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अयोध्या में राम मंदिर भूमि-पूजन के बाद हिंदी मीडिया

akb

अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी ज़मीन विवाद में कई अहम तारीखें आईं और पांच अगस्त 2020 भी इस लिस्ट में जुड़ गई है.

जिस देश के संविधान की आत्मा में धर्मनिरपेक्षता समाहित है, वहां कई दिनों तक राज्य सरकार और प्रशासन राम मंदिर भूमि पूजन के काम में लगे रहे. फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां जाकर मंदिर की पहली ईंट रख दी.

मैं इस मौक़े पर अयोध्या में ही बीबीसी कवरेज के लिए मौजूद थी. छह अगस्त को वहां के तीन प्रमुख हिंदी अख़बारों ने इस पूरे इवेंट को किस तरह कवर किया, वो यहां लिख रही हूं क्योंकि पत्रकार अपने वक़्त का दस्तावेज़ीकरण भी करता है.

अमर उजाला अख़बार ने अपने 14 पन्नों में छह पन्ने पाँच अगस्त के कार्यक्रम की खबरों को दिए हैं.
अख़बार के नाम के नीचे ही एक दोहे और उसके अर्थ को छापा है- ‘शोभा के मूल भगवान के प्रकट होने पर घर-घर मंगलमय बधाई बजने लगी. नगर के स्त्री-पुरुषों के समूह जहां-तहाँ आनंदमग्न हो रहे हैं.’
अमर उजाला ने पहले पन्ने पर टॉप लाइन लिखी है कि 492 साल के बाद अब टेंट-अस्थाई मंदिर से भव्य मंदिर में आएँगे रामलला. 
पहले पन्ने पर टॉप ख़बर की हेडलाइन है.. ‘सबमें राम, सबके राम’

उसी ख़बर के नीचे एक हेडलाइन है कि ‘यह दिन करोड़ों रामभक्तों के संकल्प की सत्यता का प्रमाण.’
इसके अलावा संपादकीय में लिखा है कि ‘राम मंदिर के निर्माण का आंदोलन सिर्फ़ राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह देश की करोड़ों आस्थाओं का प्रतीक भी रहा है.’
‘यह उन लोगों को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए लड़ाई लड़ी और अपने प्राणों की आहुति दी.’
इसके अलावा चार पन्नों का अयोध्या-अंबेडकरनगर एडिशन भी हैं जिसमें इसी कार्यक्रम की चर्चा है. इस एडिशन में दूसरे पन्ने पर अंबेडकरनगर से एक और ख़बर है जिसकी हेडलाइन है- ‘30 हज़ार की आबादी अघोषित विद्युत कटौती से बेहाल.’

लखनऊ से छपे दैनिक जागरण में पहले और दूसरे पन्ने पर विज्ञापन है, तीसरे और चौथे पन्ने पर राजनीतिक विज्ञापन हैं जो उत्तर प्रदेश के कुछ विधायकों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को राम मंदिर भूमि पूजन के कार्यक्रम को लेकर धन्यवाद किया है. 
दैनिक जागरण की पहली ख़बर की हेडलाइन है- ‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम’ (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम में अपने भाषण में इन पंक्तियों को बोला था).  इस ख़बर की शुरुआत होती है- ‘रघुकुल रीत सदा चली आयी, प्राण जाए पर वचन न जाई...। पाँच शताब्दियों से रघुकुल की इस रीत का अनुसरण करते हुए रघुवर यानी प्रभु श्रीराम के लाखों भक्त पीढ़ी दर पीढ़ी चले आन्दोलन में प्राणों की आहुति देते रहे और आख़िरकार ‘रामलला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे...’ का वचन पूरा हुआ. 
अख़बार ने कार्यक्रम से जुड़ी टिप्पणियों और खबरों को प्रमुखता से छापा है. 
संपादकीय में ‘राम मंदिर की महिमा’ हेडलाइन के साथ छपा है. 
इसमें लिखा है कि ‘इससे बेहतर कुछ नहीं कि राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़े वैसे-वैसे जन-जन में यह संदेश जाये कि राम मंदिर का निर्माण राष्ट्र के निर्माण का माध्यम है. इस लक्ष्य की पूर्ति तभी हो सकती है जब भारतीय समाज में सद्भाव और समरस्ता बढ़े.’
सम्पादकीय में ही एक टिप्पणी अयोध्या के विकास को लेकर है कि अब नयी अयोध्या बनने जा रही है. नयी अयोध्या का नक़्शा राज्य सरकार बना चुकी है और अब उसे साकार होना शेष है.’


