Sarvapriya Sangwan

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मेरा नाम मोनिका लेविंस्की है...

akb "मेरा नाम मोनिका लेविंस्की है। हालांकि मुझे कई बार कहा गया कि मैं अपना नाम बदल लूं। कई बार पूछा गया कि अब तक क्यों नहीं बदला, लेकिन मैंने नहीं बदला। मैं ही वो पहली इंसान हूं, जिसने अपनी इज़्ज़त ऑनलाइन शेयरिंग के ज़रिये खोयी, जबकि उस वक़्त फेसबुक, ट्विटर नहीं थे, लेकिन ई-मेल और न्यूज़ वेबसाइट तब भी थीं। मैं जब भी टीवी देखती, जब भी ऑनलाइन जाती, मुझे गन्दी गालियों से नवाज़ने वाले लोगों की भरमार थी। भद्दे गानों में मेरा नाम आता था। बस एक ही बात कानों में गूंजती थी - मैं मरना चाहती हूं (I want to die)।" 16 साल बाद 'फोर्ब्स' के एक कार्यक्रम के दौरान मोनिका लेविंस्की मीडिया से जब मुखातिब हुईं, तब आपबीती सुनाते हुए अपने आंसू नहीं रोक पायीं। जी हां, ये वही मोनिका लेविंस्की है जो 1998 में अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से अपने प्रेम संबंधों के कारण सुर्ख़ियों में आ गई थीं। मोनिका महज़ 22 साल की थीं, जब व्हाइट हाउस में इंटर्न के तौर पर काम करने लगी थीं।

