Sarvapriya Sangwan

My Article

कोर्ट-कचहरी का पहला चक्कर

akb indian-judicial-system 'अरे भैया कहां कोर्ट कचहरी के चक्कर में पड़ते हो'... हम सब कोर्ट कचहरी जाने को चक्कर के साथ जोड़ कर ही बोलते हैं। मतलब यह तो तय ही मान लिया कि आपको चक्कर काटने पड़ेंगे। आपको इंतज़ार करना पड़ेगा, आपका बहुत सारा वक़्त ज़ाया होगा और फिर भी किसी समाधान की कोई गारंटी नहीं होती और इस सबके बावजूद कोर्ट में भीड़ कभी कम नहीं होती। लोगों का न्याय प्रक्रिया में विश्वास बराबर बना हुआ है। वकीलों के परिवार से होकर भी मैंने कभी असल कोर्ट नहीं देखा था। कभी पाला ही नहीं पड़ा। लेकिन यह ज़रूर पता था कि फिल्मों में दिखाए जाने वाले किलेनुमा कोर्ट असल में नहीं होते। एक कोर्ट आपके घर के स्टोर रूम के साइज का भी हो सकता है। हुआ कुछ यूं कि होली से कुछ दिन पहले मैं कैलाश कॉलोनी मेट्रो स्टेशन के पास खड़ी थी। गाड़ी में कुछ दिक्कत थी तो उसे वहां ठीक करवा रही थी। एकदम से पता नहीं कहां से एक पानी का गुब्बारा धपाक से मुंह पर लगा। कुछ सेकेंड में थोड़ा होश आया तो देखा कि एक कार में 3-4 लड़के थे और वहीं से गुब्बारा फेंका गया था। वे लोग कार में कुछ सेकेंड रुके और कुछ अंग्रेजी वाली गालियां देकर उन्होंने कार चला दी। अब इस तरह की स्थितियों में अक्ल कभी-कभी ही काम करती है और खुदा की रहमत से मेरी कर गई। मैंने गाड़ी का नंबर नोट कर लिया। हालांकि पूरा नंबर नोट नहीं कर पाई, लेकिन गाड़ी का रंग और मॉडल भी देख लिया था। उसी वक़्त मैंने 100 नंबर पर फ़ोन किया। उसके बाद वहां खड़े कई आदमियों ने बारी-बारी से आकर पूछा कि ओह, आपको गुब्बारा मारा और हलकी सी मुस्कान के साथ चलते बनते। 10 मिनट बाद एक पीसीआर वैन आ गई और मैंने उन्हें पूरा घटनाक्रम बताया। उन्होंने उस वक़्त सब जानकारी ब्रॉडकास्ट तो कर दी, लेकिन कुछ सुराग मिला नहीं। उसके बाद मेरे पास थाने से फ़ोन आया और मैंने जाकर एफआईआर दर्ज करवा दी। एसएचओ साहब ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने भी बयान देना होगा। मैंने हामी भरी और वापस आ गई। खैर, ऐसे मामलों में मैं घरवालों को काम निपटा कर ही जानकारी देती हूं, वरना उन्हें हर चीज़ 'चक्कर' और 'सर दर्द मोल लेना' लगता है। कुछ दोस्तों से साझा किया तो उन्होंने कह दिया कि तुम्हारा वक़्त कीमती है, क्यों कोर्ट वोर्ट में वक़्त ख़राब करना, कहां धक्के खाती फिरोगी, कुछ होता नहीं है, वगैरह-वगैरह। अपनी नागरिक ज़िम्मेदारियों को लोग सिर दर्द ही समझते हैं। अभी हाल ही में मैं भूमिहीनों और किसानों के आंदोलन को कवर कर रही थी। राजस्थान के एक छोटे से गांव की महिला मुझे अपनी लिखित शिकायतों की चिट्ठियों के पुलिंदे दिखा रही थी जो उसने प्रशासन को लिखी थीं। मैंने दोस्तों की बात सुनी तो सही, लेकिन उस महिला की शिकायत के पन्ने पर लगा अंगूठे का निशान मेरी आंखों के सामने घूम गया। आखिर उस गरीब, अनपढ़, साधन विहीन औरत ने अपनी ज़िम्मेदारी तो निभायी थी। मुझे भी निभानी थी, फिर उसके बाद जो हो सो हो। आज एफआईआर के एक हफ्ते बाद मजिस्ट्रेट के सामने मेरा बयान होना था। कोर्ट इतना बड़ा था कि जिस कमरे में मुझे जाना था, उसको ढूंढ़ने में पसीने छूट गए। 