Sarvapriya Sangwan

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इस खेल का मज़ा बच निकलने में नहीं, डूब जाने में है

akb   किसी कुशल शासक की एक निशानी होती है - चाहे बहुमत उसकी तरफ हो लेकिन वो उस बहुमत के सामने विपक्ष का भ्रम बना कर रखता है। वो कभी अपने विपक्ष को ख़त्म नहीं करता, सिर्फ कमज़ोर करता है। जज़्बाती मुद्दों के सहारे टिका रहता है। वैसे भी, अभी सब ख़त्म नहीं हुआ। हमारे इतिहास ने मुझे बताया है कि अभी भविष्य में बहुत कुछ देखना बाकी है। पत्रकारिता के शुरूआती सबक थे - ऑब्जेक्टिविटी और सब्जेक्टिविटी। जिसे आप हिंदी में निष्पक्षता और व्यक्तिपरक कह सकते हैं। मैं चाहूंगी कि मामला सब्जेक्टिव होते हुए भी ऑब्जेक्टिविटी ना भूलूँ। जब किसी मामले की पूरी जानकारी ना हो और किसी व्यक्ति को करीब से ना जानते हो तो गारंटी लेने से बचना चाहिए। 2011 से मुझे सुनने में आता रहा है कि इस संस्थान पर ये केस है, वो नोटिस है। लेकिन कुछ मुद्दों की तकनीकी भाषा की वजह से आप समझने में नाकाम रहते हैं। तो उसे छोड़ देते हैं। सब केस कोर्ट में चल रहे हैं जो अलग-अलग सरकारों के वक़्त दर्ज किये गए, चाहे वो कांग्रेस हो या बीजेपी हो और NDTV के अनुसार संस्थान ने आज तक किसी भी सुनवाई को टाला नहीं, जबकि शिकायतकर्ता हर तारीख को आगे बढ़ाता रहा है। आज तक शिकायतकर्ता किसी भी केस में कोर्ट से कोई आदेश नहीं ला पाया (http://www.ndtv.com/…/statement-of-facts-on-fake-income-tax…) लेकिन फिर भी ऐसा क्यों है कि अदालती कार्रवाई के बीच भी जबरन बिना किसी वजह से NDTV के मुकदमों को पब्लिक में उछाला जाता रहा है। क्या मामला दर्ज नहीं हुआ, क्या अदालत आनाकानी कर रही है, जज आनाकानी कर रहा है, जांच नहीं चल रही? इनमें से कोई वजह नहीं होती। 1998 से मुकदमों की भरमार लगी है लेकिन अलग-अलग सरकारों के वक़्त संस्थाओं ने अब तक किया क्या? क्या NDTV सब सरकारों से बड़ा हो गया, कौनसी सरकार ने कौनसा मुकदमा दर्ज नहीं होने दिया? कोई जवाब नहीं है इसका। आज की बात लीजिये, सीबीआई ने ndtv के दफ्तर और प्रणॉय रॉय के घर छापा मारा। मामला दो प्राइवेट कंपनियों के बीच का है, तो एक सरकारी संस्था का बीच में कूदना समझ नहीं आया। NDTV ने अपना पक्ष रखा दस्तावेज़ के साथ कि रकम तो 7 साल पहले चुका दी गयी थी और प्राइवेट बैंक ने भी कोई शिकायत अब तक नहीं की है तो ये माजरा क्या है। (https://khabar.ndtv.com/…/ndtvs-updated-statement-on-cbi-ra…) कौन सच्चा कौन झूठा, ये भी तो फैसला अदालत में ही होगा। खुद वेंकैया नायडू बयान देते हैं कि अगर कोई मीडिया वाला कुछ गलत करता है तो सरकार चुप नहीं बैठ सकती और अगले ही वाक्य में वो कहते हैं कि सीबीआई में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं। लेकिन बीजेपी से बेहतर कोई और क्या बताएगा कि सीबीआई दरअसल क्या है।