Sarvapriya Sangwan

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NRC अगर पूरे देश में लागू हुई तो?

akb

पिछले काफ़ी वक्त से लोग नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर अपनी-अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं. अब तो बीजेपी सरकार ने फ़ैसला किया है कि वो सिटिजनशिप कानून यानी CAA के बारे में लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाने जा रही है. लोकसभा में अमित शाह के इस बयान के बाद कि सीएए की अगली कड़ी NRC होगा, यह बहस और तेज़ हो गई है.बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार के कई मंत्रियों ने सफ़ाई दी है कि एनआरसी के प्रावधान अभी तय नहीं हुए हैं और उसकी घोषणा अभी नहीं हुई है.

असम में चूंकि एक बार एनआरसी की प्रक्रिया चलाई जा चुकी है इसलिए यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर उसे पूरे देश में लागू किया गया तो क्या-कुछ होगा. मसलन, उसका ख़र्च कितना होगा. असम में हुए ख़र्च के आधार पर देशव्यापी एनआरसी के ख़र्च का मोटा अनुमान लगाया जा सकता है.

असम में प्रक्रिया को पूरा करने में 10 साल लगे, 50 हज़ार के क़रीब सरकारी नुमांइदे लगे और 1220 करोड़ खर्च आया. असम में पूरे देश की आबादी का लगभग दो प्रतिशत है, 3 करोड़ के आस-पास. तो उस हिसाब से वहां एक व्यक्ति पर 399 रूपए खर्च हुए. अगर भारत की आबादी जो 137 करोड़ है, उसे इस रकम से गुना करें तो खर्च होगा 54,663 करोड़ रुपए. ये सिर्फ एक अनुमान है.

भारत के ग्यारह से ज़्यादों राज्यों की सरकारों ने एनआरसी की प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार कर दिया है.

क्या केंद्र सरकार राज्यों की मर्ज़ी के बिना इसे देश भर में लागू कर सकती है?

NPR यानी National Population Register  की घोषणा हो चुकी है, गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि NPR से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल NRC में नहीं किया जाएगा, लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक इंटरव्यू में कहा कि NRC में नेशनल पॉपुलेशन का डेटा इस्तेमाल हो भी सकता है. यही वजह है कि अब NPR को लेकर भी लोगों के मन में आशंकाएं पैदा हो गई हैं.

तो बात करते हैं NPR की. NPR की प्रक्रिया में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की अहम भूमिका होगी अगर राज्य सरकारें सहयोग न करें तो इस प्रक्रिया को पूरा करना व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं होगा.

सवाल ये भी है कि क्या राज्य सरकारें NPR को लागू करने से मना कर सकती हैं?

नागरिकता का मामला केंद्र के दायरे में आता है और संसद से पारित नागरिकता से जुड़ा कोई कानून राज्य सरकारों को मानना पड़ेगा. राज्य सरकारें कोर्ट का सहारा ले सकती हैं लेकिन अगर कोर्ट ने भी केंद्र के हक़ में फैसला दिया तो उन्हें मानना पड़ेगा. लेकिन फिर भी राज्य सरकारों के सहयोग के बिना इतनी बड़ी प्रक्रिया संभव नहीं.

सवाल ये है कि क्या राज्य सरकारें NRC लागू करने से मना कर सकती हैं?

फिलहाल पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, ओडिशा, पंजाब, छत्तीसगढ़, केरल, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने NRC के खिलाफ स्टैंड लिया है.

लेकिन इनमें से कुछ ने नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA का समर्थन भी किया है ये कहकर कि इसका देश के नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं. अब ये लोग NPR में सहयोग करेंगे या नहीं करेंगे, पता नहीं. बात ये है कि इन CAA, NRC और NPR को कुछ राजनीतिक दल साथ जोड़ कर नहीं देख रहे, विरोध प्रदर्शन करने वाले इन्हें जोड़ कर देख रहे हैं. फिलहाल सबसे बड़ी ख़बर ये है कि असम में बीजेपी की सरकार है और असम के मुख्यमंत्री ने ये एलान किया है कि वो किसी भी ग़ैर-क़ानूनी प्रवासी को नागरिकता संशोधन कानून के ज़रिए असम में घुसने नहीं देंगे.

एक ख़ास बात ये है कि नागरिकता कानून 1955 में 2003 में संशोधन किया गया. वाजपेयी सरकार ने इसमें NRC का प्रावधान जोड़ा था. इस आधार पर कहा जा सकता है कि राज्य सरकारों के पास कोई और क़ानूनी आधार नहीं है इसे मना करने का क्योंकि ये नागरिकता कानून में है और नागरिकता केंद्र का विषय है.

तो ये जो NRC का प्रावधान लाया गया, इसे कैसे लागू किया जा सकता है? कुछ लोगों को लगता है कि ऐसा NPR के ज़रिए हो सकता है, सरकार ने इस मामले में कोई ठोस भरोसा नहीं दिलाया है.

NPR से NRC तक की प्रक्रिया कैसे पूरी होगी?

2003 के संशोधन के प्रावधानों के मुताबिक सरकार नागरिकता रजिस्टर बना सकती है और उसके ज़रिए देश में गैर कानूनी तरीके से रह रहे लोगों की पहचान भी कर सकती है.

मान लीजिए घर-घर जाकर NPR के लिए जानकारी इकट्ठा कर ली जाती हैं और अगर NRC होता है तो 2003 में आए प्रावधानों के मुताबिक इन डिटेल्स को स्थानीय रजिस्ट्रार वेरिफाई करेगा. जो उसमें 'Doubtful citizen' होगा उस पर रजिस्ट्रार अपना कमेंट लिख देगा जांच के लिए.

