Sarvapriya Sangwan

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ये कम्यूनिस्ट क्या होता है !

akb

एक दोस्त ने पूछा कि कम्यूनिस्ट/वामपंथी क्या होता है। मैंने कोई किताब तो नहीं पढ़ी लेकिन एक परिवार को जाना तो पता चला कि यही असली कम्यूनिस्ट होते होंगे। जो खुद को कम्यूनिस्ट कहते-समझते हों, वो भी एक बार ये पढ़ कर फैसला करें कि वो असली वामपंथी हैं या नहीं।

चक्रवर्ती साहब और उनकी पत्नी जब भी कभी बाहर खाना खाने जाते हैं तो अपने घर की 'हेल्पर' को साथ ले जाते हैं, एक ही मेज़ पर एक जैसा खाना खाते हैं। बरसों से ये नियम टूटा नहीं। मैडम चक्रवर्ती दुर्गा पूजा में जो कपड़े अपनी बेटी के लिए लायी, बिलकुल वैसा ही एक जोड़ा अपनी 'हेल्पर' की बेटी के लिए लेकर आयीं। हालांकि उनकी बेटी को ये बड़ा नागवार गुज़रा। बालक मन। फिर भी वो हमेशा से ऐसा करती आई हैं। मैडम चक्रवर्ती अपने लिए कोई अंतिम संस्कार नहीं चाहती। उन्होंने अपने शरीर को अभी से ही मेडिकल में दान कर दिया है।

कई और बातें हैं जिन्हें जानकर मैं काफी प्रभावित हुई और उन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश ज़रूर करुँगी। लेकिन मैं जानती हूँ कि खुद को वामपंथी बनाने में बहुत ज़्यादा अनुशासन और मेहनत लगती है। इंसान कितनी बार खुद को विरोधाभासों से घिरा पाता है लेकिन फिर सोचता है, फिर खुद को खरा साबित करने के लिए जुट जाता है। जिस समाज में हम रह रहे हैं, वहां धर्म, जाति, ऊंच-नीच मानना तो बहुत आसान चीज़ है। परंपरा के साथ चलना आसान है, सर्वमान्य है, कोई विरोधाभास नहीं होगा। अगर मैंने वामपंथ नहीं पढ़ा है तो इससे ज़्यादा तारीफ़ करना या गाली देना बेवकूफी होगी। किस तरह के लोग ऐसा करते हैं, उनका ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं।

मैं डेमोक्रेसी में विश्वास रखती हूँ। इसकी खामियों के बावजूद इससे खुश हूँ। अब अगर आने वाले वक़्त में डेमोक्रेसी असफल साबित हो तो क्या डेमोक्रैट होना भी गाली हो जायेगा? एक तरह से असफल हो ही रही है। डेमोक्रैट होने के बावजूद कई बार मैं भी खुद को विरोधाभास में फंसा हुआ पाती हूँ लेकिन फिर भी डेमोक्रैट होना थोड़ा आसान है। आप कितना भी कमाइये और कितना भी खर्च कीजिये और किसी गैर-बराबरी को नज़रअंदाज़ करिये। सरकार के खिलाफ बोलना और गैर-बराबरी को नज़रअंदाज़ ना करना, ये भी डेमोक्रेसी में ही संभव है।

सबसे आसान है फासीवाद। ये कहीं ना कहीं आदमी में छुप कर बैठा होता है। डर किस व्यक्ति में नहीं होता। बस डरे हुए को और डराओ। असुरक्षा की भावना किस में नहीं होती। बस असुरक्षा को बड़ा बना कर दिखाओ। ऊंच-नीच, जाति, धर्म तो पैदा होते ही बच्चे को सिखाया जाने लगता है। तो अच्छा खून, बुरा खून की भावना तो बनी-बनायी है। खुद को दूसरों से महान समझना क्या मुश्किल है। किसी चीज़ का हल कौन ताक़त से नहीं करना चाहता? कौन जल्दी से नहीं करना चाहता। मैंने अपने एक सहकर्मी के मुँह से सुना कि देश को कुछ वक़्त तक आर्मी के हाथों में दे दो। सब सुधर जायेगा। अगर इस सबसे आप खुद को जोड़ पाते हैं तो आप कभी भी फासीवादी हो सकते हैं। हेल हिटलर!

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पारदर्शिता की पीपनी

akb   अभी एक नया फाइनेंस बिल बनाया है सरकार ने। अब तक जो कंपनियां पार्टियों को चंदा देती थी, उस पर लिमिट थी। कंपनियां अपनी 3 साल की कमाई के एवरेज से 7.5 % चंदा ही दे सकती थीं। अब ये लिमिट हटा दी गयी है। कंपनियों से आप कितना भी चंदा वसूल सकते हैं। कंपनियों के ये भी बताने की ज़रूरत नहीं है कि किसे चंदा दिया गया। ये सब चंदा चेक, ड्राफ्ट, ऑनलाइन, या किसी भी और सरकारी स्कीम के तहत दिया जा सकता है। पहले 20,000 रूपये के चंदे पर पार्टियों को दान देने वाले का नाम बताने की ज़रूरत नहीं थी। अब बस घटाकर इसे 2000 कर दिया गया है। सबसे ज़रूरी बात ये कि ये हर चुनाव पर लागू होगा, चाहे जनरल इलेक्शन हो, राज्य चुनाव हो, या पंचायत/नगर निगम के चुनाव हों।

