Sarvapriya Sangwan

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वो कौन है जो अचानक आकर पत्रकार और भीड़ को डरा कर चला जाता है

akb threaten-journalists इस बीच जब ये खबर आ रही है कि यूपी सरकार ने कल रवीश कुमार की प्राइम टाइम रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए खोड़ा के एसबीआई बैंक में काउंटर बढ़ा दिए और मोबाइल एटीएम का इंतज़ाम किया है तब मैं पिछले दो दिन की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव को लिखने बैठी हूं. बुधवार को खोड़ा में रवीश कुमार के साथ मैं भी रिपोर्टिंग पर गयी थी. वहां हमने देखा और रवीश ने भी कई बार दोहराया कि जैसे ही कोई नोटबंदी की वजह से आ रही परेशानियों पर कुछ कहता है तो कहीं से एक दबंग आवाज़ आती है कि क्या हो गया परेशानी है तो, मोदी जी ने ठीक किया. लोग अपनी बात फिर से संकोच के साथ शुरू करते हैं कि हां, हम भी साथ हैं लेकिन खाने को पैसे नहीं हैं. कल जब शूट खत्म हुआ तो दो बाइक सवार आये और रवीश से बोले कि आप ही के चैनल पर भीड़ दिख रही है बैंकों के सामने, कुछ और भी दिखाइए. उसका बोलना आरोप जैसा लग रहा था. 93% गांवों में बैंक ही नहीं हैं, देश के बैंकिंग सिस्टम की हालत साफ़ नज़र आ रही है और फिर भी पता नहीं कौन से सुहाने सपने दिखाने की उम्मीद कर रहे हैं ऐसे लोग. क्या मीडिया जनता का माइक नहीं होनी चाहिए? क्या वो सिर्फ सरकार और राजनीतिक दलों को प्रेस कांफ्रेंस दिखाने के लिए है? मैं नहीं जानती कि ऐसे लोग एक न्यूज़ चैनल पर और क्या देखना चाहते हैं. शायद, बागों में बहार, वो भी बेमौसम. आज बुलंदशहर पहुंचे. जिस बैंक में गए, वो 16 गांवों में अकेला बैंक था, लोग शिकायत करने लगे. हमारी गाड़ी के पीछे एक गाड़ी आकर खड़ी हुई जिस पर वीआईपी का स्टीकर लगा था. लोग अपनी समस्या कह ही रहे थे तभी एक व्यक्ति वहां आया जो पहले से उस भीड़ में मौजूद नहीं था. उसने रवीश को कहा कि परेशानी है तो क्या हुआ, बॉर्डर से ज़्यादा नहीं है, बॉर्डर पर 80% जाट मरते हैं और मैं भी जाट हूं. कल आरोप की तरह बात की गयी और आज ये व्यक्ति धमकाने लगा, अपने साथ कुछ लड़कों को लाया था और उनके साथ मिलकर मोदी मोदी चिल्लाने लगा. बाकी लोग उन नारों की आवाज़ से चुप हो गए जैसे किसी ने सावधान की मुद्रा में खड़े रहने को कहा हो. हम बिगड़ते हालात को देख कर वहां से निकल गए और ये व्यक्ति भी बिना पैसा लिए या बैंक की लाइन में लगे वहां से अपनी स्कूटी पर चला गया. वक़्त कुछ ऐसा ही है कि जान कोई दे रहा है और उसकी जान की कीमत उसकी जाति के लोग घर बैठे वसूल रहे हैं. बिना कुछ किये. गुंडागर्दी करते हुए आप बता रहे हैं कि जाट हैं तो क्या आप उस जाति की इज़्ज़त को बढ़ा रहे हैं या घटा रहे हैं? फिर हम एक अनाजमंडी पहुंचे, जहां लोग यूरिया खरीदने के लिए लाइन लगाये हुए थे. किसी ने बताया कि उसने अभी धान बेचा और नकद मिला जिसमें पुराने 500 और 