मुझे हमेशा ये बात सताती रही है कि जब इस पूरे प्रकरण में दो लोग बराबर शरीक़ थे, अपनी मर्ज़ी से, फिर सज़ा अकेली मोनिका ही क्यों भुगतती रही। एक आदमी ने अपनी शादी में धोखा किया, लेकिन उनकी पत्नी हिलेरी क्लिंटन ने उनका साथ दिया। उस आदमी के हाथ से सत्ता नहीं गई। अपनी पत्नी के सहयोग से वो राजनीतिक और घरेलू दोनों तरह के संकट से बाहर निकल आए। ताक़त यही होती है। लेकिन एक युवा लड़की इतनी छोटी उम्र में ज़िन्दगी भर के लिए अमेरिका की गुनहगार बन गई। ये एक बहुत बड़ा उदाहरण है कि लोग लड़कियों के प्रति कितने जजमेंटल होते हैं। सिर्फ भारत में ही नहीं, दूसरे देशों में भी। हमारे देश में अनुष्का शर्मा पनौती है। किसी खिलाड़ी का भाई, बेटा, पिता नहीं। जैसे आलिया भट्ट सबसे मूर्ख हैं। वरुण धवन या बाकी कोई हीरो नहीं। इतने दिनों से दीपिका पादुकोण की vogue वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इसकी आलोचना करने में महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। हालांकि बहुत ही ख़राब स्क्रिप्ट और कमज़ोर स्क्रीनप्ले की वजह से ये बेहद ख़राब वीडियो थी, लेकिन जहां तक मुझे लगता है, इसका संदेश इतना ही था कि महिलाओं के प्रति जजमेंटल कम हुआ जाए। काश, इसे थोड़ा बेहतर लिखा गया होता। मैं ये समझने में नाकाम हू कि "माय चॉइस" से महिला सशक्तिकरण किस तरह जुड़ा है। आप शादी करना चाहें या ना करना चाहें, ये आपकी इच्छा हो सकती है। लेकिन आप शादी निभाएं या ना निभाएं, ये फैसला आप इस शादी से जुड़े बाकी लोगों पर कैसे थोप सकती हैं। बेशक आपका ओढ़ना-पहनना, चलना फिरना, काम करना आपकी अपनी इच्छा है। लेकिन इसी तर्क से फिर आप बुर्का पहनने वाली, सिन्दूर लगाने वाली, घर में खपने वाली महिला को अबला करार नहीं दे सकते, क्योंकि फिर वो भी कहेगी - "माय चॉइस"। आप अपनी इस घटिया स्क्रिप्ट से महिलाओं की लड़ाई कमज़ोर कर रही हैं। महिला सशक्तिकरण का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक ही है - आत्म सम्मान। अगर आप अपने आत्म-सम्मान के लिए अपने पति, अपने मां-बाप और अपनी कमज़ोरियों से लड़ सकती हैं, तो आप बिल्कुल एक सशक्त महिला हैं। लेकिन आप अपने आत्म-सम्मान को ताक पर रखकर अपनी भावुकता की वजह से किसी से मार खाती हैं, धोखा बर्दाश्त करती हैं, किसी दूसरी लड़की के सम्मान को ठेस पहुंचाती हैं, तो फिर मनमर्ज़ी कपड़े पहनने और खूब पैसा कमाने के बावजूद दीपिका पादुकोण या हिलेरी क्लिंटन भी सामान्य महिलाएं ही हैं। अगर आप "माय चॉइस" के नाम पर दोगली बातें करती हैं, तो आप बहुत ही आसान रास्ता अख्तियार किये हुए हैं और माफ़ कीजियेगा इस हिसाब से इस देश में आपसे बेहतर महिलाएं मौजूद हैं। आप किसी विज्ञापन के ज़रिये इस तरह का संदेश देने के क़ाबिल नहीं हैं। अगर आप सही में एक सशक्त महिला हैं, तो फिर अपनी शर्तों पर फिल्म इंडस्ट्री में काम करके दिखाइए। बाज़ार का उत्पाद बनने से इंकार कीजिये। हर गलत बात पर अपनी आवाज़ उठाइये। बीच का रास्ता कहीं नहीं ले जाता। इस कमज़ोर वीडियो की वजह से कुछ पुरुषों को मौका मिल गया और वो अपनी किस्म की वीडियो के ज़रिये महिलाओं को बराबरी की सबक सिखाने लगे। सबक आप तब सिखाइये, जब आप समझ लें कि आखिर ये बराबरी होती क्या है। आज ही अपनी एक मित्र का पोस्ट पढ़ा। अगर एक लड़के को कोई लड़की घूरती है, तो ज़रूरी नहीं कि उसे इससे कोई ऐतराज़ हो, लेकिन एक लड़के का घूरना, किसी लड़की को असहज कर सकता है। किस तरह से समाज बलात्कार के लिए लड़कियों को दोषी ठहराता है और लड़कों को नहीं, ये बात भी अपने संज्ञान में रखिये। जिस दिन आप ये स्वीकार करने लगें कि आप जिस काम को अपनी मौज-मस्ती का नाम देते हैं और महिलाएं भी उसे शर्म की बजाय मौज-मस्ती का नाम दे सकती हैं, तो आप ज़रूर बराबरी के झंडे उठाइये। महिला सशक्तिकरण का सारा मुद्दा फ़िलहाल पुरुषों की बराबरी पर फोकस हो गया है। इस चक्कर में आप भूल जाती हैं कि आप पुरुषों के जिस चरित्र से नफरत करती हैं, आप धीरे-धीरे वही बनने लगती हैं। फिर ये लड़ाई किससे है। मुझे नहीं लगता कि फेमिनिज्म किसी किताब में पढ़कर सीखा जा सकता है। हर महिला पहले अपनी ज़िन्दगी पढ़े और फिर उसे किसी से फेमिनिज्म सीखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि आपकी यात्रा सामान्य नहीं थी। जिस लड़की ने अपनी जान देने की बजाय कई सालों तक उस बेइज़्ज़ती को झेला और अपना नाम नहीं बदला, शायद वो अमेरिका की सबसे शक्तिशाली महिला को फेमिनिज्म सीखा सकती है।