ऐसे doubtful citizens को इसकी जानकारी दी जाएगी. उन्हें भी कहने का मौका दिया जाएगा और सुनवाई होगी सिटिज़न रजिस्ट्रेशन के तालुक रजिस्ट्रार के पास. फिर इस प्रोसेस के होने के बाद फाइनल फैसला होगा. फैसला 90 दिन के अंदर होगा. लेकिन इसके बाद स्थानीय रजिस्टर से सभी नाम नेशनल रजिस्टर में ट्रांसफर होंगे. ड्राफ्ट NRC लिस्ट भी जारी की जाएगी और जो आपत्ति होगी उसकी सुनवाई होगी. कोई भी आपत्ति लिस्ट जारी होने के 30 दिन के अंदर करनी होगी. ज़िला रजिस्ट्रार सुनवाई करेगा और 30 दिन में फैसला देगा.

बस इतना ही है कि NRC की कोई तारीख नोटिफाई नहीं हुई है, उससे पहले NPR करने की तारीख तय हो चुकी है. जिस तरह से NRC पर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि इस पर कभी कोई चर्चा ही नहीं हुई लेकिन वहीं गृह मंत्री अमित शाह कई भाषणों में कह चुके कि NRC होगा, फिर बाकी मंत्रियों के अलग-अलग बयानों की वजह से ये निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि NRC नहीं बनेगा.

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NRC अगर पूरे देश में लागू हुई तो?

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पिछले काफ़ी वक्त से लोग नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर अपनी-अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं. अब तो बीजेपी सरकार ने फ़ैसला किया है कि वो सिटिजनशिप कानून यानी CAA के बारे में लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाने जा रही है. लोकसभा में अमित शाह के इस बयान के बाद कि सीएए की अगली कड़ी NRC होगा, यह बहस और तेज़ हो गई है.बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार के कई मंत्रियों ने सफ़ाई दी है कि एनआरसी के प्रावधान अभी तय नहीं हुए हैं और उसकी घोषणा अभी नहीं हुई है.

असम में चूंकि एक बार एनआरसी की प्रक्रिया चलाई जा चुकी है इसलिए यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर उसे पूरे देश में लागू किया गया तो क्या-कुछ होगा. मसलन, उसका ख़र्च कितना होगा. असम में हुए ख़र्च के आधार पर देशव्यापी एनआरसी के ख़र्च का मोटा अनुमान लगाया जा सकता है.

असम में प्रक्रिया को पूरा करने में 10 साल लगे, 50 हज़ार के क़रीब सरकारी नुमांइदे लगे और 1220 करोड़ खर्च आया. असम में पूरे देश की आबादी का लगभग दो प्रतिशत है, 3 करोड़ के आस-पास. तो उस हिसाब से वहां एक व्यक्ति पर 399 रूपए खर्च हुए. अगर भारत की आबादी जो 137 करोड़ है, उसे इस रकम से गुना करें तो खर्च होगा 54,663 करोड़ रुपए. ये सिर्फ एक अनुमान है.

भारत के ग्यारह से ज़्यादों राज्यों की सरकारों ने एनआरसी की प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार कर दिया है.

क्या केंद्र सरकार राज्यों की मर्ज़ी के बिना इसे देश भर में लागू कर सकती है?

NPR यानी National Population Register  की घोषणा हो चुकी है, गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि NPR से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल NRC में नहीं किया जाएगा, लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक इंटरव्यू में कहा कि NRC में नेशनल पॉपुलेशन का डेटा इस्तेमाल हो भी सकता है. यही वजह है कि अब NPR को लेकर भी लोगों के मन में आशंकाएं पैदा हो गई हैं.

तो बात करते हैं NPR की. NPR की प्रक्रिया में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की अहम भूमिका होगी अगर राज्य सरकारें सहयोग न करें तो इस प्रक्रिया को पूरा करना व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं होगा.

सवाल ये भी है कि क्या राज्य सरकारें NPR को लागू करने से मना कर सकती हैं?

नागरिकता का मामला केंद्र के दायरे में आता है और संसद से पारित नागरिकता से जुड़ा कोई कानून राज्य सरकारों को मानना पड़ेगा. राज्य सरकारें कोर्ट का सहारा ले सकती हैं लेकिन अगर कोर्ट ने भी केंद्र के हक़ में फैसला दिया तो उन्हें मानना पड़ेगा. लेकिन फिर भी राज्य सरकारों के सहयोग के बिना इतनी बड़ी प्रक्रिया संभव नहीं.

सवाल ये है कि क्या राज्य सरकारें NRC लागू करने से मना कर सकती हैं?

फिलहाल पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, ओडिशा, पंजाब, छत्तीसगढ़, केरल, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने NRC के खिलाफ स्टैंड लिया है.

लेकिन इनमें से कुछ ने नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA का समर्थन भी किया है ये कहकर कि इसका देश के नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं. अब ये लोग NPR में सहयोग करेंगे या नहीं करेंगे, पता नहीं. बात ये है कि इन CAA, NRC और NPR को कुछ राजनीतिक दल साथ जोड़ कर नहीं देख रहे, विरोध प्रदर्शन करने वाले इन्हें जोड़ कर देख रहे हैं. फिलहाल सबसे बड़ी ख़बर ये है कि असम में बीजेपी की सरकार है और असम के मुख्यमंत्री ने ये एलान किया है कि वो किसी भी ग़ैर-क़ानूनी प्रवासी को नागरिकता संशोधन कानून के ज़रिए असम में घुसने नहीं देंगे.