(http://timesofindia.indiatimes.com/…/articleshow/5900582.cms) और सर 2013 में आप लोग बड़े-बड़े लेख लिख रहे थे कि सीबीआई को आज़ाद करो। (http://www.firstpost.com/…/full-text-arun-jaitley-explains-…) आप लोग कह रहे थे कि इसकी आज़ादी के लिए 'कमिटेड' हैं।(http://www.news18.com/…/bjp-is-committed-to-cbi-autonomy-si…) 3 साल में आप अपनी किस प्रतिबद्धता को पूरा कर पाए हैं? लोकपाल, काला धन, सीबीआई की आज़ादी? सिफर! ऐसा NDTV में क्या है कि हर 6 महीने में इसे सरकार टारगेट करती है। ये रिपोर्ट फैलाई जाती है कि ED ने नोटिस दिया, IT ने नोटिस दिया, बैन करने की बात होती है, कभी वाट्सअप से तरह-तरह की झूठी बातें फैलाई जाती हैं। जगह-जगह ब्लॉक करवा दिया है। नतीजा क्या निकला है आज तक? नतीजा कभी निकलेगा भी नहीं क्योंकि आप अपने विपक्ष को ख़त्म नहीं करेंगे, सिर्फ उसके सहारे अपना काम निकालते रहेंगे। लोगों में ये सन्देश फैलाते रहेंगे कि हाँ कुछ तो हो रहा है, सरकार बढ़िया है, बस ये एक चैनल ही है जो पीछे पड़ा हुआ है। क्या सर, इतना क्या दसवें-ग्यारहवें पायदान वाले से परेशानी। कोई देखता ही नहीं तो आप कैसे अनदेखा नहीं कर पाते हैं। बाकी ये खेल हम समझ चुके हैं कि आप अपने हर विरोधी से ऐसे ही निपट रहे हैं, अफवाहों के ज़ोर पर। 'जेएनयू' में आपने यही किया। आम आदमी पार्टी के साथ यही किया। सिर्फ झूठे आरोप लगा कर छोड़ देते हैं। क्योंकि लोग पूछते भी नहीं कि 'चार्जशीट' भी दाखिल हुई या नहीं। आपकी फेक वेबसाइट की पोल खुल चुकी है। आपको पता है कि दिन भर 'पेड' गाली सुन कर भी किसी को फर्क क्यों नहीं पड़ता? क्योंकि उनको पता है कि 'पेड' है। सर, हम तो हैं छोटे मोटे पत्रकार, आज यहाँ तो कल कहीं और। लेकिन जानते हैं कि जगह बदल लेने से रोटी तो खा लेंगे, गाड़ी में तो घूम लेंगे लेकिन पत्रकारिता में ये मुश्किलें हमें हर जगह आएँगी। इसलिए ये लड़ाई किसी संस्थान के लिए बाद में, अपने लिए पहले है। आज मेरे वरिष्ठों का नंबर है, कल मेरा होगा। मेरे बहुत से साथी अलग-अलग संस्थानों में अपनी पूरी कोशिश से पत्रकारिता की गुंजाइश निकाल रहे हैं। NDTV शायद दूध का धुला ना हो, पर मुझे पता है कि एक छोटे से रिपोर्टर के लिए भी सरकार के सामने खड़ा हो जाता है। कभी मुझे 'डिक्टेट' नहीं करता कि मुझे क्या लिखना है और क्या नहीं। मेरी प्राथमिकता तय है। कोई और संस्थान दूध का धुला नज़र आता हो तो बता दीजिये, वहां चले जाते हैं। जिस दिन गुंजाइश ही नहीं रहेगी, उस दिन कहीं और काम कर लेंगे। हमारा झोला कौनसा उनके झोले से भारी है, उठा कर चल देंगे। बहुत लोगों को लग रहा है कि जब गलत नहीं किया तो हल्ला क्यों। आप मुझे