हिंदुस्तान अख़बार की मुख्य ख़बर की हेडलाइन है, ‘अतीत की नींव पर आगत का आग़ाज़.’
अख़बार में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी का लेख भी छपा है. इसमें उन्होंने लिखा है कि अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का भूमि पूजन सद्भाव और समरसता के साथ संपन्न होना ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की ताक़त और ‘अनेकता में एकता’ की शक्ति के साथ पूरी दुनिया में हिंदुस्तान की धाक मज़बूत करता है.’ 
उन्होंने ये भी लिखा है, ‘हमारे देश के मुस्लिम समाज को किसी विदेशी आक्रमणकारी की करतूतों-गुनाहों का गुनहगार नहीं समझा जा सकता. इस ऐतिहासिक क्षण का उसने भी सकारात्मक सोच के साथ स्वागत किया है.’
संपादकीय में लिखा गया है कि मंदिर निर्माण का ये अवसर याद दिला रहा है कि देश को अपनी राष्ट्रीय संस्थाओं की मर्यादा को भी कमतर नहीं करना चाहिए. एक ऐसे दौर में में, जब कुदरती और मानवीय विध्वंसों से लोहा ले रहे हैं, निर्माण का महत्व अधिक शिद्दत से महसूस होना चाहिए. 
‘एक शशक्त भारत रचने के लिए अभी बहुत सारे अस्पतालों और स्कूलों की दरकार है, बल्कि अनगिनत पुलों, पनाहगाहों, ताल-तलैयों और सीमाओं पर सड़कों-बंकरों के जाल की भी आवश्यकता है. इनके लिए बहुत सारे संसाधनों की ज़रूरत है और ये कोई बाहर वाला हमें नहीं देगा, नागरिकों को अपने कर्म से अर्जित करना पड़ेगा.’

बेशक़ ये एक बड़ी ख़बर थी भारत के लिए जिसे तवज्जो दी जानी चाहिए थी लेकिन किसी भी संपादकीय में नहीं लिखा गया कि ये संविधान के अनुरूप नहीं था.

कहीं भी ये सवाल नहीं पूछा गया कि अगर इस ज़मीन विवाद का फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में होता और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड का ट्रस्ट मस्जिद की पहली ईंट रखता तो क्या सरकार और प्रशासन इसी तरह उस कार्यक्रम के लिए काम करता? क्या तब भी ये उतनी ही शांति और सौहार्द से इस फ़ैसले को दूसरा पक्ष स्वीकार कर लेता?

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अयोध्या में राम मंदिर भूमि-पूजन के बाद हिंदी मीडिया

akb

अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी ज़मीन विवाद में कई अहम तारीखें आईं और पांच अगस्त 2020 भी इस लिस्ट में जुड़ गई है.

जिस देश के संविधान की आत्मा में धर्मनिरपेक्षता समाहित है, वहां कई दिनों तक राज्य सरकार और प्रशासन राम मंदिर भूमि पूजन के काम में लगे रहे. फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां जाकर मंदिर की पहली ईंट रख दी.

मैं इस मौक़े पर अयोध्या में ही बीबीसी कवरेज के लिए मौजूद थी. छह अगस्त को वहां के तीन प्रमुख हिंदी अख़बारों ने इस पूरे इवेंट को किस तरह कवर किया, वो यहां लिख रही हूं क्योंकि पत्रकार अपने वक़्त का दस्तावेज़ीकरण भी करता है.