पहली बात तो संसद में इस पर बहस करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि ये मनी बिल है और इसे सिर्फ लोकसभा में पास होने की ज़रूरत है। वहां ये पास हो चुका है। लेकिन ये दोनों ही प्रावधान टैक्स से संबंधित नहीं हैं। फिर इन्हें मनी बिल में क्यों ठूंसा गया है। इसलिए ताकि इन्हें लटकाया ना जा सके। इन पर बहस ना हो सके। सरकार ने हज़ारों एनजीओ की विदेशी फंडिंग पर रोक लगा दी किसी ना किसी प्रावधान में अटका कर। कई एनजीओ केस लड़ रहे हैं। लेकिन लड़ते रहें, जब तक नतीजा आएगा, तब तक उनका काम तो ठप्प हो चुका होगा। सरकार पिछले साल मई में एक और मनी बिल लेकर आयी थी। उसमें राजनीतिक दलों और एनजीओ की विदेशी फंडिंग को आसान कर दिया गया था। कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ ADR संस्था ने केस डाल रखा था विदेशी फंडिंग को लेकर। 2004 से 2012 तक विदेशी कंपनी से कथित चंदा लेते रहे जो गैर-कानूनी था। लेकिन बैक डेट से कानून ले आये तो केस भी ख़त्म हो गया। सरकार एनजीओ को तो पैसा लेने से रोक सकती है क्योंकि ये उसके हाथ में है। लेकिन सरकार को कोई नहीं रोक सकता क्योंकि उसके ऊपर कोर्ट ही होता है और कानून आने से उसके भी हाथ बंध गए। यहाँ पर ये चंदा झूठे विज्ञापनों में, भ्रम फैलाने में, झूठे प्रचार, फोटोशॉप, स्वघोषित फलाने ढिकाने दलों में ही तो खर्च होता है जिससे देश की शांति भंग होती है। लोग गुमराह होते हैं और किसी को फर्क भी नहीं पड़ता कि इतने चंदे की ज़रूरत क्या है पार्टियों को। 1000 करोड़ में इलेक्शन लड़े जा रहे हैं कॉर्पोरेट से पैसा लेकर। फिर उन्हें फायदे दिए जाते हैं। पारदर्शिता की पीपनी बजा रहे थे। कोई राजनीतिक दल RTI के दायरे में नहीं किया गया। कहाँ से चंदा आ रहा है, बताने की ज़रूरत नहीं। कंपनियों को भी अब बताने की ज़रूरत नहीं। विदेशी कंपनियों से पैसा लेने पर रोक नहीं। क्या हम जानते हैं कि किस विदेशी कंपनी का हमारे देश के प्रति क्या नीयत है? कुछ भी उठा कर मनी बिल में डाल देते हैं क्योंकि राज्यसभा में अभी बहुमत आया नहीं हैं। कुछ भी झूठ चलवा रहे हैं वेबसाइटों से क्योंकि उनको देने के लिए पैसा आ रहा है जिसका स्त्रोत किसी को पता नहीं। भ्रष्टाचार पर हंगामा काटा गया था अन्ना आंदोलन में। सबसे पहले यही पार्टी पहुंची थी समर्थन देने जो आज सरकार में आ गयी है। लोकपाल बिल राज्यसभा और लोकसभा दोनों में ही 2013 में पास हो गया था। कहाँ नियुक्त किया इन्होंने लोकपाल? तीन साल होने को हैं कोई नाम भी नहीं लेता। कहाँ रुक गयी रिश्वत? कहाँ रुक गया भ्रष्टाचार? भ्रष्टाचार तो यही है कि कुछ भी कानून बना दो जिससे पारदर्शिता कम हो। किसी को क्या पता चलेगा।

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पारदर्शिता की पीपनी

akb   अभी एक नया फाइनेंस बिल बनाया है सरकार ने। अब तक जो कंपनियां पार्टियों को चंदा देती थी, उस पर लिमिट थी। कंपनियां अपनी 3 साल की कमाई के एवरेज से 7.5 % चंदा ही दे सकती थीं। अब ये लिमिट हटा दी गयी है। कंपनियों से आप कितना भी चंदा वसूल सकते हैं। कंपनियों के ये भी बताने की ज़रूरत नहीं है कि किसे चंदा दिया गया। ये सब चंदा चेक, ड्राफ्ट, ऑनलाइन, या किसी भी और सरकारी स्कीम के तहत दिया जा सकता है। पहले 20,000 रूपये के चंदे पर पार्टियों को दान देने वाले का नाम बताने की ज़रूरत नहीं थी। अब बस घटाकर इसे 2000 कर दिया गया है। सबसे ज़रूरी बात ये कि ये हर चुनाव पर लागू होगा, चाहे जनरल इलेक्शन हो, राज्य चुनाव हो, या पंचायत/नगर निगम के चुनाव हों।