एक ख़ास बात ये है कि नागरिकता कानून 1955 में 2003 में संशोधन किया गया. वाजपेयी सरकार ने इसमें NRC का प्रावधान जोड़ा था. इस आधार पर कहा जा सकता है कि राज्य सरकारों के पास कोई और क़ानूनी आधार नहीं है इसे मना करने का क्योंकि ये नागरिकता कानून में है और नागरिकता केंद्र का विषय है.

तो ये जो NRC का प्रावधान लाया गया, इसे कैसे लागू किया जा सकता है? कुछ लोगों को लगता है कि ऐसा NPR के ज़रिए हो सकता है, सरकार ने इस मामले में कोई ठोस भरोसा नहीं दिलाया है.

NPR से NRC तक की प्रक्रिया कैसे पूरी होगी?

2003 के संशोधन के प्रावधानों के मुताबिक सरकार नागरिकता रजिस्टर बना सकती है और उसके ज़रिए देश में गैर कानूनी तरीके से रह रहे लोगों की पहचान भी कर सकती है.

मान लीजिए घर-घर जाकर NPR के लिए जानकारी इकट्ठा कर ली जाती हैं और अगर NRC होता है तो 2003 में आए प्रावधानों के मुताबिक इन डिटेल्स को स्थानीय रजिस्ट्रार वेरिफाई करेगा. जो उसमें 'Doubtful citizen' होगा उस पर रजिस्ट्रार अपना कमेंट लिख देगा जांच के लिए.

ऐसे doubtful citizens को इसकी जानकारी दी जाएगी. उन्हें भी कहने का मौका दिया जाएगा और सुनवाई होगी सिटिज़न रजिस्ट्रेशन के तालुक रजिस्ट्रार के पास. फिर इस प्रोसेस के होने के बाद फाइनल फैसला होगा. फैसला 90 दिन के अंदर होगा. लेकिन इसके बाद स्थानीय रजिस्टर से सभी नाम नेशनल रजिस्टर में ट्रांसफर होंगे. ड्राफ्ट NRC लिस्ट भी जारी की जाएगी और जो आपत्ति होगी उसकी सुनवाई होगी. कोई भी आपत्ति लिस्ट जारी होने के 30 दिन के अंदर करनी होगी. ज़िला रजिस्ट्रार सुनवाई करेगा और 30 दिन में फैसला देगा.

बस इतना ही है कि NRC की कोई तारीख नोटिफाई नहीं हुई है, उससे पहले NPR करने की तारीख तय हो चुकी है. जिस तरह से NRC पर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि इस पर कभी कोई चर्चा ही नहीं हुई लेकिन वहीं गृह मंत्री अमित शाह कई भाषणों में कह चुके कि NRC होगा, फिर बाकी मंत्रियों के अलग-अलग बयानों की वजह से ये निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि NRC नहीं बनेगा.

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NRC अगर पूरे देश में लागू हुई तो?

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पिछले काफ़ी वक्त से लोग नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर अपनी-अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं. अब तो बीजेपी सरकार ने फ़ैसला किया है कि वो सिटिजनशिप कानून यानी CAA के बारे में लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाने जा रही है. लोकसभा में अमित शाह के इस बयान के बाद कि सीएए की अगली कड़ी NRC होगा, यह बहस और तेज़ हो गई है.बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार के कई मंत्रियों ने सफ़ाई दी है कि एनआरसी के प्रावधान अभी तय नहीं हुए हैं और उसकी घोषणा अभी नहीं हुई है.

असम में चूंकि एक बार एनआरसी की प्रक्रिया चलाई जा चुकी है इसलिए यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर उसे पूरे देश में लागू किया गया तो क्या-कुछ होगा. मसलन, उसका ख़र्च कितना होगा. असम में हुए ख़र्च के आधार पर देशव्यापी एनआरसी के ख़र्च का मोटा अनुमान लगाया जा सकता है.

असम में प्रक्रिया को पूरा करने में 10 साल लगे, 50 हज़ार के क़रीब सरकारी नुमांइदे लगे और 1220 करोड़ खर्च आया. असम में पूरे देश की आबादी का लगभग दो प्रतिशत है, 3 करोड़ के आस-पास. तो उस हिसाब से वहां एक व्यक्ति पर 399 रूपए खर्च हुए. अगर भारत की आबादी जो 137 करोड़ है, उसे इस रकम से गुना करें तो खर्च होगा 54,663 करोड़ रुपए. ये सिर्फ एक अनुमान है.

भारत के ग्यारह से ज़्यादों राज्यों की सरकारों ने एनआरसी की प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार कर दिया है.

क्या केंद्र सरकार राज्यों की मर्ज़ी के बिना इसे देश भर में लागू कर सकती है?

NPR यानी National Population Register  की घोषणा हो चुकी है, गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि NPR से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल NRC में नहीं किया जाएगा, लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक इंटरव्यू में कहा कि NRC में नेशनल पॉपुलेशन का डेटा इस्तेमाल हो भी सकता है. यही वजह है कि अब NPR को लेकर भी लोगों के मन में आशंकाएं पैदा हो गई हैं.

तो बात करते हैं NPR की. NPR की प्रक्रिया में स्थानीय प्रशासन और पुलिस की अहम भूमिका होगी अगर राज्य सरकारें सहयोग न करें तो इस प्रक्रिया को पूरा करना व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं होगा.

सवाल ये भी है कि क्या राज्य सरकारें NPR को लागू करने से मना कर सकती हैं?

नागरिकता का मामला केंद्र के दायरे में आता है और संसद से पारित नागरिकता से जुड़ा कोई कानून राज्य सरकारों को मानना पड़ेगा. राज्य सरकारें कोर्ट का सहारा ले सकती हैं लेकिन अगर कोर्ट ने भी केंद्र के हक़ में फैसला दिया तो उन्हें मानना पड़ेगा. लेकिन फिर भी राज्य सरकारों के सहयोग के बिना इतनी बड़ी प्रक्रिया संभव नहीं.

