड़ों पर 5% टैक्स। 1000 से ऊपर - 12%। सूती फाइबर -5%। कृत्रिम फाइबर - 18%। हमारे यहां 4 टैक्स स्लैब रखे गए हैं। बाकी देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ एक है। एक ही रेट की बात अरविंद सुब्रमण्यन कर रहे थे पहले। प्रधानमंत्री ने कहा कि इंस्पेक्टर राज, टैक्स टेररिज्म ख़त्म होगा। अभी तक जो कार्रवाई होती थी, उसमें था कि डिफाल्टर पर छापा होता था, FIR दर्ज होती थी और फिर आगे की कार्रवाई होती थी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और सांसद दीपेंद्र हुड्डा का कहना है कि जीएसटी में क्लॉज़ है कि अब सीधे गिरफ़्तारी हो सकती है। अफसरों को खुली छूट है। गैर ज़मानती अपराध कर दिया गया है जिसमें सज़ा भी 1-5 साल की है। तो ये इंस्पेक्टर राज की वापसी है। कल के आधी रात के जश्न में प्रधानमंत्री ने सभी सरकारों को इसका श्रेय दिया। कांग्रेस और टीएमसी ने इसका बहिष्कार किया था। लेकिन शायद उन्हें इसमें शामिल होना चाहिए था क्योंकि आलोचना तो आप कर सकते हैं किसी कार्यक्रम की लेकिन इस नए टैक्स सिस्टम को लाने में सबका योगदान है। आखिर संसद से ही पास हुआ है। खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि वित्त मंत्री के तौर पर वो इसकी रूपरेखा बनाने में शामिल थे। लेकिन इस जश्न में एक दिक्कत ये है कि इससे लोगों की उम्मीदों को बहुत ज़्यादा बढ़ाया जा रहा है। सभी अर्थशास्त्री बहुत संतुलित सी बात कह रहे हैं कि स्वागत होना चाहिए, ये एक शुरुआत है। महंगाई बढ़ेगी, दिक्कतें होंगी, सुधार की काफ़ी गुंजाइश है। अरविंद सुब्रमनियन ने तो इकोनॉमी पर भी बोलने से मना कर दिया क्योंकि वो जुलाई में आने वाले आर्थिक सर्वे का इंतज़ार करना चाहते हैं। लेकिन सरकार जश्न मनाने के लिए नतीजे का इंतज़ार नहीं करना चाहती। वो इतिहास में दर्ज हो जाना चाहती है। ऐतिहासिक तो ये है ही कि टैक्स सिस्टम में बड़ा बदलाव है। लेकिन ऐतिहासिक कदम अच्छा है या बुरा है, ये नतीजे बताएंगे। जापान में recession आ गया था। मलेशिया में 2015 में लागू हुआ और वहां कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। नोटबंदी जैसा कदम तो ये नहीं है। नोटबंदी जिन वजहों को बताकर की गई, उसमें तो कोई बदलाव आया नहीं। अर्थव्यवस्था ज़रूर धीमी हो गयी। जीएसटी काफी सोच-समझकर और काम करके लागू किया गया है। 20 साल लगे हैं। अभी काफ़ी और सुधार किए जाएंगे धीरे-धीरे। पर देखने वाली बात ये है कि अर्थशास्त्री और राजनेता एक बात नहीं बोलते और ना सोचते। वो कहते हैं ना कि पॉलिटिशियन इकोनॉमी नहीं समझता। इकोनॉमिस्ट पॉलिटिक्स नहीं समझता। और आम आदमी दोनों ही नहीं समझता।

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akb GST-Politics-economyसड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि 165 देश हैं जिन्होंने जीएसटी लागू किया है। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने कहा कि बाकी देशों में जीएसटी नहीं है, वैट सिस्टम लागू है। सिर्फ 7 देश हैं जहां जीएसटी है और उनमें से सिर्फ एक देश है जहां भारत की तरह ही संघीय ढांचा है - कैनेडा। कैनेडा में भी दो राज्यों ने इसे लागू नहीं किया है। ये परफेक्ट जीएसटी नहीं है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा कि अभी सुधार कि काफी गुंजाइश है, उनके हिसाब से रेट 2-3 ही होने चाहिए, अभी 4 हैं। हालांकि पहले वो सिर्फ एक रेट 15% रखने की वकालत करते रहे हैं। ये भी कहा कि सभी चीज़ों को जीएसटी में लाना होगा जैसे शराब, पेट्रोल, गैस, बिजली आदि। पहली बात तो अभी एक देश एक टैक्स जैसा कुछ नहीं हुआ है। सब चीज़ें जीएसटी में आई ही नहीं हैं। राज्यों ने जीएसटी मॉडल पास किया है लेकिन अपने अपने बदलावों के साथ। अगर आप 500 रुपये से नीचे का जूता लेते हैं तो उस पर 5% टैक्स है। अगर 500 से ऊपर का लेते हैं तो 18% है। 