12:30 का वक़्त दिया गया था, लेकिन एक बजे तक भी नंबर नहीं आया। मजिस्ट्रेट ने कहा कि लंच के बाद दो बजे बयान दर्ज होगा। 2:30 बजने को आए थे पर इंतज़ार ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा था। भूख लग रही थी, ऑफिस के लिए लेट हो चुकी थी। मैं भी सोचने लगी कि सच में मुसीबत ही है। सरकारी काम ऐसे क्यों होते हैं। फिर सरकारी से मुझे याद आया कि एक सरकारी हॉस्पिटल में मैं भी काम करती थी। सुबह से मरीज़ों का जो तांता लगता था कि कई मरीज़ों को लौटाना पड़ता था। उनका नंबर ही नहीं आता था। लेकिन अगले दिन फिर आना उन मरीज़ों की मजबूरी थी। कसूर हमारा भी नहीं था। मरीज़ ज़्यादा होते थे, डॉक्टर कम, मरीज़ों के इलाज वाली चेयर भी कम होती थी। अभावों के बावजूद जितना हो सकता था, करते थे। यह सोच ही रही थी कि मेरा नंबर आ गया। मेरा बयान मजिस्ट्रेट के ऑफिस में हुआ अकेले में। मैं गई तो मजिस्ट्रेट ने पूछा कि हिंदी में बोलोगी या अंग्रेजी में। मैंने कहा कि दोनों में से किसी भाषा में बुलवा लीजिए, दोनों में बराबर ख़राब हूं। उन्होंने मुझे समझाया कि आपको यहां इसलिए लाया गया है ताकि आप किसी भी बाहरी दबाव के बिना अपना बयान लिखवा सकें। वहां से निकलते हुए मैंने सोचा कि जितनी देर में इन्होंने मेरा पूरा बयान लिया, उतने वक़्त कोई ना कोई बाहर इंतज़ार कर रहा होगा और कोर्ट कचहरी को चक्कर की उपमा देते हुए खुद के फैसले को कोस रहा होगा। लेकिन मजिस्ट्रेट ने नियम के अनुसार काम किया और उसमें वक़्त लगता है। मेरे साथ आए कांस्टेबल को थोड़ा सी डांट भी लगाई कि एक हफ्ता हो गया है और आपने गाड़ी की शिनाख्त नहीं की है। असल में कोर्ट कचेहरी में जाने से कौन डरता है, हम जैसे मध्यम वर्गीय लोग ही। गरीब नहीं डरता है। उसे आदत होती है लाइन में लगने की, इंतज़ार करने की, डांट खाने की। हमें लगता है कि हम कहां इनके साथ लाइन में लगेंगे। फिर हम खुद को तसल्ली देते हैं कि अरे छोटी सी तो बात थी, हमने ही ठेका तो नहीं लिया समाज सुधारने का, हमारे पास इतना टाइम नहीं है, पुलिस और कोर्ट कुछ करती नहीं है। लेकिन मैंने पुलिस और कोर्ट के पास जाने का फैसला लिया था क्योंकि मैं इसे छोटी बात नहीं समझती थी। पत्रकार हूं और दिल्ली के असुरक्षित माहौल के ज़िम्मा सिर्फ पुलिस का नहीं होता। अगर आप अपने कम्फर्ट के लिए छोटी बातों को नज़रअंदाज़ कर के चुप बैठ जाएंगे तो पुलिस खुद जाकर तो एक्शन नहीं लेगी ना। भले ही अब भी कोई एक्शन ना हो लेकिन मैं कम से कम राजस्थान की उस गरीब अनपढ़ औरत जितनी हिम्मत तो दिखा ही सकती हूं। और आप भी।