सवाल ये है कि क्या राज्य सरकारें NRC लागू करने से मना कर सकती हैं?

फिलहाल पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, ओडिशा, पंजाब, छत्तीसगढ़, केरल, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने NRC के खिलाफ स्टैंड लिया है.

लेकिन इनमें से कुछ ने नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA का समर्थन भी किया है ये कहकर कि इसका देश के नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं. अब ये लोग NPR में सहयोग करेंगे या नहीं करेंगे, पता नहीं. बात ये है कि इन CAA, NRC और NPR को कुछ राजनीतिक दल साथ जोड़ कर नहीं देख रहे, विरोध प्रदर्शन करने वाले इन्हें जोड़ कर देख रहे हैं. फिलहाल सबसे बड़ी ख़बर ये है कि असम में बीजेपी की सरकार है और असम के मुख्यमंत्री ने ये एलान किया है कि वो किसी भी ग़ैर-क़ानूनी प्रवासी को नागरिकता संशोधन कानून के ज़रिए असम में घुसने नहीं देंगे.

एक ख़ास बात ये है कि नागरिकता कानून 1955 में 2003 में संशोधन किया गया. वाजपेयी सरकार ने इसमें NRC का प्रावधान जोड़ा था. इस आधार पर कहा जा सकता है कि राज्य सरकारों के पास कोई और क़ानूनी आधार नहीं है इसे मना करने का क्योंकि ये नागरिकता कानून में है और नागरिकता केंद्र का विषय है.

तो ये जो NRC का प्रावधान लाया गया, इसे कैसे लागू किया जा सकता है? कुछ लोगों को लगता है कि ऐसा NPR के ज़रिए हो सकता है, सरकार ने इस मामले में कोई ठोस भरोसा नहीं दिलाया है.

NPR से NRC तक की प्रक्रिया कैसे पूरी होगी?

2003 के संशोधन के प्रावधानों के मुताबिक सरकार नागरिकता रजिस्टर बना सकती है और उसके ज़रिए देश में गैर कानूनी तरीके से रह रहे लोगों की पहचान भी कर सकती है.

मान लीजिए घर-घर जाकर NPR के लिए जानकारी इकट्ठा कर ली जाती हैं और अगर NRC होता है तो 2003 में आए प्रावधानों के मुताबिक इन डिटेल्स को स्थानीय रजिस्ट्रार वेरिफाई करेगा. जो उसमें 'Doubtful citizen' होगा उस पर रजिस्ट्रार अपना कमेंट लिख देगा जांच के लिए.

ऐसे doubtful citizens को इसकी जानकारी दी जाएगी. उन्हें भी कहने का मौका दिया जाएगा और सुनवाई होगी सिटिज़न रजिस्ट्रेशन के तालुक रजिस्ट्रार के पास. फिर इस प्रोसेस के होने के बाद फाइनल फैसला होगा. फैसला 90 दिन के अंदर होगा. लेकिन इसके बाद स्थानीय रजिस्टर से सभी नाम नेशनल रजिस्टर में ट्रांसफर होंगे. ड्राफ्ट NRC लिस्ट भी जारी की जाएगी और जो आपत्ति होगी उसकी सुनवाई होगी. कोई भी आपत्ति लिस्ट जारी होने के 30 दिन के अंदर करनी होगी. ज़िला रजिस्ट्रार सुनवाई करेगा और 30 दिन में फैसला देगा.

बस इतना ही है कि NRC की कोई तारीख नोटिफाई नहीं हुई है, उससे पहले NPR करने की तारीख तय हो चुकी है. जिस तरह से NRC पर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि इस पर कभी कोई चर्चा ही नहीं हुई लेकिन वहीं गृह मंत्री अमित शाह कई भाषणों में कह चुके कि NRC होगा, फिर बाकी मंत्रियों के अलग-अलग बयानों की वजह से ये निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि NRC नहीं बनेगा.

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कोटा में बच्चों की मौत का ज़िम्मेदार कौन?

akb

राजस्थान के कोटा के एक अस्पताल में 100 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है. कांग्रेस की राज्य सरकार ने जांच के लिए एक पैनल गठित किया था. उस पैनल ने बताया कि अस्पताल में बेड की कमी है, आईसीयू में भी बेड कम हैं. बहुत सा सामान इस्तेमाल ही नहीं किया गया क्योंकि सालाना मेंटेनेंस कांट्रेक्ट नहीं था. अस्पताल में सुअर घूम रहे थे. कई जगह दरवाज़े और खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं और एक साल में 940 नवजात बच्चे मर चुके हैं.

जब ऐसी ख़बरें आती हैं तो सोशल मीडिया पर अलग-अलग पार्टियों के समर्थक सक्रिय हो जाते हैं. वे अपनी पार्टी की सरकार को बेहतर बताते हैं और दूसरी पार्टी की सरकार की जवाबदेही मांगते हैं. लेकिन सच्चाई सोशल मीडिया से कोसों दूर है. 2017 में कैग ने नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (NRHM) योजना की ऑडिट रिपोर्ट संसद में रखी. ये केंद्र और राज्य में इस योजना की 2011 से लेकर 2016 तक की ऑडिट रिपोर्ट थी.

गांव के लोगों के स्वास्थ्य के लिए 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की शुरुआत हुई थी ताकि पैदा होने के वक्त बच्चे और मां की होने वाली मौत को रोका जा सके. सीएजी ने 2011 से मार्च 2016 तक का हिसाब किताब किया है. इस योजना की भी पोल खुलती नज़र आ रही है. 27 राज्यों ने इस मद का पैसा खर्च ही नहीं किया. 2011-12 में यह रकम 7,375 करोड़ थी जो 2015-16 में बढ़कर 9509 करोड़ हो गई. यानी ये पैसा खर्च ही नहीं किया गया. क्यों?