1000 से नीचे के कपड़ों पर 5% टैक्स। 1000 से ऊपर - 12%। सूती फाइबर -5%। कृत्रिम फाइबर - 18%। हमारे यहां 4 टैक्स स्लैब रखे गए हैं। बाकी देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ एक है। एक ही रेट की बात अरविंद सुब्रमण्यन कर रहे थे पहले। प्रधानमंत्री ने कहा कि इंस्पेक्टर राज, टैक्स टेररिज्म ख़त्म होगा। अभी तक जो कार्रवाई होती थी, उसमें था कि डिफाल्टर पर छापा होता था, FIR दर्ज होती थी और फिर आगे की कार्रवाई होती थी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और सांसद दीपेंद्र हुड्डा का कहना है कि जीएसटी में क्लॉज़ है कि अब सीधे गिरफ़्तारी हो सकती है। अफसरों को खुली छूट है। गैर ज़मानती अपराध कर दिया गया है जिसमें सज़ा भी 1-5 साल की है। तो ये इंस्पेक्टर राज की वापसी है। कल के आधी रात के जश्न में प्रधानमंत्री ने सभी सरकारों को इसका श्रेय दिया। कांग्रेस और टीएमसी ने इसका बहिष्कार किया था। लेकिन शायद उन्हें इसमें शामिल होना चाहिए था क्योंकि आलोचना तो आप कर सकते हैं किसी कार्यक्रम की लेकिन इस नए टैक्स सिस्टम को लाने में सबका योगदान है। आखिर संसद से ही पास हुआ है। खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि वित्त मंत्री के तौर पर वो इसकी रूपरेखा बनाने में शामिल थे। लेकिन इस जश्न में एक दिक्कत ये है कि इससे लोगों की उम्मीदों को बहुत ज़्यादा बढ़ाया जा रहा है। सभी अर्थशास्त्री बहुत संतुलित सी बात कह रहे हैं कि स्वागत होना चाहिए, ये एक शुरुआत है। महंगाई बढ़ेगी, दिक्कतें होंगी, सुधार की काफ़ी गुंजाइश है। अरविंद सुब्रमनियन ने तो इकोनॉमी पर भी बोलने से मना कर दिया क्योंकि वो जुलाई में आने वाले आर्थिक सर्वे का इंतज़ार करना चाहते हैं। लेकिन सरकार जश्न मनाने के लिए नतीजे का इंतज़ार नहीं करना चाहती। वो इतिहास में दर्ज हो जाना चाहती है। ऐतिहासिक तो ये है ही कि टैक्स सिस्टम में बड़ा बदलाव है। लेकिन ऐतिहासिक कदम अच्छा है या बुरा है, ये नतीजे बताएंगे। जापान में recession आ गया था। मलेशिया में 2015 में लागू हुआ और वहां कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। नोटबंदी जैसा कदम तो ये नहीं है। नोटबंदी जिन वजहों को बताकर की गई, उसमें तो कोई बदलाव आया नहीं। अर्थव्यवस्था ज़रूर धीमी हो गयी। जीएसटी काफी सोच-समझकर और काम करके लागू किया गया है। 20 साल लगे हैं। अभी काफ़ी और सुधार किए जाएंगे धीरे-धीरे। पर देखने वाली बात ये है कि अर्थशास्त्री और राजनेता एक बात नहीं बोलते और ना सोचते। वो कहते हैं ना कि पॉलिटिशियन इकोनॉमी नहीं समझता। इकोनॉमिस्ट पॉलिटिक्स नहीं समझता। और आम आदमी दोनों ही नहीं समझता।