बताइये कि जब कोई गलत नहीं है तो वो इतने साल से इतने हमले क्यों सहे। क्यों वो पैसा केस लड़ने में लगाए जो पैसा उसे कर्मचारियों को संसाधन के लिए देना चाहिए था। लेकिन फिर भी, आज तक किस मामले में इस संस्थान ने अपने कदम पीछे हटाए। किस मामले में अपने एंकर को कहा कि ज़रा आहिस्ता, ज़रा सॉफ्ट! शायद आपकी यही दिक्कत है। मेरी सब दोस्तों से दरख़्वास्त है कि इसे किसी व्यक्ति के बार में मत बनाइये। ये पत्रकारिता की लड़ाई है। ये विचारों की लड़ाई है। डर लगता है किसी के लिए लेकिन ये लड़ाई दिमागी तौर से भी तो जीतनी होगी। यहाँ आकर मैं सब्जेक्टिव हो जाती हूँ क्योंकि मैं अपनी आँखों से देख रही हूँ। यहाँ आपके लिए ऑब्जेक्टिव होना आसान है क्योंकि आप इसका हिस्सा नहीं है। बिना जाने-समझे दो पैसे के लेख कोई भी लिख सकता है क्योंकि उसमें मेहनत नहीं करनी होती। लोकप्रिय लिख दो। 2 लाख लोग लिख रहे हैं ऐसा। अपने बारे में कोई भ्रम ना पालें। और हाँ, उन साथियों के लिए जिन्हें NDTV से कुछ ख़ास दिक्कत है - दरअसल तुम्हारी पूरी उम्र निकल जाएगी लेकिन तुम समझ नहीं पाओगे कि इस खेल का मज़ा बच निकलने में नहीं, डूब जाने में ही है। तुम्हें लगता है कि पाकिस्तान से जीत कर या किसी पार्टी की जीत पर तुम खुद नाच रहे हो, लेकिन हम ये देख कर मुस्कुराते हैं कि देखो, कैसे नचाया जा रहा है।

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इस खेल का मज़ा बच निकलने में नहीं, डूब जाने में है

akb   किसी कुशल शासक की एक निशानी होती है - चाहे बहुमत उसकी तरफ हो लेकिन वो उस बहुमत के सामने विपक्ष का भ्रम बना कर रखता है। वो कभी अपने विपक्ष को ख़त्म नहीं करता, सिर्फ कमज़ोर करता है। जज़्बाती मुद्दों के सहारे टिका रहता है। वैसे भी, अभी सब ख़त्म नहीं हुआ। हमारे इतिहास ने मुझे बताया है कि अभी भविष्य में बहुत कुछ देखना बाकी है। पत्रकारिता के शुरूआती सबक थे - ऑब्जेक्टिविटी और सब्जेक्टिविटी। जिसे आप हिंदी में निष्पक्षता और व्यक्तिपरक कह सकते हैं। मैं चाहूंगी कि मामला सब्जेक्टिव होते हुए भी ऑब्जेक्टिविटी ना भूलूँ। जब किसी मामले की पूरी जानकारी ना हो और किसी व्यक्ति को करीब से ना जानते हो तो गारंटी लेने से बचना चाहिए। 2011 से मुझे सुनने में आता रहा है कि इस संस्थान पर ये केस है, वो नोटिस है। लेकिन कुछ मुद्दों की तकनीकी भाषा की वजह से आप समझने में नाकाम रहते हैं। तो उसे छोड़ देते हैं। सब केस कोर्ट में चल रहे हैं जो अलग-अलग सरकारों के वक़्त दर्ज किये गए, चाहे वो कांग्रेस हो या बीजेपी हो और NDTV के अनुसार संस्थान ने आज तक किसी भी सुनवाई को टाला नहीं, जबकि शिकायतकर्ता हर तारीख को आगे बढ़ाता रहा है। आज तक शिकायतकर्ता किसी भी केस में कोर्ट से कोई आदेश नहीं ला पाया (http://www.ndtv.com/…/statement-of-facts-on-fake-income-tax…) लेकिन फिर भी ऐसा क्यों है कि अदालती कार्रवाई के बीच भी जबरन बिना किसी वजह से NDTV के मुकदमों को पब्लिक में उछाला जाता रहा है। क्या मामला दर्ज नहीं हुआ, क्या अदालत आनाकानी कर रही है, जज आनाकानी कर रहा है, जांच नहीं चल रही? इनमें से कोई वजह नहीं होती। 