अमर उजाला अख़बार ने अपने 14 पन्नों में छह पन्ने पाँच अगस्त के कार्यक्रम की खबरों को दिए हैं.
अख़बार के नाम के नीचे ही एक दोहे और उसके अर्थ को छापा है- ‘शोभा के मूल भगवान के प्रकट होने पर घर-घर मंगलमय बधाई बजने लगी. नगर के स्त्री-पुरुषों के समूह जहां-तहाँ आनंदमग्न हो रहे हैं.’
अमर उजाला ने पहले पन्ने पर टॉप लाइन लिखी है कि 492 साल के बाद अब टेंट-अस्थाई मंदिर से भव्य मंदिर में आएँगे रामलला. 
पहले पन्ने पर टॉप ख़बर की हेडलाइन है.. ‘सबमें राम, सबके राम’

उसी ख़बर के नीचे एक हेडलाइन है कि ‘यह दिन करोड़ों रामभक्तों के संकल्प की सत्यता का प्रमाण.’
इसके अलावा संपादकीय में लिखा है कि ‘राम मंदिर के निर्माण का आंदोलन सिर्फ़ राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह देश की करोड़ों आस्थाओं का प्रतीक भी रहा है.’
‘यह उन लोगों को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए लड़ाई लड़ी और अपने प्राणों की आहुति दी.’
इसके अलावा चार पन्नों का अयोध्या-अंबेडकरनगर एडिशन भी हैं जिसमें इसी कार्यक्रम की चर्चा है. इस एडिशन में दूसरे पन्ने पर अंबेडकरनगर से एक और ख़बर है जिसकी हेडलाइन है- ‘30 हज़ार की आबादी अघोषित विद्युत कटौती से बेहाल.’

लखनऊ से छपे दैनिक जागरण में पहले और दूसरे पन्ने पर विज्ञापन है, तीसरे और चौथे पन्ने पर राजनीतिक विज्ञापन हैं जो उत्तर प्रदेश के कुछ विधायकों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को राम मंदिर भूमि पूजन के कार्यक्रम को लेकर धन्यवाद किया है. 
दैनिक जागरण की पहली ख़बर की हेडलाइन है- ‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम’ (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम में अपने भाषण में इन पंक्तियों को बोला था).  इस ख़बर की शुरुआत होती है- ‘रघुकुल रीत सदा चली आयी, प्राण जाए पर वचन न जाई...। पाँच शताब्दियों से रघुकुल की इस रीत का अनुसरण करते हुए रघुवर यानी प्रभु श्रीराम के लाखों भक्त पीढ़ी दर पीढ़ी चले आन्दोलन में प्राणों की आहुति देते रहे और आख़िरकार ‘रामलला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे...’ का वचन पूरा हुआ. 
अख़बार ने कार्यक्रम से जुड़ी टिप्पणियों और खबरों को प्रमुखता से छापा है. 
संपादकीय में ‘राम मंदिर की महिमा’ हेडलाइन के साथ छपा है. 
इसमें लिखा है कि ‘इससे बेहतर कुछ नहीं कि राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़े वैसे-वैसे जन-जन में यह संदेश जाये कि राम मंदिर का निर्माण राष्ट्र के निर्माण का माध्यम है. इस लक्ष्य की पूर्ति तभी हो सकती है जब भारतीय समाज में सद्भाव और समरस्ता बढ़े.’
सम्पादकीय में ही एक टिप्पणी अयोध्या के विकास को लेकर है कि अब नयी अयोध्या बनने जा रही है. नयी अयोध्या का नक़्शा राज्य सरकार बना चुकी है और अब उसे साकार होना शेष है.’


हिंदुस्तान अख़बार की मुख्य ख़बर की हेडलाइन है, ‘अतीत की नींव पर आगत का आग़ाज़.’
अख़बार में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी का लेख भी छपा है. इसमें उन्होंने लिखा है कि अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का भूमि पूजन सद्भाव और समरसता के साथ संपन्न होना ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की ताक़त और ‘अनेकता में एकता’ की शक्ति के साथ पूरी दुनिया में हिंदुस्तान की धाक मज़बूत करता है.’ 
उन्होंने ये भी लिखा है, ‘हमारे देश के मुस्लिम समाज को किसी विदेशी आक्रमणकारी की करतूतों-गुनाहों का गुनहगार नहीं समझा जा सकता. इस ऐतिहासिक क्षण का उसने भी सकारात्मक सोच के साथ स्वागत किया है.’
संपादकीय में लिखा गया है कि मंदिर निर्माण का ये अवसर याद दिला रहा है कि देश को अपनी राष्ट्रीय संस्थाओं की मर्यादा को भी कमतर नहीं करना चाहिए. एक ऐसे दौर में में, जब कुदरती और मानवीय विध्वंसों से लोहा ले रहे हैं, निर्माण का महत्व अधिक शिद्दत से महसूस होना चाहिए. 
‘एक शशक्त भारत रचने के लिए अभी बहुत सारे अस्पतालों और स्कूलों की दरकार है, बल्कि अनगिनत पुलों, पनाहगाहों, ताल-तलैयों और सीमाओं पर सड़कों-बंकरों के जाल की भी आवश्यकता है. इनके लिए बहुत सारे संसाधनों की ज़रूरत है और ये कोई बाहर वाला हमें नहीं देगा, नागरिकों को अपने कर्म से अर्जित करना पड़ेगा.’