पहली बात तो संसद में इस पर बहस करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि ये मनी बिल है और इसे सिर्फ लोकसभा में पास होने की ज़रूरत है। वहां ये पास हो चुका है। लेकिन ये दोनों ही प्रावधान टैक्स से संबंधित नहीं हैं। फिर इन्हें मनी बिल में क्यों ठूंसा गया है। इसलिए ताकि इन्हें लटकाया ना जा सके। इन पर बहस ना हो सके। सरकार ने हज़ारों एनजीओ की विदेशी फंडिंग पर रोक लगा दी किसी ना किसी प्रावधान में अटका कर। कई एनजीओ केस लड़ रहे हैं। लेकिन लड़ते रहें, जब तक नतीजा आएगा, तब तक उनका काम तो ठप्प हो चुका होगा। सरकार पिछले साल मई में एक और मनी बिल लेकर आयी थी। उसमें राजनीतिक दलों और एनजीओ की विदेशी फंडिंग को आसान कर दिया गया था। कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ ADR संस्था ने केस डाल रखा था विदेशी फंडिंग को लेकर। 2004 से 2012 तक विदेशी कंपनी से कथित चंदा लेते रहे जो गैर-कानूनी था। लेकिन बैक डेट से कानून ले आये तो केस भी ख़त्म हो गया। सरकार एनजीओ को तो पैसा लेने से रोक सकती है क्योंकि ये उसके हाथ में है। लेकिन सरकार को कोई नहीं रोक सकता क्योंकि उसके ऊपर कोर्ट ही होता है और कानून आने से उसके भी हाथ बंध गए। यहाँ पर ये चंदा झूठे विज्ञापनों में, भ्रम फैलाने में, झूठे प्रचार, फोटोशॉप, स्वघोषित फलाने ढिकाने दलों में ही तो खर्च होता है जिससे देश की शांति भंग होती है। लोग गुमराह होते हैं और किसी को फर्क भी नहीं पड़ता कि इतने चंदे की ज़रूरत क्या है पार्टियों को। 1000 करोड़ में इलेक्शन लड़े जा रहे हैं कॉर्पोरेट से पैसा लेकर। फिर उन्हें फायदे दिए जाते हैं। पारदर्शिता की पीपनी बजा रहे थे। कोई राजनीतिक दल RTI के दायरे में नहीं किया गया। कहाँ से चंदा आ रहा है, बताने की ज़रूरत नहीं। कंपनियों को भी अब बताने की ज़रूरत नहीं। विदेशी कंपनियों से पैसा लेने पर रोक नहीं। क्या हम जानते हैं कि किस विदेशी कंपनी का हमारे देश के प्रति क्या नीयत है? कुछ भी उठा कर मनी बिल में डाल देते हैं क्योंकि राज्यसभा में अभी बहुमत आया नहीं हैं। कुछ भी झूठ चलवा रहे हैं वेबसाइटों से क्योंकि उनको देने के लिए पैसा आ रहा है जिसका स्त्रोत किसी को पता नहीं। भ्रष्टाचार पर हंगामा काटा गया था अन्ना आंदोलन में। सबसे पहले यही पार्टी पहुंची थी समर्थन देने जो आज सरकार में आ गयी है। लोकपाल बिल राज्यसभा और लोकसभा दोनों में ही 2013 में पास हो गया था। कहाँ नियुक्त किया इन्होंने लोकपाल? तीन साल होने को हैं कोई नाम भी नहीं लेता। कहाँ रुक गयी रिश्वत? कहाँ रुक गया भ्रष्टाचार? भ्रष्टाचार तो यही है कि कुछ भी कानून बना दो जिससे पारदर्शिता कम हो। किसी को क्या पता चलेगा।

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akb अभी एक नया फाइनेंस बिल बनाया है सरकार ने। अब तक जो कंपनियां पार्टियों को चंदा देती थी, उस पर लिमिट थी। कंपनियां अपनी 3 साल की कमाई के एवरेज से 7.5 % चंदा ही दे सकती थीं। अब ये लिमिट हटा दी गयी है। कंपनियों से आप कितना भी चंदा वसूल सकते हैं। कंपनियों के ये भी बताने की ज़रूरत नहीं है कि किसे चंदा दिया गया। ये सब चंदा चेक, ड्राफ्ट, ऑनलाइन, या किसी भी और सरकारी स्कीम के तहत दिया जा सकता है। पहले 20,000 रूपये के चंदे पर पार्टियों को दान देने वाले का नाम बताने की ज़रूरत नहीं थी। अब बस घटाकर इसे 2000 कर दिया गया है। सबसे ज़रूरी बात ये कि ये हर चुनाव पर लागू होगा, चाहे जनरल इलेक्शन हो, राज्य चुनाव हो, या पंचायत/नगर निगम के चुनाव हों।

पहली बात तो संसद में इस पर बहस करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि ये मनी बिल है और इसे सिर्फ लोकसभा में पास होने की ज़रूरत है। वहां ये पास हो चुका है। लेकिन ये दोनों ही प्रावधान टैक्स से संबंधित नहीं हैं। फिर इन्हें मनी बिल में क्यों ठूंसा गया है। इसलिए ताकि इन्हें लटकाया ना जा सके। इन पर बहस ना हो सके। सरकार ने हज़ारों एनजीओ की विदेशी फंडिंग पर रोक लगा दी किसी ना किसी प्रावधान में अटका कर। कई एनजीओ केस लड़ रहे हैं। लेकिन लड़ते रहें, जब तक नतीजा आएगा, तब तक उनका काम तो ठप्प हो चुका होगा। सरकार पिछले साल मई में एक और मनी बिल लेकर आयी थी। उसमें राजनीतिक दलों और एनजीओ की विदेशी फंडिंग को आसान कर दिया गया था। कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ ADR संस्था ने केस डाल रखा था विदेशी फंडिंग को लेकर। 2004 से 2012 तक विदेशी कंपनी से कथित चंदा लेते रहे जो गैर-कानूनी था। लेकिन बैक डेट से कानून ले आये तो केस भी ख़त्म हो गया। सरकार एनजीओ को तो पैसा लेने से रोक सकती है क्योंकि ये उसके हाथ में है। लेकिन सरकार को कोई नहीं रोक सकता क्योंकि उसके ऊपर कोर्ट ही होता है और कानून आने से उसके भी हाथ बंध गए। यहाँ पर ये चंदा झूठे विज्ञापनों में, भ्रम फैलाने में, झूठे प्रचार, फोटोशॉप, स्वघोषित फलाने ढिकाने दलों में ही तो खर्च होता है जिससे देश की शांति भंग होती है। लोग गुमराह होते हैं और किसी को फर्क भी नहीं पड़ता कि इतने चंदे की ज़रूरत क्या है पार्टियों को। 1000 करोड़ में इलेक्शन लड़े जा रहे हैं कॉर्पोरेट से पैसा लेकर। फिर उन्हें फायदे दिए जाते हैं। पारदर्शिता की पीपनी बजा रहे थे। कोई राजनीतिक दल RTI के दायरे में नहीं किया गया। कहाँ से चंदा आ रहा है, बताने की ज़रूरत नहीं। कंपनियों को भी अब बताने की ज़रूरत नहीं। विदेशी कंपनियों से पैसा लेने पर रोक नहीं। क्या हम जानते हैं कि किस विदेशी कंपनी का हमारे देश के प्रति क्या नीयत है? कुछ भी उठा कर मनी बिल में डाल देते हैं क्योंकि राज्यसभा में अभी बहुमत आया नहीं हैं। कुछ भी झूठ चलवा रहे हैं वेबसाइटों से क्योंकि उनको देने के लिए पैसा आ रहा है जिसका स्त्रोत किसी को पता नहीं। भ्रष्टाचार पर हंगामा काटा गया था अन्ना आंदोलन में। सबसे पहले यही पार्टी पहुंची थी समर्थन देने जो आज सरकार में आ गयी है। लोकपाल बिल राज्यसभा और लोकसभा दोनों में ही 2013 में पास हो गया था। कहाँ नियुक्त किया इन्होंने लोकपाल? तीन साल होने को हैं कोई नाम भी नहीं लेता। कहाँ रुक गयी रिश्वत? कहाँ रुक गया भ्रष्टाचार? भ्रष्टाचार तो यही है कि कुछ भी कानून बना दो जिससे पारदर्शिता कम हो। किसी को क्या पता चलेगा।