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लेह, तुम खुदा का मॉडर्न आर्ट हो

akb leh-is-the-modern-art-of-god ये कतई ज़रूरी नहीं कि कोई आपसे प्यार करे ही करे, ज़िन्दगी के लिए ज़रूरी है आपका प्यार में होना। कुछ ऐसे ही दीवाने होते होंगे जो 'लेह' में तमाम दिक्कतों के बावजूद बस अपने प्यार से मिलने पहुंच जाते हैं। अब ये दिक्कतें क्या हैं, ये आपको वहां जाने से पहले ही कोई ना कोई ज़रूर बता देगा। ऑक्सीजन की कमी, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, लम्बे दिन और वक़्त बिताने के बहाने कम। इसलिए दोस्तों को ज़रूर लेकर जाइयेगा। खैर, मैं घूमने-फिरने की शौक़ीन बिलकुल नहीं हूं लेकिन इस साल सोचा है कि कुछ जगहें ज़रूर देखनी हैं। तो सबसे पहले लेह जाना तय हुआ। हवाई जहाज़ से सिर्फ 1 घंटे का सफर है। ज़्यादातर यायावर दीवाने बाइक पर जाना पसंद करते हैं और पूरा लेह इस तरह घूमने में उन्हें तकरीबन 15 दिन का वक़्त लगता है। जैसे ही सुबह लेह एयरपोर्ट पर उतरे, आंखों ने जैसे कोई जाम पी लिया था और जो दिख रहा था वो बस नशा था। कहा गया था कि लेह पहुंचते ही आराम करना क्योंकि बहुत ऊंचाई पर बसा है। आपको मौसम के साथ तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। मुझे तो जाते ही नींद आ गयी थी क्योंकि उससे पहली रात मैं सोयी ही नहीं थी। उठने के बाद सब दोस्त बाहर निकले और पास ही शांति स्तूप की और बढ़े। चारों ओर इतना सुन्दर नजारा था कि बस सड़क पर ही लेट जाते थे। क्या करें, नशा ऐसा ही तो होता है। तभी तो वहां पर शराब, सिगरेट पीने वाले लोग नहीं मिले। एक ही जगह पर आपको रेगिस्तान, पहाड़, नदियां, चट्टानें, और एक ही दिन में आपको बर्फ़बारी, धूप, छांव, बारिश देखने को मिल जाये तो आप यही कहेंगे कि लेह, तुम खुदा का मॉडर्न आर्ट हो। आखिर में खुदा ने लेह को बनाया होगा और अपनी सारी कलाकारी दिखा दी होगी। यहां रंग ज़्यादा नहीं हैं, शेड्स हैं। पहाड़ों के शेड्स, चट्टानों के शेड्स। लड़कियों के कपड़ों की अलमारी में भी इतने शेड्स नहीं होते। कोई यहां आए तो ज़रूर अगली ड्रेस यहां की वादियों की शेड्स से मिला कर लेगी। दूध से ज़्यादा उजली बर्फ। कुफरी की तरह पीली नहीं। अच्छा है यहां वो खच्चर की सवारी नहीं होती। वरना आप उस बदबू में अपने मेट्रो शहर को ही याद करने लगते। रात को चांद यहां कुछ ज़्यादा ही मेहरबान होता है। रात को आसमान में अंगड़ाई लिए बादलों को आराम से