सैकड़ों ऐसे स्वास्थ्य केंद्र हैं जो गंदे हालात में काम कर रहे हैं. 20 राज्यों में 1285 प्रोजेक्ट काग़ज़ों में पूरे हो चुके हैं मगर असलियत में शुरू भी नहीं हुए हैं.

17 राज्य हैं जहां 30 करोड़ की अल्ट्रासाउंड, एक्स रे, इसीजी जैसी मशीनें पड़ी हुई हैं. वहां मेडिकल स्टाफ नहीं है, रखने की जगह तक नहीं है.

क्या आपको लगता नहीं कि जनता के साथ मज़ाक हो रहा है. 27 राज्यों के लगभग हर स्वास्थ्य केंद्र में 77 से 87 फीसदी डॉक्टरों की कमी है. 13 राज्यों में तो 67 स्वास्थ्य केंद्र मिले जहां पर कोई डॉक्टर ही नहीं था. एनिमिया शरीर में आयरन की कमी की बीमारी है और महिलाओं और बच्चों में एनिमिया के मामले में भारत दुनिया में टॉप पर है. प्रसव के दौरान मरने वाली पचास फीसदी माएं एनिमिया के कारण मरती हैं. इसके बाद भी सीएजी ने सभी राज्यों के प्राथमिक केंद्रों में पाया कि आयरन टैबलेट दी ही नहीं जा रही हैं. अरुणाचल, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मेघालय में 50 फीसदी गर्भवती महिलाओं को टेटनस का टीका भी नहीं लग सका.

सीएजी ने गुजरात में 3 जनरल अस्पतालों की जांच की. नडियाड जनरल अस्पताल में आप्रेशन थियेटर तो है लेकिन ऑपरेशन के पहले और बाद मरीज़ को रखने के लिए कमरे नहीं हैं. अगर आप सीधे मरीज़ को ऑपरेशन थियेटर में ले जाएं, वहां से सीधे वार्ड में तो उसे इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. इसी अस्पताल में जगह की कमी के कारण लैब का काम भी मरीज़ों के वेटिंग एरिया में ही चल रहा था. गोधरा के जनरल अस्पताल में 440 बिस्तर की ज़रूरत है लेकिन 210 ही होने के कारण मरीज़ ज़मीन पर मिले. भूलिएगा मत कि ये एक मॉडल स्टेट है.

केरल की 1100 से अधिक स्वास्थ्य केंद्रों में सिर्फ 23 में डिलीवरी की सुविधा है.

ऑडिट में पता चला कि 15 राज्यों के सालाना अकाउंट में भी काफी गड़बड़ियां हैं. रसीदों में, खर्चों में कम-ज़्यादा दिखाया गया है, हिसाब भी ठीक से नहीं रखा गया है. अपने निष्कर्ष में कैग ने लिखा है कि केंद्र और राज्यों दोनों ने पैसे को खर्च करने के मामले में संतोषजनक काम नहीं किया है.

तो ये हाल है हमारे देश की स्वास्थ्य सुविधाओं का. लेकिन लोग इन पर बात नहीं करते हैं और फिर भुगतने की नौबत आती है तो गरीब आदमी रोते हैं और मिडिल क्लास लोग डॉक्टरों को पीटते हैं. फिर जाकर वोट हिंदू राष्ट्र, जाति और पाकिस्तान के नाम पर दे आते हैं.

हम एक बेवकूफों से भरा देश हैं जो खुद को ना जाने किस वजह से विश्वगुरु साबित करने के सपने देख रहा है. क्या आप वो कंधे पर पत्नी की लाश ढोने वाली तस्वीर भूल गए हैं? क्या वो तस्वीरें जहां अस्पताल का सफाई कर्मचारी एक छोटे बच्चे को इंजेक्शन लगा रहा था? या आप अपने राजनीतिक रुझानों की वजह से उत्तर प्रदेश का NRHM घोटाला भूल जाना चाहते हैं जो मायावती की नाक के नीचे हुआ, जेल में चीफ मेडिकल अफसर तक मार डाले गए या व्यापम घोटाला जो शिवराज सिंह चौहान के रामराज्य में 50 लोगों को लील चुका है. बुरा मत मानियेगा लेकिन बिहार और राजस्थान में डिग्रीयां बंट रही हैं. बुरा मानने की बजाय अपने राज्यों में स्वास्थ्य और शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाइये बजाय अपनी आइडेंटिटी के. वरना आप किसी सत्ता लोभी राजनेता की तरह धूर्त ही नज़र आते हैं.

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कोटा में बच्चों की मौत का ज़िम्मेदार कौन?

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राजस्थान के कोटा के एक अस्पताल में 100 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है. कांग्रेस की राज्य सरकार ने जांच के लिए एक पैनल गठित किया था. उस पैनल ने बताया कि अस्पताल में बेड की कमी है, आईसीयू में भी बेड कम हैं. बहुत सा सामान इस्तेमाल ही नहीं किया गया क्योंकि सालाना मेंटेनेंस कांट्रेक्ट नहीं था. अस्पताल में सुअर घूम रहे थे. कई जगह दरवाज़े और खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं और एक साल में 940 नवजात बच्चे मर चुके हैं.

जब ऐसी ख़बरें आती हैं तो सोशल मीडिया पर अलग-अलग पार्टियों के समर्थक सक्रिय हो जाते हैं. वे अपनी पार्टी की सरकार को बेहतर बताते हैं और दूसरी पार्टी की सरकार की जवाबदेही मांगते हैं. लेकिन सच्चाई सोशल मीडिया से कोसों दूर है. 2017 में कैग ने नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (NRHM) योजना की ऑडिट रिपोर्ट संसद में रखी. ये केंद्र और राज्य में इस योजना की 2011 से लेकर 2016 तक की ऑडिट रिपोर्ट थी.