बेशक़ ये एक बड़ी ख़बर थी भारत के लिए जिसे तवज्जो दी जानी चाहिए थी लेकिन किसी भी संपादकीय में नहीं लिखा गया कि ये संविधान के अनुरूप नहीं था.

कहीं भी ये सवाल नहीं पूछा गया कि अगर इस ज़मीन विवाद का फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में होता और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड का ट्रस्ट मस्जिद की पहली ईंट रखता तो क्या सरकार और प्रशासन इसी तरह उस कार्यक्रम के लिए काम करता? क्या तब भी ये उतनी ही शांति और सौहार्द से इस फ़ैसले को दूसरा पक्ष स्वीकार कर लेता?

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अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी ज़मीन विवाद में कई अहम तारीखें आईं और पांच अगस्त 2020 भी इस लिस्ट में जुड़ गई है.

जिस देश के संविधान की आत्मा में धर्मनिरपेक्षता समाहित है, वहां कई दिनों तक राज्य सरकार और प्रशासन राम मंदिर भूमि पूजन के काम में लगे रहे. फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां जाकर मंदिर की पहली ईंट रख दी.

मैं इस मौक़े पर अयोध्या में ही बीबीसी कवरेज के लिए मौजूद थी. छह अगस्त को वहां के तीन प्रमुख हिंदी अख़बारों ने इस पूरे इवेंट को किस तरह कवर किया, वो यहां लिख रही हूं क्योंकि पत्रकार अपने वक़्त का दस्तावेज़ीकरण भी करता है.

अमर उजाला अख़बार ने अपने 14 पन्नों में छह पन्ने पाँच अगस्त के कार्यक्रम की खबरों को दिए हैं.
अख़बार के नाम के नीचे ही एक दोहे और उसके अर्थ को छापा है- ‘शोभा के मूल भगवान के प्रकट होने पर घर-घर मंगलमय बधाई बजने लगी. नगर के स्त्री-पुरुषों के समूह जहां-तहाँ आनंदमग्न हो रहे हैं.’
अमर उजाला ने पहले पन्ने पर टॉप लाइन लिखी है कि 492 साल के बाद अब टेंट-अस्थाई मंदिर से भव्य मंदिर में आएँगे रामलला. 
पहले पन्ने पर टॉप ख़बर की हेडलाइन है.. ‘सबमें राम, सबके राम’

उसी ख़बर के नीचे एक हेडलाइन है कि ‘यह दिन करोड़ों रामभक्तों के संकल्प की सत्यता का प्रमाण.’
इसके अलावा संपादकीय में लिखा है कि ‘राम मंदिर के निर्माण का आंदोलन सिर्फ़ राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह देश की करोड़ों आस्थाओं का प्रतीक भी रहा है.’
‘यह उन लोगों को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए लड़ाई लड़ी और अपने प्राणों की आहुति दी.’
इसके अलावा चार पन्नों का अयोध्या-अंबेडकरनगर एडिशन भी हैं जिसमें इसी कार्यक्रम की चर्चा है. इस एडिशन में दूसरे पन्ने पर अंबेडकरनगर से एक और ख़बर है जिसकी हेडलाइन है- ‘30 हज़ार की आबादी अघोषित विद्युत कटौती से बेहाल.’