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पहली बात तो संसद में इस पर बहस करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि ये मनी बिल है और इसे सिर्फ लोकसभा में पास होने की ज़रूरत है। वहां ये पास हो चुका है। लेकिन ये दोनों ही प्रावधान टैक्स से संबंधित नहीं हैं। फिर इन्हें मनी बिल में क्यों ठूंसा गया है। इसलिए ताकि इन्हें लटकाया ना जा सके। इन पर बहस ना हो सके। सरकार ने हज़ारों एनजीओ की विदेशी फंडिंग पर रोक लगा दी किसी ना किसी प्रावधान में अटका कर। कई एनजीओ केस लड़ रहे हैं। लेकिन लड़ते रहें, जब तक नतीजा आएगा, तब तक उनका काम तो ठप्प हो चुका होगा। सरकार पिछले साल मई में एक और मनी बिल लेकर आयी थी। उसमें राजनीतिक दलों और एनजीओ की विदेशी फंडिंग को आसान कर दिया गया था। कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ ADR संस्था ने केस डाल रखा था विदेशी फंडिंग को लेकर। 2004 से 2012 तक विदेशी कंपनी से कथित चंदा लेते रहे जो गैर-कानूनी था। लेकिन बैक डेट से कानून ले आये तो केस भी ख़त्म हो गया। सरकार एनजीओ को तो पैसा लेने से रोक सकती है क्योंकि ये उसके हाथ में है। लेकिन सरकार को कोई नहीं रोक सकता क्योंकि उसके ऊपर कोर्ट ही होता है और कानून आने से उसके भी हाथ बंध गए। यहाँ पर ये चंदा झूठे विज्ञापनों में, भ्रम फैलाने में, झूठे प्रचार, फोटोशॉप, स्वघोषित फलाने ढिकाने दलों में ही तो खर्च होता है जिससे देश की शांति भंग होती है। लोग गुमराह होते हैं और किसी को फर्क भी नहीं पड़ता कि इतने चंदे की ज़रूरत क्या है पार्टियों को। 1000 करोड़ में इलेक्शन लड़े जा रहे हैं कॉर्पोरेट से पैसा लेकर। फिर उन्हें फायदे दिए जाते हैं। पारदर्शिता की पीपनी बजा रहे थे। कोई राजनीतिक दल RTI के दायरे में नहीं किया गया। कहाँ से चंदा आ रहा है, बताने की ज़रूरत नहीं। कंपनियों को भी अब बताने की ज़रूरत नहीं। विदेशी कंपनियों से पैसा लेने पर रोक नहीं। क्या हम जानते हैं कि किस विदेशी कंपनी का हमारे देश के प्रति क्या नीयत है? कुछ भी उठा कर मनी बिल में डाल देते हैं क्योंकि राज्यसभा में अभी बहुमत आया नहीं हैं। कुछ भी झूठ चलवा रहे हैं वेबसाइटों से क्योंकि उनको देने के लिए पैसा आ रहा है जिसका स्त्रोत किसी को पता नहीं। भ्रष्टाचार पर हंगामा काटा गया था अन्ना आंदोलन में। सबसे पहले यही पार्टी पहुंची थी समर्थन देने जो आज सरकार में आ गयी है। लोकपाल बिल राज्यसभा और लोकसभा दोनों में ही 2013 में पास हो गया था। कहाँ नियुक्त किया इन्होंने लोकपाल? तीन साल होने को हैं कोई नाम भी नहीं लेता। कहाँ रुक गयी रिश्वत? कहाँ रुक गया भ्रष्टाचार? भ्रष्टाचार तो यही है कि कुछ भी कानून बना दो जिससे पारदर्शिता कम हो। किसी को क्या पता चलेगा।