1000 के नोट हैं लेकिन यूरिया इन पैसों से नहीं मिल रहा. मुझे उन लोगों में पीछे खड़ा हुआ एक 22-23 साल का एक लड़का दिखा जो उस भीड़ से अलग ही लग रहा था. चमड़े की जैकेट, चश्मा लगाया हुआ था. उसने जाकर किसी को फ़ोन मिलाया, मैं उसे नोट कर रही थी. अचानक उस मंडी का कोई पल्लेदार आया और रवीश के ऊपर चिल्लाने लगा कि आप किसलिए 500 के नोट दिखा रहे हैं, हमने तो दिए नहीं, आप खुद दे रहे हैं. बिना किसी वजह के इस तरह का हमला औचक था. रवीश को और कैमरामैन को घेरने की कोशिश की, लेकिन वो और टीम के लोग गेट से पैदल बाहर निकल गए. पल्लेदार ने अपने लोगों के साथ मिलकर गेट बंद कर दिया और हमारी गाड़ी अंदर ही रह गयी. मैं पहले ही थोड़ा अलग हो गयी थी और एक छोटे गेट से निकल आई. हम कुछ मीटर पैदल चले जब तक गाड़ी बाहर नहीं निकली. वो लड़का जो मंडी में दिखा था, वो अपने साथी के साथ बाइक पर लगातार पीछा कर रहा था. हमने पुलिस को बुलाया. मैं बाइक का नंबर नोट कर चुकी थी और पुलिस को दे दिया. पुलिस ने हमारी मदद की और बहुत जल्दी मदद के लिए पहुंची. उसके बाद भी जब हम दिल्ली की तरफ निकले तो एक और वीआईपी स्टीकर वाली गाड़ी ने काफी दूर तक पीछा किया. लग रहा था मानो हम किसी निगरानी में हैं. मैं फैसला नहीं कर पा रही हूं कि ग्राउंड रिपोर्टिंग करनी चाहिये या नहीं. आज भीड़ की आड़ में कुछ भी किया जा सकता था. मौका ढूंढा जा रहा है कि किसी तरह उस आवाज़ को ख़त्म कर दें जो आपको गवारा नहीं. कभी पत्रकारों के साथ वकील के भेस में गुंडे कोर्ट परिसर में मार-पीट करते हैं, कभी बैन लगाने की कोशिश होती है, कभी किसी ट्विटर पर ट्रेंड करा गिराना चाहते हैं तो कभी देशद्रोही का सर्टिफिकेट बांटने में देरी नहीं लगाते. ये किसी एक के साथ नहीं हो रहा. और ऐसा चाहने वाली जनता नहीं है. क्योंकि रवीश कुमार ने खोड़ा पर रवीश की रिपोर्ट पहले भी की है, दिल्ली के कई इलाकों में कांग्रेस सरकार के दौरान रिपोर्ट की है, तब भी तो यही जनता थी. हां, राजनीतिक दलों के आईटी सेल नहीं बने थे तब. आज हैं और बड़े आराम से सोशल मीडिया का अपने लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. योजनाएं तो इस देश में पहले भी बनीं और विपक्ष में रहते हुए आज की सरकार ने खूब सवाल किये. अगर आज किसी योजना के लागू होने में दिक्कतें आ रही हैं और लगातार कई दिन से आ रही हैं तो क्या किया जाना चाहिये, एक कीर्तन मंडली बैठा देनी चाहिए चैनल पर जो भजन गाती रहे. काफी 'कंस्ट्रक्टिव' होगा देश के लिए. सिस्टम की हालत तो पहले भी यही थी, लेकिन क्या सरकार को इसलिए बदला गया था कि सिस्टम को ज्यों का त्यों रखे? होना तो यही चाहिए कि एक सरकार मीडिया रिपोर्ट का संज्ञान लेकर सुधार करे लेकिन कुछ सरकारें ऐसी भी होती हैं जो सारे संसाधन ऐसी रिपोर्ट को बंद करवाने में खपा देती हैं. खैर, तोहमतें चन्द अपने ज़िम्मे धर चले... जिस लिए आये थे हम, सो कर चले.