1998 से मुकदमों की भरमार लगी है लेकिन अलग-अलग सरकारों के वक़्त संस्थाओं ने अब तक किया क्या? क्या NDTV सब सरकारों से बड़ा हो गया, कौनसी सरकार ने कौनसा मुकदमा दर्ज नहीं होने दिया? कोई जवाब नहीं है इसका। आज की बात लीजिये, सीबीआई ने ndtv के दफ्तर और प्रणॉय रॉय के घर छापा मारा। मामला दो प्राइवेट कंपनियों के बीच का है, तो एक सरकारी संस्था का बीच में कूदना समझ नहीं आया। NDTV ने अपना पक्ष रखा दस्तावेज़ के साथ कि रकम तो 7 साल पहले चुका दी गयी थी और प्राइवेट बैंक ने भी कोई शिकायत अब तक नहीं की है तो ये माजरा क्या है। (https://khabar.ndtv.com/…/ndtvs-updated-statement-on-cbi-ra…) कौन सच्चा कौन झूठा, ये भी तो फैसला अदालत में ही होगा। खुद वेंकैया नायडू बयान देते हैं कि अगर कोई मीडिया वाला कुछ गलत करता है तो सरकार चुप नहीं बैठ सकती और अगले ही वाक्य में वो कहते हैं कि सीबीआई में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं। लेकिन बीजेपी से बेहतर कोई और क्या बताएगा कि सीबीआई दरअसल क्या है।(http://timesofindia.indiatimes.com/…/articleshow/5900582.cms) और सर 2013 में आप लोग बड़े-बड़े लेख लिख रहे थे कि सीबीआई को आज़ाद करो। (http://www.firstpost.com/…/full-text-arun-jaitley-explains-…) आप लोग कह रहे थे कि इसकी आज़ादी के लिए 'कमिटेड' हैं।(http://www.news18.com/…/bjp-is-committed-to-cbi-autonomy-si…) 3 साल में आप अपनी किस प्रतिबद्धता को पूरा कर पाए हैं? लोकपाल, काला धन, सीबीआई की आज़ादी? सिफर! ऐसा NDTV में क्या है कि हर 6 महीने में इसे सरकार टारगेट करती है। ये रिपोर्ट फैलाई जाती है कि ED ने नोटिस दिया, IT ने नोटिस दिया, बैन करने की बात होती है, कभी वाट्सअप से तरह-तरह की झूठी बातें फैलाई जाती हैं। जगह-जगह ब्लॉक करवा दिया है। नतीजा क्या निकला है आज तक? नतीजा कभी निकलेगा भी नहीं क्योंकि आप अपने विपक्ष को ख़त्म नहीं करेंगे, सिर्फ उसके सहारे अपना काम निकालते रहेंगे। लोगों में ये सन्देश फैलाते रहेंगे कि हाँ कुछ तो हो रहा है, सरकार बढ़िया है, बस ये एक चैनल ही है जो पीछे पड़ा हुआ है। क्या सर, इतना क्या दसवें-ग्यारहवें पायदान वाले से परेशानी। कोई देखता ही नहीं तो आप कैसे अनदेखा नहीं कर पाते हैं। बाकी ये खेल हम समझ चुके हैं कि आप अपने हर विरोधी से ऐसे ही निपट रहे हैं, अफवाहों के ज़ोर पर। 