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चुनावी नतीजों से संतुलन ना खोएं

akb     कुछ लोग बहुत निराश हैं और कुछ लोग ख़ुशी से मानसिक संतुलन खो रहे हैं। चुनाव था, हो गया। आखिरी तो नहीं था। कोई जीता है तो उसकी भी वजहें हैं, कोई हारा है तो उसकी भी वजह है ही। हारने वाले को अपनी वजह खत्म करनी चाहिए। चुनाव तो पिछले साल भी हुए थे, उससे पिछले साल भी हुए थे और अगले साल भी होंगे। आयोडेक्स मलिए, काम पर चलिए। आम आदमी पार्टी को लेकर सभी को लग रहा था कि पंजाब में सरकार बना ली जाएगी। देखिये, ऐसा कोई चमत्कार कोई दल कहीं नहीं कर सकता कि जहाँ भी चुनाव में उतरे और वहीँ सरकार बना ले जाये। सालों बाद किसी पार्टी का नंबर आता है सरकार बनाने का। बीजेपी का भी बहुत साल बाद यूपी में नंबर लगा है। आप पहली बार ही पंजाब में आकर 25-26 सीट ले गए, अच्छा है। आगे की रणनीति बनाइये। अच्छे विपक्ष की भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी एक मज़बूत सरकार की। आत्मविश्वास की भी अति नहीं होनी चाहिए वरना बांटने के लिए तैयार लड्डू खुद ही खाने पड़ते हैं। एक वक़्त ऐसा था जब हर जगह कांग्रेस ही आती थी। इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी लगायी, उसके बाद हार गयीं लेकिन 3 साल बाद फिर जनता ने बहुमत दे दिया। उस वक़्त कितने ही लोग ये देख कर निराश होते होंगे। नयी-नयी पार्टियां 2-4 सीटें ही ला पायीं थी। ये दौर होता है। 'वोटिंग ट्रेंड' नहीं बदला है, बस राजनीतिक हथियार बदल गए हैं, तरीके बदल गए हैं। परंपरागत राजनीति करने वालों को समझ लेना चाहिए कि अब राजनीति 'ट्रांजीशन फेज़' में है। बहुत संगठित तरीके से ही आप चुनाव जीत सकते हैं। संगठित आपको हर तरह से होना पड़ता है और हर जगह होना पड़ता है। वोटर समझ गया है कि आप परंपरागत राजनीति वाले नेताओं की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है और ना आपको जनता के प्रतिनिधित्व से मतलब है। आपका वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रति 'कमिटमेंट' कमज़ोर है। विचारधारा के प्रति 'कमिटमेंट' कमज़ोर है। जिनका 'कमिटमेंट' कुर्सी से ऊपर था, उन्होंने राज्यों में सरकार बनायी भी है। लहर के विरुद्ध। जैसे-जैसे राजनेता अनुभव के साथ परिपक्व होता है, वैसे ही राजनीति कवर करने वाला भी हर चुनाव के साथ परिपक्व होता है। हमारी उम्र वाले पत्रकारों को इन चुनावों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। चुनाव की शुरुआत में ही कुछ पत्रकारों ने शायद समझ लिया था कि किसी के लिए हवा बनाना हमारा काम नहीं है, वोटर पर ही फैसला छोड़ देना चाहिए। यही आदर्श स्थिति है। जो हमारी प्राथमिकता है, ज़रूरी नहीं कि वो एक गरीब वोटर की भी प्राथमिकता है। वो किसी भी बात पर वोट दे सकता है और यही उसका अधिकार है। हमारे लिए घी बाँटना, सिलेंडर बाँटना कोई बड़ी बात नहीं है। जिसके लिए ये प्राथमिकता है, वो तो वोट करेगा ही। विरोधियों को भी ये बात समझनी चाहिए। साथ ही, राहुल गाँधी या कांग्रेस को बाद में आत्मनिरीक्षण की सलाह दीजियेगा, पहले खुद मीडिया को ही आत्मनिरीक्षण कर लेना चाहिए। या तो आत्मनिरीक्षण करें या फिर ज्योतिष पत्रकारिता में ना पड़ें। नरेंद्र मोदी कैसा सोचते हैं और क्या करने वाले हैं, चुनाव में क्या हो सकता है, मीडिया को उसकी भनक तक नहीं लगती है। दिल्ली चुनाव, बिहार चुनाव, बंगाल चुनाव और अब यूपी और पंजाब का चुनाव में मीडिया ने इस बात को साबित किया है। मुश्किल काम तो होता नहीं था, अब आसान काम भी नहीं हो पा रहा। ये तक पता नहीं चल पता है कि कौन सीएम बनने जा रहा है। अब बात साख की है। आप किसी दल की तरह ही फेल हो चुके हैं। व्यक्ति दर व्यक्ति आपका 'स्टैंड' बदलता रहता है। इतना बड़ा लोकतंत्र है, हर बार आपकी सहूलियत को देख कर नतीजा नहीं आ सकता है। जिन्होंने कभी लंबे वक़्त तक विपक्ष में बैठ कर इंतज़ार किया है, आज उनका कुर्सी पर बैठने का वक़्त है। आप हर बार एक ही तरह से अपना 'एक्सपेरिमेंट' करेंगे और चाहेंगे की नतीजा अलग हो तो ऐसा होना साइंटिफिक तो नहीं है। जो आप महसूस कर रहे हैं, ज़रूरी नहीं कि वही नतीजा आये। हो सकता है आपके महसूस करने के पीछे की 'थ्योरी' ही गलत लगी हो।

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चुनावी नतीजों से संतुलन ना खोएं