देखा जा सकता है। चिनार के पेड़ भी एंटीना की तरह खड़े होकर इशारा दे रहे होते हैं कि हां, यही है वो जगह जहां धूप और चांदनी को ज़्यादा बरसना है। ये जगह सिर्फ दीवानों के लिए है जो या तो यायावरी से प्यार करते हैं या शान्ति से। ये जगह उन लोगों के लिए बिलकुल नहीं है जो शिमला, मनाली जैसी किसी जगह की उम्मीद कर रहे होते हैं और खाली पैकेट सड़कों पर फेंक कर अपनी बुरी यादें इन वादियों के लिए छोड़ जाते हैं। देखने को लेह में काफी जगहें हैं लेकिन ऐसी कोई जगह नहीं जहां आप जाकर महसूस करें कि वाह क्या जगह है। यहां के रास्ते ही हैं जो खूबसूरत हैं। इतने खूबसूरत की आप कहीं नहीं पहुंचना चाहते। बस चलते रहना चाहते हैं। ज़िन्दगी का मज़ा भी तो सिर्फ मंज़िल तक पहुंचने तक ही रहता है। फिर भी अगर जाना चाहें तो मैग्नेटिक हिल जाएं और जादू देखें कि कैसे कोई पहाड़ आपकी बंद गाड़ी को खींच रहा होता है। लेह पैलेस। कुछ पुराने बौद्ध मठ हैं। एक वॉर म्यूजियम है जहां भारत-पाकिस्तान की लड़ाइयों के कुछ अवशेष संजोये हैं। पैंग गोंग नदी की ख़ूबसूरती तो आप सभी ने कई फिल्मों में देख ही ली होगी। एक सुबह ऑक्सीजन की कमी से जल्दी आंख खुल गयी तो अजान सुन कर यकीन सा नहीं हुआ। बौद्ध धर्म का प्रसार तो वहां खूब हुआ ही है लेकिन एक बात जो देखने लायक है वो ये कि वहां संतोषी माता मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद सब मौजूद हैं। एक जगह जहां कि जनसँख्या डेढ़ लाख भी नहीं है, वहां तकरीबन सभी मुख्य धर्मों ने अपने अनुयायी ढूंढ ही लिए हैं। जैसे टीवी पर आने वाले हर बन्दे को ट्विटर फॉलोअर मिल ही जाते हैं। ज़्यादातर सब लोग हिंदी भी बोलते हैं। कुछ कुछ अंग्रेजी भी। अब यहां मुख्य तौर पर रोज़ी-रोटी टूरिज्म पर ही चलती है तो लोगों को हिंदी सीखनी ही थी। ये बताता है कि भाषा हमारी ज़रूरत है, गर्व का कारण नहीं। लेकिन इसकी गरिमा, गर्व पर आए दिन बहस होती ही रहती है। यहां के लोगों में काफी ईमानदारी है। अगर आप खड़डूंग ला जाएंगे जो कि दुनिया की सबसे ऊंची सड़क है जहां आप ड्राइव कर सकते हैं, इतनी ऊंचाई पर भी आपको 10 रुपये की चॉकलेट 10 रुपये में ही मिलेगी। बताने को तो काफी कुछ है, लेकिन यहां से सिर्फ रेटिंग ले जाइये और खुद जाकर हैरान होइए कि क्या इससे खूबसूरत भी कुछ और होगा। अगर आप अपनी कोई बकेट लिस्ट बना रहे हैं तो लेह को ज़रूर शामिल करें। ये मॉडर्न आर्ट आपकी यादों में हमेशा के लिए छप जाएगा।