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पब्लिक जी, आप सब नहीं जानते हैं

akb

बुधवार को ही खबर आई कि देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने विजय माल्या की बंद हो चुकी कंपनी किंगफिशर एयरलाइंस को दिए 1,200 करोड़ रुपये के कर्ज़ को अपनी बही के बट्टे खाते (वह कर्ज़, जिसकी वसूली संभव न हो) में दर्ज कर लिया है. एसबीआई के एक पूर्व चेयरमैन ने NDTV को बताया कि एयूसीए कैटेगरी में कर्ज़ों को डाल देना इसी बात का संकेत है कि बैंक कमोबेश किंगफिशर से कर्ज़ की वसूली की उम्मीद छोड़ चुका है.जिसे संघर्ष करना है, करे. लेकिन सही वजह जानकर करे. SBI की चेयरमैन हों या बाकी बैंकर्स, सरकार के फैसले से काफी खुश हैं. हालांकि यूपीए सरकार के दौरान भी इन्हें कभी सरकार के फैसलों के खिलाफ बोलते देखा नहीं गया. ये बात भी खुल चुकी है कि बैंकों ने रिस्क लेकर उद्योगपतियों को काफी पैसा उधार दिया.Non-Performing asset(NPA) जिसे अगर आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि बैंकों ने काफी उधार दिया ब्याज़ पर, लेकिन वो ब्याज़ आना तो बंद हो ही गया, साथ ही मूल वापस आने की गुंजाइश भी कम ही है. तो आप ये जान लीजिये, फिलहाल इस NPA की वजह से पूरी दुनिया में भारत सबसे बुरी अर्थव्यवस्था के तौर पर खड़ा है.
 विभिन्न अख़बारी रिपोर्ट के आधार पर कुछ आंकड़े जुटाए हैं. 38 बैंको ने अपने नतीजे घोषित किये हैं जिनमें से 23 सरकारी/पब्लिक बैंक हैं और 15 प्राइवेट बैंक. इनके नतीजों से पता चलता है कि हालत बेहद खराब है. मुनाफ़ा 26% तक गिर गया है. ब्याज़ से होने वाली आमदनी ख़ास नहीं बढ़ी. NPA इस साल बढ़ कर 6.5 लाख करोड़ रुपये के हो गए हैं, 2015 में 3.3 लाख करोड़ थे.
मतलब इतना क़र्ज़ रूपी पैसा जिस पर अब ब्याज़ से आमदनी नहीं हो रही और इसका मूल भी वापस नहीं आया. सबसे बुरा हाल सरकारी बैंकों का है. 90 फीसदी NPA तो इनका है. कुछ सरकारी बैंक तो दिवालिया होने की कगार पर हैं. प्राइवेट बैंक जैसे एक्सिस बैंक का लाभ भी 84% तक गिर गया है. आईसीआईसीआई बैंक ने पिछले 10 साल के रिकॉर्ड में सबसे बुरा प्रदर्शन किया है. इस बैंक का NPA 76% बढ़ गया है. 16 फरवरी को इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया जिसमें खुलासा हुआ था कि सरकारी बैंकों ने 2013 और 2015 के बीच 1.14 लाख करोड़ के क़र्ज़ को घाटे के तौर पर दिखाया यानी राइट-ऑफ कर दिया.सरकारी बैंकों का दोबारा पूंजीकरण करना है तो कम से कम 2 लाख करोड़ रुपये चाहिए होंगे. सरकार ये पैसा कहां से लाती. तो क्या किया जा सकता था, आपके पास पड़ा हुआ पैसा बैंकों में जमा होना चाहिए और आपको कम से कम पैसा निकालने की इजाज़त. प्रधानमंत्री ने 50 दिन कह कर मांगे ही हैं. इकोनॉमिक टाइम्स में छपे एक लेख के अनुसार नए नोटों को छपने में कम से कम दो महीने का वक़्त लगेगा.
 एसबीआई का एक शेयर 8 नवंबर को 243 रुपये का था, 11 नवंबर को 287 रुपये पहुंच  गया. मतलब बैंक तो खुश हैं. जब पैसा आएगा तो दोबारा उधार दिया जा सकेगा उद्योगपतियों को.
भ्रष्टाचार और आतंकवाद से लड़ने का कदम तो इसलिए बताया गया है क्योंकि आम लोगों का समर्थन मिल सके. भ्रष्टाचार तो नए नोटों से फिर से शुरू होगा ही. ये एक साइकिल है, उद्योगपति पैसा देंगे राजनीतिक पार्टियों को जिसका हिसाब सार्वजनिक तो होता नहीं, पार्टियां जीतने के बाद उन्हें फायदे देंगी, उनके व्यापार के लिए कर्ज़े दिलवाएंगी, काला धन बाहर जमा होता रहेगा, उद्योगपति पैसा चुकाएंगे नहीं, यहां बैंकों की हालत खस्ता होती रहेगी. जब कोई विकल्प नज़र नहीं आएगा तो फिर से पाकिस्तान का मुद्दा गर्म हो जाएगा. कोई भी दल अपने चंदे को लेकर साफ़ नहीं है.जब तक काले धन की पहली सीढ़ी पर ही इसे रोका नहीं जायेगा, तब तक कुछ भी करते रहिये, फायदा कुछ नहीं. जो काम राजनीतिक दलों के हाथ में है, पहले उसे क्यों ना किये जाये, बजाय की जनता को परेशान करने के. बाकी आप अपने आस-पास देख ही रहे होंगे कि लोग किस तरह अपने काले धन को सफ़ेद कर रहे हैं और बड़े-बड़े उद्योगपति इस फैसले पर तालियां बजा रहे हैं. इस देश में योजनाएं हमेशा से बनती आ रही हैं, चाहे आधार कार्ड हो या मनरेगा लेकिन इन योजनाओं के लागू होने पर ही सवाल उठाये जाते हैं और ये देशद्रोह नहीं है. पब्लिक जी, आप सब नहीं जानते हैं.

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