Sarvapriya Sangwan

My Poetry

राब्ता

akb "कुछ यूँ अपना सब्र आज़मा लूं कि तेरी ख़ामोश आँखों से बतिया लूं " --------------******------------------- "गुस्सा तुम्हारा बाढ़ सा, रिश्ता अपना कच्चा घर था" --------------******-------------------- "मेरा दिल डूब जाने को , तेरे दो आंसू ही काफी थे" --------------******--------------------- एक बेताब निगाह मेरी, और मुड़ कर वो देखना तेरा एक लम्हे में भी प्रेम कहानी कोई मुकम्मल होती है -------------*******---------------------- खामोश रहती थी जो, वो आँखें तेरी बोलने लगी हैं पर जो सुन रही हूँ मैं, वो मेरे लिए नहीं है ------------*******----------------------- जो ढलता है तेरा प्यार इस दिल में, कुछ ढलती हूँ मैं भी साथ में ! -----------******-------------------------

तेरे मेरे बीच यूँ मसाफ़त कोई ख़ास ना थी सैंकड़ों दरवाज़े थे, बस मेरे हौंसले असीर थे।
(मसाफ़त - दूरी, असीर - कैद) ----------*************---------------------- खूबसूरत हर तस्वीर मेरी, तेरी नज़र को बयां करती है। --------------**********------------------------ यादें इतनी कि दिल भर में समेटी नहीं जाती, देखो यूँ आँखों से छलक आती है। --------------**********---------------------- कुछ 'पलों' की खुशकिस्मती है कि उनके 'गुज़र' जाने के बाद भी ज़िन्दगी उन्हें याद करती है। -------------*************-------------------- वक़्त ने कहा, काश थोड़ा और सब्र होता। सब्र ने कहा, काश थोड़ा और वक़्त होता।

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