'जेएनयू' में आपने यही किया। आम आदमी पार्टी के साथ यही किया। सिर्फ झूठे आरोप लगा कर छोड़ देते हैं। क्योंकि लोग पूछते भी नहीं कि 'चार्जशीट' भी दाखिल हुई या नहीं। आपकी फेक वेबसाइट की पोल खुल चुकी है। आपको पता है कि दिन भर 'पेड' गाली सुन कर भी किसी को फर्क क्यों नहीं पड़ता? क्योंकि उनको पता है कि 'पेड' है। सर, हम तो हैं छोटे मोटे पत्रकार, आज यहाँ तो कल कहीं और। लेकिन जानते हैं कि जगह बदल लेने से रोटी तो खा लेंगे, गाड़ी में तो घूम लेंगे लेकिन पत्रकारिता में ये मुश्किलें हमें हर जगह आएँगी। इसलिए ये लड़ाई किसी संस्थान के लिए बाद में, अपने लिए पहले है। आज मेरे वरिष्ठों का नंबर है, कल मेरा होगा। मेरे बहुत से साथी अलग-अलग संस्थानों में अपनी पूरी कोशिश से पत्रकारिता की गुंजाइश निकाल रहे हैं। NDTV शायद दूध का धुला ना हो, पर मुझे पता है कि एक छोटे से रिपोर्टर के लिए भी सरकार के सामने खड़ा हो जाता है। कभी मुझे 'डिक्टेट' नहीं करता कि मुझे क्या लिखना है और क्या नहीं। मेरी प्राथमिकता तय है। कोई और संस्थान दूध का धुला नज़र आता हो तो बता दीजिये, वहां चले जाते हैं। जिस दिन गुंजाइश ही नहीं रहेगी, उस दिन कहीं और काम कर लेंगे। हमारा झोला कौनसा उनके झोले से भारी है, उठा कर चल देंगे। बहुत लोगों को लग रहा है कि जब गलत नहीं किया तो हल्ला क्यों। आप मुझे बताइये कि जब कोई गलत नहीं है तो वो इतने साल से इतने हमले क्यों सहे। क्यों वो पैसा केस लड़ने में लगाए जो पैसा उसे कर्मचारियों को संसाधन के लिए देना चाहिए था। लेकिन फिर भी, आज तक किस मामले में इस संस्थान ने अपने कदम पीछे हटाए। किस मामले में अपने एंकर को कहा कि ज़रा आहिस्ता, ज़रा सॉफ्ट! शायद आपकी यही दिक्कत है। मेरी सब दोस्तों से दरख़्वास्त है कि इसे किसी व्यक्ति के बार में मत बनाइये। ये पत्रकारिता की लड़ाई है। ये विचारों की लड़ाई है। डर लगता है किसी के लिए लेकिन ये लड़ाई दिमागी तौर से भी तो जीतनी होगी। यहाँ आकर मैं सब्जेक्टिव हो जाती हूँ क्योंकि मैं अपनी आँखों से देख रही हूँ। यहाँ आपके लिए ऑब्जेक्टिव होना आसान है क्योंकि आप इसका हिस्सा नहीं है। बिना जाने-समझे दो पैसे के लेख कोई भी लिख सकता है क्योंकि उसमें मेहनत नहीं करनी होती। लोकप्रिय लिख दो। 2 लाख लोग लिख रहे हैं ऐसा। अपने बारे में कोई भ्रम ना पालें। और हाँ, उन साथियों के लिए जिन्हें NDTV से कुछ ख़ास दिक्कत है - दरअसल तुम्हारी पूरी उम्र निकल जाएगी लेकिन तुम समझ नहीं पाओगे कि इस खेल का मज़ा बच निकलने में नहीं, डूब जाने में ही है। तुम्हें लगता है कि पाकिस्तान से जीत कर या किसी पार्टी की जीत पर तुम खुद नाच रहे हो, लेकिन हम ये देख कर मुस्कुराते हैं कि देखो, कैसे नचाया जा रहा है।

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