Sarvapriya Sangwan

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तीन तलाक़ ख़त्म होने से कुछ होगा समाधान?

akb जब तलाक-उल-सुन्नत मौजूद है जिसे सुन्नी और शिया समाज दोनों ने अपनाया है तो तलाक़-उल-बिद्दत (एक बार में तीन तलाक़) की ज़रूरत क्या है। इसे बचाने के लिए क्यों आड़े-टेढ़े तर्क निकाल कर ला रहे हैं। तलाक़-उल-बिद्दत को कानूनी मान्यता तो दी गयी है लेकिन साथ ही इसे गलत भी बताया गया है। 'sinful' लिखा है। कानूनी मान्यता(पर्सनल लॉ) शायद उस फलसफे पर कि मज़ाक में की गई शादी और तलाक़ दोनों को गंभीरता से लिया जाए। तलाक़-उल-सुन्नत में कायदा है। इसमें वक़्त दिया जाता है। मान-मुनव्वल की कोशिश होती है। वापस भी लिया जा सकता है। लेकिन तलाक़-उल-बिद्दत में ऐसा कुछ नहीं होता। शिया समाज इसे मानता भी नहीं। देश की कई अदालतों ने भी इसे गलत ठहराया है। सबसे बड़ा तो शमीम आरा केस जो कानून पढ़ रहे लोग इम्तिहान में लिख कर आते है।

एक गलतफहमी का शिकार हैं हम लोग। तलाक़ से किसी की ज़िंदगी बर्बाद नहीं होती। बर्बाद होती है लड़की की बेइज़्ज़ती से। बर्बाद होती है जब उसे कोई लक्ष्य नज़र नहीं आता और इसलिए एक बुरे रिश्ते में रहना भी मंज़ूर कर लेती है। तलाक़ के बाद अगर कोर्ट मेंटेनेस भी तय कर दे, क्या तब भी उसकी जिंदगी सुधर जाएगी? आपको इल्म है कि कई बार तो 2000 रूपये प्रति माह मेंटेनेंस तय होता है। कितने निकाहों में लाख रुपये से ऊपर का मेहर देख लिया आप लोगों ने? हम लड़की के माँ-बाप को क्यों ना दोषी माने जब उन्होंने तय किया था कि पढ़-लिख कर क्या करेगी जब घर ही बसाना है इसे। खाते-पीते घर में शादी कर दी तो फिर नौकरी की क्या ज़रूरत। जब ज़रूरत महसूस होती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और फिर मीडिया में उनकी दर्द भरी दास्तानें चलाई जाती हैं जहां असली ज़िम्मेदारी कभी तय नहीं होती। तलाक़-उल-बिद्दत तो खुद ही खत्म कर देना चाहिए पर्सनल लॉ बोर्ड को या संसद को। लेकिन उसके बाद भी क्या। लोग क्यों नहीं समझते कि किसी को भी अपने पैरों पर इसलिए खड़ा होना चाहिए कि वो अन्याय के खिलाफ मज़बूत हो, ताकि वो अपनी कीमत पहचान सकें। तलाक़ आप कैसे भी करवा लीजिये, लेकिन न्याय तो शादी/निकाह से पहले शुरू करना होगा।

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तीन तलाक़ ख़त्म होने से कुछ होगा समाधान?

akb जब तलाक-उल-सुन्नत मौजूद है जिसे सुन्नी और शिया समाज दोनों ने अपनाया है तो तलाक़-उल-बिद्दत (एक बार में तीन तलाक़) की ज़रूरत क्या है। इसे बचाने के लिए क्यों आड़े-टेढ़े तर्क निकाल कर ला रहे हैं। तलाक़-उल-बिद्दत को कानूनी मान्यता तो दी गयी है लेकिन साथ ही इसे गलत भी बताया गया है। 'sinful' लिखा है। कानूनी मान्यता(पर्सनल लॉ) शायद उस फलसफे पर कि मज़ाक में की गई शादी और तलाक़ दोनों को गंभीरता से लिया जाए। तलाक़-उल-सुन्नत में कायदा है। इसमें वक़्त दिया जाता है। मान-मुनव्वल की कोशिश होती है। वापस भी लिया जा सकता है। लेकिन तलाक़-उल-बिद्दत में ऐसा कुछ नहीं होता। शिया समाज इसे मानता भी नहीं। देश की कई अदालतों ने भी इसे गलत ठहराया है। सबसे बड़ा तो शमीम आरा केस जो कानून पढ़ रहे लोग इम्तिहान में लिख कर आते है।

एक गलतफहमी का शिकार हैं हम लोग। तलाक़ से किसी की ज़िंदगी बर्बाद नहीं होती। बर्बाद होती है लड़की की बेइज़्ज़ती से। बर्बाद होती है जब उसे कोई लक्ष्य नज़र नहीं आता और इसलिए एक बुरे रिश्ते में रहना भी मंज़ूर कर लेती है। तलाक़ के बाद अगर कोर्ट मेंटेनेस भी तय कर दे, क्या तब भी उसकी जिंदगी सुधर जाएगी? आपको इल्म है कि कई बार तो 2000 रूपये प्रति माह मेंटेनेंस तय होता है। कितने निकाहों में लाख रुपये से ऊपर का मेहर देख लिया आप लोगों ने? हम लड़की के माँ-बाप को क्यों ना दोषी माने जब उन्होंने तय किया था कि पढ़-लिख कर क्या करेगी जब घर ही बसाना है इसे। खाते-पीते घर में शादी कर दी तो फिर नौकरी की क्या ज़रूरत। जब ज़रूरत महसूस होती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और फिर मीडिया में उनकी दर्द भरी दास्तानें चलाई जाती हैं जहां असली ज़िम्मेदारी कभी तय नहीं होती। तलाक़-उल-बिद्दत तो खुद ही खत्म कर देना चाहिए पर्सनल लॉ बोर्ड को या संसद को। लेकिन उसके बाद भी क्या। लोग क्यों नहीं समझते कि किसी को भी अपने पैरों पर इसलिए खड़ा होना चाहिए कि वो अन्याय के खिलाफ मज़बूत हो, ताकि वो अपनी कीमत पहचान सकें। तलाक़ आप कैसे भी करवा लीजिये, लेकिन न्याय तो शादी/निकाह से पहले शुरू करना होगा।

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