गांव के लोगों के स्वास्थ्य के लिए 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की शुरुआत हुई थी ताकि पैदा होने के वक्त बच्चे और मां की होने वाली मौत को रोका जा सके. सीएजी ने 2011 से मार्च 2016 तक का हिसाब किताब किया है. इस योजना की भी पोल खुलती नज़र आ रही है. 27 राज्यों ने इस मद का पैसा खर्च ही नहीं किया. 2011-12 में यह रकम 7,375 करोड़ थी जो 2015-16 में बढ़कर 9509 करोड़ हो गई. यानि ये पैसा खर्च ही नहीं किया गया. क्यों?

सैकड़ों ऐसे स्वास्थ्य केंद्र हैं जो गंदे हालात में काम कर रहे हैं. 20 राज्यों में 1285 प्रोजेक्ट काग़ज़ों में पूरे हो चुके हैं मगर असलियत में शुरू भी नहीं हुए हैं.

17 राज्य हैं जहां 30 करोड़ की अल्ट्रासाउंड, एक्स रे, इसीजी जैसी मशीनें पड़ी हुई हैं. वहां मेडिकल स्टाफ नहीं है, रखने की जगह तक नहीं है.

क्या आपको लगता नहीं कि जनता के साथ मज़ाक हो रहा है. 27 राज्यों के लगभग हर स्वास्थ्य केंद्र में 77 से 87 फीसदी डॉक्टरों की कमी है. 13 राज्यों में तो 67 स्वास्थ्य केंद्र मिले जहां पर कोई डॉक्टर ही नहीं था. एनिमिया शरीर में आयरन की कमी की बीमारी है और महिलाओं और बच्चों में एनिमिया के मामले में भारत दुनिया में टॉप पर है. प्रसव के दौरान मरने वाली पचास फीसदी माएं एनिमिया के कारण मरती हैं. इसके बाद भी सीएजी ने सभी राज्यों के प्राथमिक केंद्रों में पाया कि आयरन टैबलेट दी ही नहीं जा रही हैं. अरुणाचल, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मेघालय में 50 फीसदी गर्भवती महिलाओं को टेटनस का टीका भी नहीं लग सका.

सीएजी ने गुजरात में 3 जनरल अस्पतालों की जांच की. नडियाड जनरल अस्पताल में आप्रेशन थियेटर तो है लेकिन ऑपरेशन के पहले और बाद मरीज़ को रखने के लिए कमरे नहीं हैं. अगर आप सीधे मरीज़ को ऑपरेशन थियेटर में ले जाएं, वहां से सीधे वार्ड में तो उसे इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. इसी अस्पताल में जगह की कमी के कारण लैब का काम भी मरीज़ों के वेटिंग एरिया में ही चल रहा था. गोधरा के जनरल अस्पताल में 440 बिस्तर की ज़रूरत है लेकिन 210 ही होने के कारण मरीज़ ज़मीन पर मिले. भूलिएगा मत कि ये एक मॉडल स्टेट है.

केरल की 1100 से अधिक स्वास्थ्य केंद्रों में सिर्फ 23 में डिलीवरी की सुविधा है.

ऑडिट में पता चला कि 15 राज्यों के सालाना अकाउंट में भी काफी गड़बड़ियां हैं. रसीदों में, खर्चों में कम-ज़्यादा दिखाया गया है, हिसाब भी ठीक से नहीं रखा गया है. अपने निष्कर्ष में कैग ने लिखा है कि केंद्र और राज्यों दोनों ने पैसे को खर्च करने के मामले में संतोषजनक काम नहीं किया है.

तो ये हाल है हमारे देश की स्वास्थ्य सुविधाओं का. लेकिन लोग इन पर बात नहीं करते हैं और फिर भुगतने की नौबत आती है तो गरीब आदमी रोते हैं और मिडिल क्लास लोग डॉक्टरों को पीटते हैं. फिर जाकर वोट हिंदू राष्ट्र, जाति और पाकिस्तान के नाम पर दे आते हैं.

हम एक बेवकूफों से भरा देश हैं जो खुद को ना जाने किस वजह से विश्वगुरु साबित करने के सपने देख रहा है. क्या आप वो कंधे पर पत्नी की लाश ढोने वाली तस्वीर भूल गए हैं? क्या वो तस्वीरें जहां अस्पताल का सफाई कर्मचारी एक छोटे बच्चे को इंजेक्शन लगा रहा था? या आप अपने राजनीतिक रुझानों की वजह से उत्तर प्रदेश का NRHM घोटाला भूल जाना चाहते हैं जो मायावती की नाक के नीचे हुआ, जेल में चीफ मेडिकल अफसर तक मार डाले गए या व्यापम घोटाला जो शिवराज सिंह चौहान के रामराज्य में 50 लोगों को लील चुका है. बुरा मत मानियेगा लेकिन बिहार और राजस्थान में डिग्रीयां बंट रही हैं. बुरा मानने की बजाय अपने राज्यों में स्वास्थ्य और शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाइये बजाय अपनी आइडेंटिटी के. वरना आप किसी सत्ता लोभी राजनेता की तरह धूर्त ही नज़र आते हैं.