akb     कुछ लोग बहुत निराश हैं और कुछ लोग ख़ुशी से मानसिक संतुलन खो रहे हैं। चुनाव था, हो गया। आखिरी तो नहीं था। कोई जीता है तो उसकी भी वजहें हैं, कोई हारा है तो उसकी भी वजह है ही। हारने वाले को अपनी वजह खत्म करनी चाहिए। चुनाव तो पिछले साल भी हुए थे, उससे पिछले साल भी हुए थे और अगले साल भी होंगे। आयोडेक्स मलिए, काम पर चलिए। आम आदमी पार्टी को लेकर सभी को लग रहा था कि पंजाब में सरकार बना ली जाएगी। देखिये, ऐसा कोई चमत्कार कोई दल कहीं नहीं कर सकता कि जहाँ भी चुनाव में उतरे और वहीँ सरकार बना ले जाये। सालों बाद किसी पार्टी का नंबर आता है सरकार बनाने का। बीजेपी का भी बहुत साल बाद यूपी में नंबर लगा है। आप पहली बार ही पंजाब में आकर 25-26 सीट ले गए, अच्छा है। आगे की रणनीति बनाइये। अच्छे विपक्ष की भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी एक मज़बूत सरकार की। आत्मविश्वास की भी अति नहीं होनी चाहिए वरना बांटने के लिए तैयार लड्डू खुद ही खाने पड़ते हैं। एक वक़्त ऐसा था जब हर जगह कांग्रेस ही आती थी। इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी लगायी, उसके बाद हार गयीं लेकिन 3 साल बाद फिर जनता ने बहुमत दे दिया। उस वक़्त कितने ही लोग ये देख कर निराश होते होंगे। नयी-नयी पार्टियां 2-4 सीटें ही ला पायीं थी। ये दौर होता है। 'वोटिंग ट्रेंड' नहीं बदला है, बस राजनीतिक हथियार बदल गए हैं, तरीके बदल गए हैं। परंपरागत राजनीति करने वालों को समझ लेना चाहिए कि अब राजनीति 'ट्रांजीशन फेज़' में है। बहुत संगठित तरीके से ही आप चुनाव जीत सकते हैं। संगठित आपको हर तरह से होना पड़ता है और हर जगह होना पड़ता है। वोटर समझ गया है कि आप परंपरागत राजनीति वाले नेताओं की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है और ना आपको जनता के प्रतिनिधित्व से मतलब है। आपका वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रति 'कमिटमेंट' कमज़ोर है। विचारधारा के प्रति 'कमिटमेंट' कमज़ोर है। जिनका 'कमिटमेंट' कुर्सी से ऊपर था, उन्होंने राज्यों में सरकार बनायी भी है। लहर के विरुद्ध। जैसे-जैसे राजनेता अनुभव के साथ परिपक्व होता है, वैसे ही राजनीति कवर करने वाला भी हर चुनाव के साथ परिपक्व होता है। हमारी उम्र वाले पत्रकारों को इन चुनावों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। चुनाव की शुरुआत में ही कुछ पत्रकारों ने शायद समझ लिया था कि किसी के लिए हवा बनाना हमारा काम नहीं है, वोटर पर ही फैसला छोड़ देना चाहिए। यही आदर्श स्थिति है। जो हमारी प्राथमिकता है, ज़रूरी नहीं कि वो एक गरीब वोटर की भी प्राथमिकता है। वो किसी भी बात पर वोट दे सकता है और यही उसका अधिकार है। हमारे लिए घी बाँटना, सिलेंडर बाँटना कोई बड़ी बात नहीं है। जिसके लिए ये प्राथमिकता है, वो तो वोट करेगा ही। विरोधियों को भी ये बात समझनी चाहिए। साथ ही, राहुल गाँधी या कांग्रेस को बाद में आत्मनिरीक्षण की सलाह दीजियेगा, पहले खुद मीडिया को ही आत्मनिरीक्षण कर लेना चाहिए। या तो आत्मनिरीक्षण करें या फिर ज्योतिष पत्रकारिता में ना पड़ें। नरेंद्र मोदी कैसा सोचते हैं और क्या करने वाले हैं, चुनाव में क्या हो सकता है, मीडिया को उसकी भनक तक नहीं लगती है। दिल्ली चुनाव, बिहार चुनाव, बंगाल चुनाव और अब यूपी और पंजाब का चुनाव में मीडिया ने इस बात को साबित किया है। मुश्किल काम तो होता नहीं था, अब आसान काम भी नहीं हो पा रहा। ये तक पता नहीं चल पता है कि कौन सीएम बनने जा रहा है। अब बात साख की है। आप किसी दल की तरह ही फेल हो चुके हैं। व्यक्ति दर व्यक्ति आपका 'स्टैंड' बदलता रहता है। इतना बड़ा लोकतंत्र है, हर बार आपकी सहूलियत को देख कर नतीजा नहीं आ सकता है। जिन्होंने कभी लंबे वक़्त तक विपक्ष में बैठ कर इंतज़ार किया है, आज उनका कुर्सी पर बैठने का वक़्त है। आप हर बार एक ही तरह से अपना 'एक्सपेरिमेंट' करेंगे और चाहेंगे की नतीजा अलग हो तो ऐसा होना साइंटिफिक तो नहीं है। जो आप महसूस कर रहे हैं, ज़रूरी नहीं कि वही नतीजा आये। हो सकता है आपके महसूस करने के पीछे की 'थ्योरी' ही गलत लगी हो।

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एक दोस्त ने पूछा कि कम्यूनिस्ट/वामपंथी क्या होता है। मैंने कोई किताब तो नहीं पढ़ी लेकिन एक परिवार को जाना तो पता चला कि यही असली कम्यूनिस्ट होते होंगे। जो खुद को कम्यूनिस्ट कहते-समझते हों, वो भी एक बार ये पढ़ कर फैसला करें कि वो असली वामपंथी हैं या नहीं।

चक्रवर्ती साहब और उनकी पत्नी जब भी कभी बाहर खाना खाने जाते हैं तो अपने घर की 'हेल्पर' को साथ ले जाते हैं, एक ही मेज़ पर एक जैसा खाना खाते हैं। बरसों से ये नियम टूटा नहीं। मैडम चक्रवर्ती दुर्गा पूजा में जो कपड़े अपनी बेटी के लिए लायी, बिलकुल वैसा ही एक जोड़ा अपनी 'हेल्पर' की बेटी के लिए लेकर आयीं। हालांकि उनकी बेटी को ये बड़ा नागवार गुज़रा। बालक मन। फिर भी वो हमेशा से ऐसा करती आई हैं। मैडम चक्रवर्ती अपने लिए कोई अंतिम संस्कार नहीं चाहती। उन्होंने अपने शरीर को अभी से ही मेडिकल में दान कर दिया है।