Get connected on twitter instagram facebookyoutube

NH10 से कौन-कौन गुजरा...

akb 'ऑनर किलिंग' से मेरा परिचय पहली बार आठवीं क्लास में हुआ था। हर रोज की तरह स्कूल में प्रार्थना हुई, गायत्री मंत्र, वो रोज की "भारत हमारा देश है…इसके सुयोग्य अधिकारी बनने का हम प्रयत्न करेंगे" वाली शपथ जो मैं ही दिलाती थी स्कूल में... और उसके बाद रूटीन से कुछ अलग घटा। स्कूल के प्रिंसिपल ने एक लड़की की मौत की खबर दी और बिना मौत की वजह बताये स्कूल में एक दिन की छुट्टी कर दी गयी। स्कूल छोटा था, आसपास के बच्चे ही पढ़ते थे और इसलिए हर किसी को पता था कि क्या हुआ है। मेरे दोस्तों ने मुझे बताया कि उस लड़की को उसके मां-बाप ने ही मार दिया था। उस लड़की को मैं अच्छी तरह जानती थी, दीदी बुलाती थी। खबर से इतनी सहमी हुई थी कि घर आकर मां की गोद में बैठ कर रोने लगी। सच कहूं तो मेरी मां के चेहरे पर भी सहानुभूति नहीं थी, उस लड़की के लिए। इतनी बेरुखी मुझे अंदर तक झंझोड़ गयी। मां इतनी कठोर कैसे हो सकती है और एक वो मां जिसने अपने हाथों से ही अपनी बेटी को जहर पिलाया होगा। फिर मेरे दिमाग में बस यही सवाल था कि जिस बात को छुपाने के लिए, अपनी इज्जत बचाने के लिए मां-बाप ने ये घिनौना कदम उठाया होगा, आखिर वो बात तो सबको पता चल ही गयी थी, फिर मारने की वजह क्या थी। क्या बेटियां इतनी फालतू और अनचाही होती हैं कि 17 साल उनको पालने के बाद उसे मारने से किसी को फर्क ही ना पड़े। शहर में लोग मरने-मारने में एका नहीं दिखाते। सिर्फ एक मूक हामी थी, मेरे शहर वालों की। लेकिन कुछ साल बाद एक और खबर मिली थी। इस बार मेरी मां के गांव से। एक लड़की को उसके चाचा ने गांव की गली में खड़ा करके गोली मार दी थी। लड़के को मारने के लिए पूरा गांव उतारू था। वहां खूब एका होता है। लड़की की लाश को किसी पड़ोसी की बग्गी में रख कर उसे फूंक आये। उस गांव में खूब आना जाना था और इसलिए उस गांव, गली और लोगों की तस्वीर बनाना मेरे लिए मुश्किल नहीं था। गांव में अब मिट्टी नहीं खून सूंघा जा सकता था। अचानक उन भोले-भाले कहे जाने वाले लोगों की मासूमियत की लाश भी सामने ही पड़ी थी। परिवार खुद को सरहद की किसी जंग से विजयी लौटा समझ रहा था लेकिन इस जंग में हद पार करने की हिमाकत उनके अपने बच्चों ने की थी। ऑनर किलिंग की किसी भी खबर को उठा लीजिये, देखिएगा कि इस हद को पार करने वाले लड़के को मारने वाले भी क्या उसके अपने मां बाप थे? नहीं, किसी भी लड़के को उसके अपनों ने नहीं मारा। क्योंकि लड़का बहुत बड़ी पूंजी होता है। यहां अगर वो कत्ल, बलात्कार भी कर आये तो उसे बचाने के लिए घरवाले अपना सब दांव पर लगा देते हैं। लेकिन लड़की अगर प्यार और शादी भर ही करे तो उसको मारने के लिए प्लानिंग तक नहीं होती। सीधा सजा। उन्हें पता है कि समाज उन्हें रोकने कभी नहीं आएगा क्योंकि ये तो इज्जत का सवाल है। लड़के को भी लड़की वाले या गांव वाले ही मौत के घाट उतारते हैं। सिर्फ प्यार करना ही गुनाह नहीं माना जाता, किसी दलित लड़के के स्वर्ण से प्यार करने पर अलग दफाएं लगती हैं। वहां उसके परिवार वाले भी सजा पाते हैं। उसकी बहनों के साथ बलात्कार होते हैं।