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कोटा में बच्चों की मौत के ज़िम्मेदार कौन हैं?

akb

राजस्थान के कोटा के एक अस्पताल में 100 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है. कांग्रेस की राज्य सरकार ने जांच के लिए एक पैनल गठित किया था. उस पैनल ने बताया कि अस्पताल में बेड की कमी है, आईसीयू में भी बेड कम हैं. बहुत सा सामान इस्तेमाल ही नहीं किया गया क्योंकि सालाना मेंटेनेंस कांट्रेक्ट नहीं था. अस्पताल में सुअर घूम रहे थे. कई जगह दरवाज़े और खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं और एक साल में 940 नवजात बच्चे मर चुके हैं.

जब ऐसी ख़बरें आती हैं तो सोशल मीडिया पर अलग-अलग पार्टियों के समर्थक सक्रिय हो जाते हैं. वे अपनी पार्टी की सरकार को बेहतर बताते हैं और दूसरी पार्टी की सरकार की जवाबदेही मांगते हैं. लेकिन सच्चाई सोशल मीडिया से कोसों दूर है. 2017 में कैग ने नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (NRHM) योजना की ऑडिट रिपोर्ट संसद में रखी. ये केंद्र और राज्य में इस योजना की 2011 से लेकर 2016 तक की ऑडिट रिपोर्ट थी.

गांव के लोगों के स्वास्थ्य के लिए 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की शुरुआत हुई थी ताकि पैदा होने के वक्त बच्चे और मां की होने वाली मौत को रोका जा सके. सीएजी ने 2011 से मार्च 2016 तक का हिसाब किताब किया है. इस योजना की भी पोल खुलती नज़र आ रही है. 27 राज्यों ने इस मद का पैसा खर्च ही नहीं किया. 2011-12 में यह रकम 7,375 करोड़ थी जो 2015-16 में बढ़कर 9509 करोड़ हो गई. यानि ये पैसा खर्च ही नहीं किया गया। क्यों?

सैकड़ों ऐसे स्वास्थ्य केंद्र हैं जो गंदे हालात में काम कर रहे हैं. 20 राज्यों में 1285 प्रोजेक्ट काग़ज़ों में पूरे हो चुके हैं मगर असलियत में शुरू भी नहीं हुए हैं.

17 राज्य हैं जहां 30 करोड़ की अल्ट्रासाउंड, एक्स रे, इसीजी जैसी मशीनें पड़ी हुई हैं. वहां मेडिकल स्टाफ नहीं है, रखने की जगह तक नहीं है.

क्या आपको लगता नहीं कि जनता के साथ मज़ाक हो रहा है. 27 राज्यों के लगभग हर स्वास्थ्य केंद्र में 77 से 87 फीसदी डॉक्टरों की कमी है. 13 राज्यों में तो 67 स्वास्थ्य केंद्र मिले जहां पर कोई डॉक्टर ही नहीं था. एनिमिया शरीर में आयरन की कमी की बीमारी है और महिलाओं और बच्चों में एनिमिया के मामले में भारत दुनिया में टॉप पर है. प्रसव के दौरान मरने वाली पचास फीसदी माएं एनिमिया के कारण मरती हैं. इसके बाद भी सीएजी ने सभी राज्यों के प्राथमिक केंद्रों में पाया कि आयरन टैबलेट दी ही नहीं जा रही हैं. अरुणाचल, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मेघालय में 50 फीसदी गर्भवती महिलाओं को टेटनस का टीका भी नहीं लग सका.

सीएजी ने गुजरात में 3 जनरल अस्पतालों की जांच की. नडियाड जनरल अस्पताल में आप्रेशन थियेटर तो है लेकिन ऑपरेशन के पहले और बाद मरीज़ को रखने के लिए कमरे नहीं हैं. अगर आप सीधे मरीज़ को ऑपरेशन थियेटर में ले जाएं, वहां से सीधे वार्ड में तो उसे इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. इसी अस्पताल में जगह की कमी के कारण लैब का काम भी मरीज़ों के वेटिंग एरिया में ही चल रहा था. गोधरा के जनरल अस्पताल में 440 बिस्तर की ज़रूरत है लेकिन 210 ही होने के कारण मरीज़ ज़मीन पर मिले। भूलिएगा मत कि ये एक मॉडल स्टेट है।

केरल की 1100 से अधिक स्वास्थ्य केंद्रों में सिर्फ 23 में डिलीवरी की सुविधा है।

ऑडिट में पता चला कि 15 राज्यों के सालाना अकाउंट में भी काफी गड़बड़ियां हैं। रसीदों में, खर्चों में कम-ज़्यादा दिखाया गया है, हिसाब भी ठीक से नहीं रखा गया है। अपने निष्कर्ष में कैग ने लिखा है कि केंद्र और राज्यों दोनों ने पैसे को खर्च करने के मामले में संतोषजनक काम नहीं किया है।

तो ये हाल है हमारे देश की स्वास्थ्य सुविधाओं का. लेकिन लोग इन पर बात नहीं करते हैं और फिर भुगतने की नौबत आती है तो गरीब आदमी रोते हैं और मिडिल क्लास लोग डॉक्टरों को पीटते हैं. फिर जाकर वोट हिंदू राष्ट्र, जाति और पाकिस्तान के नाम पर दे आते हैं.

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कोटा में बच्चों की मौत का ज़िम्मेदार कौन?

akb

राजस्थान के कोटा के एक अस्पताल में 100 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है. कांग्रेस की राज्य सरकार ने जांच के लिए एक पैनल गठित किया था. उस पैनल ने बताया कि अस्पताल में बेड की कमी है, आईसीयू में भी बेड कम हैं. बहुत सा सामान इस्तेमाल ही नहीं किया गया क्योंकि सालाना मेंटेनेंस कांट्रेक्ट नहीं था. अस्पताल में सुअर घूम रहे थे. कई जगह दरवाज़े और खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं और एक साल में 940 नवजात बच्चे मर चुके हैं.