लखनऊ से छपे दैनिक जागरण में पहले और दूसरे पन्ने पर विज्ञापन है, तीसरे और चौथे पन्ने पर राजनीतिक विज्ञापन हैं जो उत्तर प्रदेश के कुछ विधायकों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को राम मंदिर भूमि पूजन के कार्यक्रम को लेकर धन्यवाद किया है. 
दैनिक जागरण की पहली ख़बर की हेडलाइन है- ‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम’ (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम में अपने भाषण में इन पंक्तियों को बोला था).  इस ख़बर की शुरुआत होती है- ‘रघुकुल रीत सदा चली आयी, प्राण जाए पर वचन न जाई...। पाँच शताब्दियों से रघुकुल की इस रीत का अनुसरण करते हुए रघुवर यानी प्रभु श्रीराम के लाखों भक्त पीढ़ी दर पीढ़ी चले आन्दोलन में प्राणों की आहुति देते रहे और आख़िरकार ‘रामलला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे...’ का वचन पूरा हुआ. 
अख़बार ने कार्यक्रम से जुड़ी टिप्पणियों और खबरों को प्रमुखता से छापा है. 
संपादकीय में ‘राम मंदिर की महिमा’ हेडलाइन के साथ छपा है. 
इसमें लिखा है कि ‘इससे बेहतर कुछ नहीं कि राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़े वैसे-वैसे जन-जन में यह संदेश जाये कि राम मंदिर का निर्माण राष्ट्र के निर्माण का माध्यम है. इस लक्ष्य की पूर्ति तभी हो सकती है जब भारतीय समाज में सद्भाव और समरस्ता बढ़े.’
सम्पादकीय में ही एक टिप्पणी अयोध्या के विकास को लेकर है कि अब नयी अयोध्या बनने जा रही है. नयी अयोध्या का नक़्शा राज्य सरकार बना चुकी है और अब उसे साकार होना शेष है.’


हिंदुस्तान अख़बार की मुख्य ख़बर की हेडलाइन है, ‘अतीत की नींव पर आगत का आग़ाज़.’
अख़बार में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी का लेख भी छपा है. इसमें उन्होंने लिखा है कि अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का भूमि पूजन सद्भाव और समरसता के साथ संपन्न होना ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की ताक़त और ‘अनेकता में एकता’ की शक्ति के साथ पूरी दुनिया में हिंदुस्तान की धाक मज़बूत करता है.’ 
उन्होंने ये भी लिखा है, ‘हमारे देश के मुस्लिम समाज को किसी विदेशी आक्रमणकारी की करतूतों-गुनाहों का गुनहगार नहीं समझा जा सकता. इस ऐतिहासिक क्षण का उसने भी सकारात्मक सोच के साथ स्वागत किया है.’
संपादकीय में लिखा गया है कि मंदिर निर्माण का ये अवसर याद दिला रहा है कि देश को अपनी राष्ट्रीय संस्थाओं की मर्यादा को भी कमतर नहीं करना चाहिए. एक ऐसे दौर में में, जब कुदरती और मानवीय विध्वंसों से लोहा ले रहे हैं, निर्माण का महत्व अधिक शिद्दत से महसूस होना चाहिए. 
‘एक शशक्त भारत रचने के लिए अभी बहुत सारे अस्पतालों और स्कूलों की दरकार है, बल्कि अनगिनत पुलों, पनाहगाहों, ताल-तलैयों और सीमाओं पर सड़कों-बंकरों के जाल की भी आवश्यकता है. इनके लिए बहुत सारे संसाधनों की ज़रूरत है और ये कोई बाहर वाला हमें नहीं देगा, नागरिकों को अपने कर्म से अर्जित करना पड़ेगा.’

बेशक़ ये एक बड़ी ख़बर थी भारत के लिए जिसे तवज्जो दी जानी चाहिए थी लेकिन किसी भी संपादकीय में नहीं लिखा गया कि ये संविधान के अनुरूप नहीं था.

कहीं भी ये सवाल नहीं पूछा गया कि अगर इस ज़मीन विवाद का फ़ैसला मुसलमानों के पक्ष में होता और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड का ट्रस्ट मस्जिद की पहली ईंट रखता तो क्या सरकार और प्रशासन इसी तरह उस कार्यक्रम के लिए काम करता? क्या तब भी ये उतनी ही शांति और सौहार्द से इस फ़ैसले को दूसरा पक्ष स्वीकार कर लेता?

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