निर्देशक नवदीप सिंह की NH10 ने मुझे ये सब कहानियां याद दिला दी जो मैंने अखबारों से नहीं पढ़ी थी। महानगर के अखबार से निकल कर जब सच में खबर तक पहुंचा जाए तो इस फिल्म की कहानी बनती है। कहानी हरियाणा की है। हरियाणा के बर्बर चेहरे की है। एक रात की कहानी है जिसकी सुबह होने तक बहुत कुछ ज़िन्दगी भर के लिए बदल जाता है। कहानी ऑनर किलिंग से शुरू होकर सिर्फ किलिंग तक पहुंचती है। जो सफर है वो देखने लायक है। मेरे कुछ हरियाणा के दोस्तों को इस बात से ऐतराज है कि हरियाणा का कुरूप चेहरा क्यों दिखाया है, हर जगह तो ऐसा नहीं होता, हर कोई तो ऐसा नहीं होता वगैरह। लेकिन आप हरियाणा के 'ऑनर' की चिंता में निर्देशकों की रचनाओं का कत्ल करने पर आमादा ना हों क्योंकि बेशक यही हरियाणा का चेहरा नहीं पर चेहरे का दाग जरूर है। अगर आप अपनी बेटियों की जिन्दगी से ज्यादा अपने राज्य के रसूख के बारे में सोच रहे हैं तो आप भी इस ऑनर किलिंग में हिस्सेदार एक छोटी इकाई हैं। ऐसी कई फिल्में बनी हैं जहां हरियाणवी परिवेश या किरदार दिखाए गए हैं पर मैं कभी भी उनकी बोली, लहजे, पहनावे से संतुष्ट नहीं होती थी क्योंकि वो गलत और बनावटी होता है। इन फिल्मों में आप हरियाणा का खांटीपन महसूस नहीं कर सकते। विशाल भारद्वाज की फिल्म 'मटरू की बिजली का मन डोला' भी ऐसी ही एक फिल्म थी कि अगर कहा जाए कि इसमें हरियाणा नहीं राजस्थान या महाराष्ट्र दिखाया गया है तो भी कुछ फर्क महसूस नहीं होगा। NH10 के ज़्यादातर कलाकार हरियाणा से ही लिए गए हैं और लहजे, बोली, पहनावे, लोकेशन से कोई समझौता नहीं किया गया है। फिल्म का यथार्थवादी होना, मुझे सबसे ज्यादा भाता है और एक डायरेक्टर की उपलब्धि वहीं है जहां वो एक सच को कहानी बना कर दिखा दे और लोग किसी कहानी को सच मान बैठें। अनुष्का शर्मा की अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्म यही है। दीप्ति नवल के किरदार को अच्छे से गढ़ा गया है जहां आप कम कम संवाद में ही किरदार को समझ लेते हैं। फिल्म देखते हुए शायद आप सिहर जाएं और हो सकता है कि कभी किसी की मदद के लिए आगे बढ़ने से पहले 100 बार सोचें। कहानी सच्चाई के नजदीक है लेकिन इसका सन्देश कुछ लोगों को नेगेटिव लग सकता है। शायद इसीलिए ये फिल्म 'A' सर्टिफिकेट के योग्य थी। एक सास जो अपनी बहू को झापड़ रसीद करती है और उसका पोता खड़ा होकर हंसता है, ये सीन आपको पुरुषवादी मानसिकता, बलात्कारी मानसिकता वाले सवालों का सीधा सपाट जवाब है कि आखिर ये मानसिकता पैदा कहां से होती है। जब फिल्म के आखिरी सीन में एक मां कहती है कि हमारी बेटी थी, जो करना था सो करना था, तब आपका मन आपसे जरूर पूछेगा कि इन फिल्मों और विज्ञापनों से पहले लड़कियों को चीज समझने वाले क्या उनके अपने मां बाप नहीं? कन्यादान करते हैं। दहेज के साथ। लड़कियों को ही सहनशील और समझौतावादी होना सिखाते हैं ताकि उसकी दम तोड़ चुकी शादी ना टूटे। इज्जत यहां भी आड़े आ जाती है। ये बातें मैं पूरे देश के लिए नहीं कह सकती। पर छोटे शहरों और गांवों में जाकर ये बात आप समझ पाएंगे। वहां ना भी जा पाएं तो NH10 चले जाइएगा। हो सकता है कि हरियाणा की ये तस्वीर हमारे लिए आंकड़ों में बदलती दिख रही हो पर जब तक ये शून्य नहीं है तब तक NH10 प्रासंगिक है

Get connected on twitter instagram facebookyoutube

:)