कई और बातें हैं जिन्हें जानकर मैं काफी प्रभावित हुई और उन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश ज़रूर करुँगी। लेकिन मैं जानती हूँ कि खुद को वामपंथी बनाने में बहुत ज़्यादा अनुशासन और मेहनत लगती है। इंसान कितनी बार खुद को विरोधाभासों से घिरा पाता है लेकिन फिर सोचता है, फिर खुद को खरा साबित करने के लिए जुट जाता है। जिस समाज में हम रह रहे हैं, वहां धर्म, जाति, ऊंच-नीच मानना तो बहुत आसान चीज़ है। परंपरा के साथ चलना आसान है, सर्वमान्य है, कोई विरोधाभास नहीं होगा। अगर मैंने वामपंथ नहीं पढ़ा है तो इससे ज़्यादा तारीफ़ करना या गाली देना बेवकूफी होगी। किस तरह के लोग ऐसा करते हैं, उनका ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं।

मैं डेमोक्रेसी में विश्वास रखती हूँ। इसकी खामियों के बावजूद इससे खुश हूँ। अब अगर आने वाले वक़्त में डेमोक्रेसी असफल साबित हो तो क्या डेमोक्रैट होना भी गाली हो जायेगा? एक तरह से असफल हो ही रही है। डेमोक्रैट होने के बावजूद कई बार मैं भी खुद को विरोधाभास में फंसा हुआ पाती हूँ लेकिन फिर भी डेमोक्रैट होना थोड़ा आसान है। आप कितना भी कमाइये और कितना भी खर्च कीजिये और किसी गैर-बराबरी को नज़रअंदाज़ करिये। सरकार के खिलाफ बोलना और गैर-बराबरी को नज़रअंदाज़ ना करना, ये भी डेमोक्रेसी में ही संभव है।

सबसे आसान है फासीवाद। ये कहीं ना कहीं आदमी में छुप कर बैठा होता है। डर किस व्यक्ति में नहीं होता। बस डरे हुए को और डराओ। असुरक्षा की भावना किस में नहीं होती। बस असुरक्षा को बड़ा बना कर दिखाओ। ऊंच-नीच, जाति, धर्म तो पैदा होते ही बच्चे को सिखाया जाने लगता है। तो अच्छा खून, बुरा खून की भावना तो बनी-बनायी है। खुद को दूसरों से महान समझना क्या मुश्किल है। किसी चीज़ का हल कौन ताक़त से नहीं करना चाहता? कौन जल्दी से नहीं करना चाहता। मैंने अपने एक सहकर्मी के मुँह से सुना कि देश को कुछ वक़्त तक आर्मी के हाथों में दे दो। सब सुधर जायेगा। अगर इस सबसे आप खुद को जोड़ पाते हैं तो आप कभी भी फासीवादी हो सकते हैं। हेल हिटलर!

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ये कम्यूनिस्ट क्या होता है !

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एक दोस्त ने पूछा कि कम्यूनिस्ट/वामपंथी क्या होता है। मैंने कोई किताब तो नहीं पढ़ी लेकिन एक परिवार को जाना तो पता चला कि यही असली कम्यूनिस्ट होते होंगे। जो खुद को कम्यूनिस्ट कहते-समझते हों, वो भी एक बार ये पढ़ कर फैसला करें कि वो असली वामपंथी हैं या नहीं।

चक्रवर्ती साहब और उनकी पत्नी जब भी कभी बाहर खाना खाने जाते हैं तो अपने घर की 'हेल्पर' को साथ ले जाते हैं, एक ही मेज़ पर एक जैसा खाना खाते हैं। बरसों से ये नियम टूटा नहीं। मैडम चक्रवर्ती दुर्गा पूजा में जो कपड़े अपनी बेटी के लिए लायी, बिलकुल वैसा ही एक जोड़ा अपनी 'हेल्पर' की बेटी के लिए लेकर आयीं। हालांकि उनकी बेटी को ये बड़ा नागवार गुज़रा। बालक मन। फिर भी वो हमेशा से ऐसा करती आई हैं। मैडम चक्रवर्ती अपने लिए कोई अंतिम संस्कार नहीं चाहती। उन्होंने अपने शरीर को अभी से ही मेडिकल में दान कर दिया है।

कई और बातें हैं जिन्हें जानकर मैं काफी प्रभावित हुई और उन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश ज़रूर करुँगी। लेकिन मैं जानती हूँ कि खुद को वामपंथी बनाने में बहुत ज़्यादा अनुशासन और मेहनत लगती है। इंसान कितनी बार खुद को विरोधाभासों से घिरा पाता है लेकिन फिर सोचता है, फिर खुद को खरा साबित करने के लिए जुट जाता है। जिस समाज में हम रह रहे हैं, वहां धर्म, जाति, ऊंच-नीच मानना तो बहुत आसान चीज़ है। परंपरा के साथ चलना आसान है, सर्वमान्य है, कोई विरोधाभास नहीं होगा। अगर मैंने वामपंथ नहीं पढ़ा है तो इससे ज़्यादा तारीफ़ करना या गाली देना बेवकूफी होगी। किस तरह के लोग ऐसा करते हैं, उनका ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं।