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वो बूढ़ा प्रधानमंत्री…

akb

बाहर इतने लोग क्यों आये हैं? अरे, आपको देश का सबसे बड़ा सम्मान देने। ज़रा पर्दा हटाना तो, देखना चाहता हूँ.… हम्म… काफी लोग हैं। इन सबको मैं जानता हूँ। बस, कई सालों से देखा नहीं था यहाँ। यहाँ आना भी क्यों चाहिए था इन्हें। ये कोई शिकायत नहीं है। सबकी अपनी दुनिया है। एक बड़ी और एक छोटी सी। बड़ी सबके साथ सबके सामने। एक अपनी छोटी सी अपने साथ सिर्फ अपने सामने। उनकी दुनिया का कैनवास बड़ा है। मैं भी अपनी छोटी दुनिया में जी रहा हूँ। बड़ी दुनिया में बहुत लम्बा जिया। आज छोटी दुनिया में सिर्फ बड़ी दुनिया में बिताया हर पल रिवाइंड करता हूँ। आप खुश नहीं हैं क्या, सब आपको इतना बड़ा सम्मान देने आये हैं। खुश? आज उम्र के इस पड़ाव पर ख़ुशी या गम क्या मायने रखते हैं। सब वैसा ही घट रहा है जैसे हमेशा घटता आया है। सिर्फ चेहरे ही तो अलग हैं। मुझे पता नहीं कि मैंने क्या अलग किया। अलग किया भी तो क्या पाया। अंत ही तो है जो अंतिम सत्य है। स्थायी है। अटल है। सभी को वही मिलता है। मेरी बातें सुन कर तुम निराश ना होना। मैं बोलता नहीं हूँ अब। ये उम्र मुझे शांत कर गयी है। मैं खूब चिल्लाया हूँ, मैंने खूब जोश भरा है लोगों में। तब मेरा रोल वही था। मैंने अपना रोल अदा किया। अब ये ज़बान की शान्ति नहीं है, ये मन की शान्ति है। बोल-बोल कर क्या पाया मैंने। किसकी ज़िन्दगी बदल पाया। शायद सिर्फ अपनी। कई बार सोचता हूँ कि अगर ज़िन्दगी में ये ना करता तो क्या करता। जब सोचता हूँ कि कुछ और करता तो मन खिन्न सा हो जाता है। काश कुछ और भी कर के देख सकता। लेकिन थोड़ी ही देर में विरक्ति सुन्न पड़े शरीर में खून की तरह दौड़ जाती है। सब परिवार वाले खुश हैं देखिये…. हाँ, अब यही मेरी विरासत है इनके लिए। कुछ दिन बाद मुझे नहीं पता होगा कि मुझे क्या मिला, क्या खोया, क्या रह गया। मैं जानता हूँ कि इन दिनों मैं अपने आस-पास के लोगों को पहचान नहीं पाता। लेकिन ये हालत अभी नहीं हुई। ज़िन्दगी भर इन लोगों को देख कर यही सोचता रहा कि क्या इन्हें पहचान पाया हूँ। मैंने इन्हें कितना झूठा पाया, मैंने इन्हें कितना छुपाते पाया। आज ये सोचना मुश्किल सा हो रहा है कि ये मेरे लिए आये हैं। कहीं ये भी किसी राजनीति का हिस्सा तो नहीं। शायद ज़्यादा सोच रहा हूँ। किसी मकसद से आये हों, क्या फर्क पड़ता है मुझे। मेरा नाम अमर भी हो गया तो मुझे क्या पता चलेगा मरने के बाद। मैंने देखा है कि जब परिवार में कोई बहुत बूढ़ा हो जाता है तो परिवार वाले उसका जीवन-काज मनाते हैं। लोगों को बुलाते हैं, खाना खिलाते हैं ताकि बूढ़ा इंसान मरने से पहले देख ले अपने मरने का समारोह। आज वैसा ही कुछ लग रहा है। समझ नहीं आ रहा कि क्या चुभ रहा है आपको? ये सब ठीक है अपनी जगह। ये सम्मान वगैरह। लेकिन मैं इनसे कैसे कहूँ कि मेरे कुछ पछतावे दूर कर दें। मैं इनसे कैसे कहूँ कि अंत में छोटी दुनिया में आना है, अपने साथ पछतावों का पुलिंदा ना लेकर आना। इस कमरे में मौसम नहीं बदलता। इस कमरे में कोई साथी नहीं आता। आखिर में बस तुम होगे और तुम्हारा अक्स जो अंदर बैठा है। उसी से घंटों बातें होंगी। दोनों में से किसी को नींद नहीं आएगी। उस चरम सीमा पर पहुँच जाओगे जहाँ से फिर सब भूलने लगोगे। जैसे गर्मी अपने चरम पर पहुँचती है और बारिश हो जाती है। मैं फिर शून्य हो जाता हूँ। मैं जानता हूँ, मैं फिर शून्य होने वाला हूँ। सिफर से सिफर तक पहुँचने के लिए इतनी जद्दोजहद करते हैं हम। देखो, अब भी एक पल विरक्त होता हूँ और एक पल कुछ चाहने लगता हूँ। अब मुझे सच में सिर्फ विरक्त अंत चाहिए, और कुछ नहीं।

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