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akb GST-Politics-economy                                                                                 pic-google सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि 165 देश हैं जिन्होंने जीएसटी लागू किया है। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने कहा कि बाकी देशों में जीएसटी नहीं है, वैट सिस्टम लागू है। सिर्फ 7 देश हैं जहां जीएसटी है और उनमें से सिर्फ एक देश है जहां भारत की तरह ही संघीय ढांचा है - कैनेडा। कैनेडा में भी दो राज्यों ने इसे लागू नहीं किया है। ये परफेक्ट जीएसटी नहीं है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा कि अभी सुधार कि काफी गुंजाइश है, उनके हिसाब से रेट 2-3 ही होने चाहिए, अभी 4 हैं। हालांकि पहले वो सिर्फ एक रेट 15% रखने की वकालत करते रहे हैं। ये भी कहा कि सभी चीज़ों को जीएसटी में लाना होगा जैसे शराब, पेट्रोल, गैस, बिजली आदि। पहली बात तो अभी एक देश एक टैक्स जैसा कुछ नहीं हुआ है। सब चीज़ें जीएसटी में आई ही नहीं हैं। राज्यों ने जीएसटी मॉडल पास किया है लेकिन अपने अपने बदलावों के साथ। अगर आप 500 रुपये से नीचे का जूता लेते हैं तो उस पर 5% टैक्स है। अगर 500 से ऊपर का लेते हैं तो 18% है। 1000 से नीचे के कपड़ों पर 5% टैक्स। 1000 से ऊपर - 12%। सूती फाइबर -5%। कृत्रिम फाइबर - 18%। हमारे यहां 4 टैक्स स्लैब रखे गए हैं। बाकी देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ एक है। एक ही रेट की बात अरविंद सुब्रमण्यन कर रहे थे पहले। प्रधानमंत्री ने कहा कि इंस्पेक्टर राज, टैक्स टेररिज्म ख़त्म होगा। अभी तक जो कार्रवाई होती थी, उसमें था कि डिफाल्टर पर छापा होता था, FIR दर्ज होती थी और फिर आगे की कार्रवाई होती थी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और सांसद दीपेंद्र हुड्डा का कहना है कि जीएसटी में क्लॉज़ है कि अब सीधे गिरफ़्तारी हो सकती है। अफसरों को खुली छूट है। गैर ज़मानती अपराध कर दिया गया है जिसमें सज़ा भी 1-5 साल की है। तो ये इंस्पेक्टर राज की वापसी है। कल के आधी रात के जश्न में प्रधानमंत्री ने सभी सरकारों को इसका श्रेय दिया। कांग्रेस और टीएमसी ने इसका बहिष्कार किया था। लेकिन शायद उन्हें इसमें शामिल होना चाहिए था क्योंकि आलोचना तो आप कर सकते हैं किसी कार्यक्रम की लेकिन इस नए टैक्स सिस्टम को लाने में सबका योगदान है। आखिर संसद से ही पास हुआ है। खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि वित्त मंत्री के तौर पर वो इसकी रूपरेखा बनाने में शामिल थे। लेकिन इस जश्न में एक दिक्कत ये है कि इससे लोगों की उम्मीदों को बहुत ज़्यादा बढ़ाया जा रहा है। सभी अर्थशास्त्री बहुत संतुलित सी बात कह रहे हैं कि स्वागत होना चाहिए, ये एक शुरुआत है। महंगाई बढ़ेगी, दिक्कतें होंगी, सुधार की काफ़ी गुंजाइश है। अरविंद सुब्रमनियन ने तो इकोनॉमी पर भी बोलने से मना कर दिया क्योंकि वो जुलाई में आने वाले आर्थिक सर्वे का इंतज़ार करना चाहते हैं। लेकिन सरकार जश्न मनाने के लिए नतीजे का इंतज़ार नहीं करना चाहती। वो इतिहास में दर्ज हो जाना चाहती है। ऐतिहासिक तो ये है ही कि टैक्स सिस्टम में बड़ा बदलाव है। लेकिन ऐतिहासिक कदम अच्छा है या बुरा है, ये नतीजे बताएंगे। जापान में recession आ गया था। मलेशिया में 2015 में लागू हुआ और वहां कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। नोटबंदी जैसा कदम तो ये नहीं है। नोटबंदी जिन वजहों को बताकर की गई, उसमें तो कोई बदलाव आया नहीं। अर्थव्यवस्था ज़रूर धीमी हो गयी। जीएसटी काफी सोच-समझकर और काम करके लागू किया गया है। 20 साल लगे हैं। अभी काफ़ी और सुधार किए जाएंगे धीरे-धीरे। पर देखने वाली बात ये है कि अर्थशास्त्री और राजनेता एक बात नहीं बोलते और ना सोचते। वो कहते हैं ना कि पॉलिटिशियन इकोनॉमी नहीं समझता। इकोनॉमिस्ट पॉलिटिक्स नहीं समझता। और आम आदमी दोनों ही नहीं समझता।

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