मैं डेमोक्रेसी में विश्वास रखती हूँ। इसकी खामियों के बावजूद इससे खुश हूँ। अब अगर आने वाले वक़्त में डेमोक्रेसी असफल साबित हो तो क्या डेमोक्रैट होना भी गाली हो जायेगा? एक तरह से असफल हो ही रही है। डेमोक्रैट होने के बावजूद कई बार मैं भी खुद को विरोधाभास में फंसा हुआ पाती हूँ लेकिन फिर भी डेमोक्रैट होना थोड़ा आसान है। आप कितना भी कमाइये और कितना भी खर्च कीजिये और किसी गैर-बराबरी को नज़रअंदाज़ करिये। सरकार के खिलाफ बोलना और गैर-बराबरी को नज़रअंदाज़ ना करना, ये भी डेमोक्रेसी में ही संभव है।

सबसे आसान है फासीवाद। ये कहीं ना कहीं आदमी में छुप कर बैठा होता है। डर किस व्यक्ति में नहीं होता। बस डरे हुए को और डराओ। असुरक्षा की भावना किस में नहीं होती। बस असुरक्षा को बड़ा बना कर दिखाओ। ऊंच-नीच, जाति, धर्म तो पैदा होते ही बच्चे को सिखाया जाने लगता है। तो अच्छा खून, बुरा खून की भावना तो बनी-बनायी है। खुद को दूसरों से महान समझना क्या मुश्किल है। किसी चीज़ का हल कौन ताक़त से नहीं करना चाहता? कौन जल्दी से नहीं करना चाहता। मैंने अपने एक सहकर्मी के मुँह से सुना कि देश को कुछ वक़्त तक आर्मी के हाथों में दे दो। सब सुधर जायेगा। अगर इस सबसे आप खुद को जोड़ पाते हैं तो आप कभी भी फासीवादी हो सकते हैं। हेल हिटलर!

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ये कम्यूनिस्ट क्या होता है !

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एक दोस्त ने पूछा कि कम्यूनिस्ट/वामपंथी क्या होता है। मैंने कोई किताब तो नहीं पढ़ी लेकिन एक परिवार को जाना तो पता चला कि यही असली कम्यूनिस्ट होते होंगे। जो खुद को कम्यूनिस्ट कहते-समझते हों, वो भी एक बार ये पढ़ कर फैसला करें कि वो असली वामपंथी हैं या नहीं।

चक्रवर्ती साहब और उनकी पत्नी जब भी कभी बाहर खाना खाने जाते हैं तो अपने घर की 'हेल्पर' को साथ ले जाते हैं, एक ही मेज़ पर एक जैसा खाना खाते हैं। बरसों से ये नियम टूटा नहीं। मैडम चक्रवर्ती दुर्गा पूजा में जो कपड़े अपनी बेटी के लिए लायी, बिलकुल वैसा ही एक जोड़ा अपनी 'हेल्पर' की बेटी के लिए लेकर आयीं। हालांकि उनकी बेटी को ये बड़ा नागवार गुज़रा। बालक मन। फिर भी वो हमेशा से ऐसा करती आई हैं। मैडम चक्रवर्ती अपने लिए कोई अंतिम संस्कार नहीं चाहती। उन्होंने अपने शरीर को अभी से ही मेडिकल में दान कर दिया है।

कई और बातें हैं जिन्हें जानकर मैं काफी प्रभावित हुई और उन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश ज़रूर करुँगी। लेकिन मैं जानती हूँ कि खुद को वामपंथी बनाने में बहुत ज़्यादा अनुशासन और मेहनत लगती है। इंसान कितनी बार खुद को विरोधाभासों से घिरा पाता है लेकिन फिर सोचता है, फिर खुद को खरा साबित करने के लिए जुट जाता है। जिस समाज में हम रह रहे हैं, वहां धर्म, जाति, ऊंच-नीच मानना तो बहुत आसान चीज़ है। परंपरा के साथ चलना आसान है, सर्वमान्य है, कोई विरोधाभास नहीं होगा। अगर मैंने वामपंथ नहीं पढ़ा है तो इससे ज़्यादा तारीफ़ करना या गाली देना बेवकूफी होगी। किस तरह के लोग ऐसा करते हैं, उनका ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं।

मैं डेमोक्रेसी में विश्वास रखती हूँ। इसकी खामियों के बावजूद इससे खुश हूँ। अब अगर आने वाले वक़्त में डेमोक्रेसी असफल साबित हो तो क्या डेमोक्रैट होना भी गाली हो जायेगा? एक तरह से असफल हो ही रही है। डेमोक्रैट होने के बावजूद कई बार मैं भी खुद को विरोधाभास में फंसा हुआ पाती हूँ लेकिन फिर भी डेमोक्रैट होना थोड़ा आसान है। आप कितना भी कमाइये और कितना भी खर्च कीजिये और किसी गैर-बराबरी को नज़रअंदाज़ करिये। सरकार के खिलाफ बोलना और गैर-बराबरी को नज़रअंदाज़ ना करना, ये भी डेमोक्रेसी में ही संभव है।

सबसे आसान है फासीवाद। ये कहीं ना कहीं आदमी में छुप कर बैठा होता है। डर किस व्यक्ति में नहीं होता। बस डरे हुए को और डराओ। असुरक्षा की भावना किस में नहीं होती। बस असुरक्षा को बड़ा बना कर दिखाओ। ऊंच-नीच, जाति, धर्म तो पैदा होते ही बच्चे को सिखाया जाने लगता है। तो अच्छा खून, बुरा खून की भावना तो बनी-बनायी है। खुद को दूसरों से महान समझना क्या मुश्किल है। किसी चीज़ का हल कौन ताक़त से नहीं करना चाहता? कौन जल्दी से नहीं करना चाहता। मैंने अपने एक सहकर्मी के मुँह से सुना कि देश को कुछ वक़्त तक आर्मी के हाथों में दे दो। सब सुधर जायेगा। अगर इस सबसे आप खुद को जोड़ पाते हैं तो आप कभी भी फासीवादी हो सकते हैं। हेल हिटलर!

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