जब ऐसी ख़बरें आती हैं तो सोशल मीडिया पर अलग-अलग पार्टियों के समर्थक सक्रिय हो जाते हैं. वे अपनी पार्टी की सरकार को बेहतर बताते हैं और दूसरी पार्टी की सरकार की जवाबदेही मांगते हैं. लेकिन सच्चाई सोशल मीडिया से कोसों दूर है. 2017 में कैग ने नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (NRHM) योजना की ऑडिट रिपोर्ट संसद में रखी. ये केंद्र और राज्य में इस योजना की 2011 से लेकर 2016 तक की ऑडिट रिपोर्ट थी.

गांव के लोगों के स्वास्थ्य के लिए 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की शुरुआत हुई थी ताकि पैदा होने के वक्त बच्चे और मां की होने वाली मौत को रोका जा सके. सीएजी ने 2011 से मार्च 2016 तक का हिसाब किताब किया है. इस योजना की भी पोल खुलती नज़र आ रही है. 27 राज्यों ने इस मद का पैसा खर्च ही नहीं किया. 2011-12 में यह रकम 7,375 करोड़ थी जो 2015-16 में बढ़कर 9509 करोड़ हो गई. यानी ये पैसा खर्च ही नहीं किया गया. क्यों?

सैकड़ों ऐसे स्वास्थ्य केंद्र हैं जो गंदे हालात में काम कर रहे हैं. 20 राज्यों में 1285 प्रोजेक्ट काग़ज़ों में पूरे हो चुके हैं मगर असलियत में शुरू भी नहीं हुए हैं.

17 राज्य हैं जहां 30 करोड़ की अल्ट्रासाउंड, एक्स रे, इसीजी जैसी मशीनें पड़ी हुई हैं. वहां मेडिकल स्टाफ नहीं है, रखने की जगह तक नहीं है.

क्या आपको लगता नहीं कि जनता के साथ मज़ाक हो रहा है. 27 राज्यों के लगभग हर स्वास्थ्य केंद्र में 77 से 87 फीसदी डॉक्टरों की कमी है. 13 राज्यों में तो 67 स्वास्थ्य केंद्र मिले जहां पर कोई डॉक्टर ही नहीं था. एनिमिया शरीर में आयरन की कमी की बीमारी है और महिलाओं और बच्चों में एनिमिया के मामले में भारत दुनिया में टॉप पर है. प्रसव के दौरान मरने वाली पचास फीसदी माएं एनिमिया के कारण मरती हैं. इसके बाद भी सीएजी ने सभी राज्यों के प्राथमिक केंद्रों में पाया कि आयरन टैबलेट दी ही नहीं जा रही हैं. अरुणाचल, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मेघालय में 50 फीसदी गर्भवती महिलाओं को टेटनस का टीका भी नहीं लग सका.

सीएजी ने गुजरात में 3 जनरल अस्पतालों की जांच की. नडियाड जनरल अस्पताल में आप्रेशन थियेटर तो है लेकिन ऑपरेशन के पहले और बाद मरीज़ को रखने के लिए कमरे नहीं हैं. अगर आप सीधे मरीज़ को ऑपरेशन थियेटर में ले जाएं, वहां से सीधे वार्ड में तो उसे इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. इसी अस्पताल में जगह की कमी के कारण लैब का काम भी मरीज़ों के वेटिंग एरिया में ही चल रहा था. गोधरा के जनरल अस्पताल में 440 बिस्तर की ज़रूरत है लेकिन 210 ही होने के कारण मरीज़ ज़मीन पर मिले. भूलिएगा मत कि ये एक मॉडल स्टेट है.

केरल की 1100 से अधिक स्वास्थ्य केंद्रों में सिर्फ 23 में डिलीवरी की सुविधा है.

ऑडिट में पता चला कि 15 राज्यों के सालाना अकाउंट में भी काफी गड़बड़ियां हैं. रसीदों में, खर्चों में कम-ज़्यादा दिखाया गया है, हिसाब भी ठीक से नहीं रखा गया है. अपने निष्कर्ष में कैग ने लिखा है कि केंद्र और राज्यों दोनों ने पैसे को खर्च करने के मामले में संतोषजनक काम नहीं किया है.

तो ये हाल है हमारे देश की स्वास्थ्य सुविधाओं का. लेकिन लोग इन पर बात नहीं करते हैं और फिर भुगतने की नौबत आती है तो गरीब आदमी रोते हैं और मिडिल क्लास लोग डॉक्टरों को पीटते हैं. फिर जाकर वोट हिंदू राष्ट्र, जाति और पाकिस्तान के नाम पर दे आते हैं.

हम एक बेवकूफों से भरा देश हैं जो खुद को ना जाने किस वजह से विश्वगुरु साबित करने के सपने देख रहा है. क्या आप वो कंधे पर पत्नी की लाश ढोने वाली तस्वीर भूल गए हैं? क्या वो तस्वीरें जहां अस्पताल का सफाई कर्मचारी एक छोटे बच्चे को इंजेक्शन लगा रहा था? या आप अपने राजनीतिक रुझानों की वजह से उत्तर प्रदेश का NRHM घोटाला भूल जाना चाहते हैं जो मायावती की नाक के नीचे हुआ, जेल में चीफ मेडिकल अफसर तक मार डाले गए या व्यापम घोटाला जो शिवराज सिंह चौहान के रामराज्य में 50 लोगों को लील चुका है. बुरा मत मानियेगा लेकिन बिहार और राजस्थान में डिग्रीयां बंट रही हैं. बुरा मानने की बजाय अपने राज्यों में स्वास्थ्य और शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाइये बजाय अपनी आइडेंटिटी के. वरना आप किसी सत्ता लोभी राजनेता की तरह धूर्त ही नज़र आते हैं.

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