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राजनीति में स्मृति

akb कई लोगों के लिए ये हैरानी का विषय था जब स्मृति ईरानी को कैबिनेट मंत्री बनाया गया।  जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं और बीजेपी सत्ता में आई है तभी से कई विरोधाभास देखने को मिल रहे हैं।  लेकिन इस समय स्मृति ईरानी की शिक्षा सोशल मीडिया पर लोगों के लिए बहस का मुद्दा बानी हुई है।  विरोध करने वाले और पक्ष में कहने वाले दोनों ही अपनी बातों में कुतर्कों का सहारा ले रहे हैं। क्या ये तर्क प्रयाप्त है कि कुछ महान लोग पढ़े लिखे नहीं थे पर उन्होंने महान कार्य किये? और उन्होंने महान कार्य किये तो इसलिए आप पढ़े लिखे नहीं हैं तो चलेगा। सारे साक्षर अभियान ख़त्म कर दीजिये इस तर्क पर।  इस हिसाब से आप अपनी शिक्षा सबंधित हलफनामा कहीं भी जमा नहीं करवाइये, इसकी ज़रूरत  क्या है कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए भी? लेकिन ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि ये एक फ़िल्टर की तरह काम करता है। हिंदुस्तान की शिक्षा पद्धति की खामी ही यही है कि आप किसी के बौद्धिक स्तर को, उसकी समझ को उसकी डिग्री से, उसके नंबरों से नहीं आंक सकते। देखते हैं कि स्मृति ईरानी इस पद्धत्ति में क्या अंतर ला पाएंगी। स्मृति ईरानी को जनता ने कभी सांसद बनने लायक नहीं समझा लेकिन प्रधानमंत्री ने उन्हें पूरे भारत के मानव संसाधन मंत्री के तौर पर चुना है।  लेकिन मुझे कहीं भी लोकतंत्र का, बहुमत के फैसले का हवाला देने वाले लोगों की आवाज़ें नहीं सुनाई दे रही।  ये मुझे मेरे मित्र नितिन की कही हुई बात याद दिल रहा है कि ये लोकतंत्र नहीं लोकतांत्रिकनुमा सिस्टम है।  क्योंकि हमने मनमोहन सिंह को नहीं चुना था, उन्हें सोनिया गांधी ने चुना था।  हमने सोनिया गांधी को भी कांग्रेस की अध्यक्षा के रूप में नहीं चुना था जो सरकार के फैसलों पर मुहर लगाती रहीं।  यही सिलसिला जारी है बदली हुई सरकार में भी। स्मृति ईरानी को ही क्यों घेरा जा रहा है शिक्षा के मसले पर।  क्या भारत की राजनीति में ऐसे उदाहरण और नहीं है ? कितने ही सांसद है जिन्हे जनता ने चुना है उनकी शिक्षा और यहाँ तक की तमीज का स्तर देखे बिना। क्या इसका कारण ये है कि वो महिला हैं ? हो सकता है इसलिए कि उनकी पृष्ठभूमि एक मॉडल की है और इसलिए सीधे तौर पर महिला विरोधी बयान से बच कर ये रुख अपनाया है।  अतीत में कांग्रेस के नेता संजय निरुपम एक चैनेल डिबेट के दौरान स्मृति ईरानी के पृष्टभूमि को लेकर छिछली टिप्पणी कर चुके हैं।  बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी भी कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी पर उनकी डिग्री को लेकर सवाल खड़े करते रहे हैं। यहाँ तक कि उनकी पृष्ठभूमि और वो क्या काम करती थीं इस मसले को भी वक़्त बेवक़्त उछाला जाता रहा है। लेकिन क्या ये लोगों के तर्कों का ही मसला है? ADR संस्था की वेबसाइट पर लोकसभा चुनाव 2004 के डेटा को आप खँगालेंगे तो पाएंगे कि स्मृति ईरानी ग्रेजुएट हैं।  उन्होंने यही हलफनामा दिया है।  लेकिन 2014 चुनावों के हलफनामे के अनुसार स्मृति ईरानी ग्रेजुएट नहीं हैं।  बैचलर ऑफ़ कॉमर्स पार्ट 1 उन्होंने पढ़ा है जो की कोई डिग्री नहीं है और इसे वहां लिखे जाने की  भी ज़रूरत नहीं थी।  क्या ये फर्जीवाड़ा नहीं है ? क्या मंत्री की पॉलिसी चुनाव को आप इस बात का संज्ञान लेकर नहीं देखेंगे ? एक समय था जब स्मृति ईरानी धरने पर बैठी थीं और मोदी जी का इस्तीफा मांग रही थीं लेकिन बाद में पार्टी दबाव के कारण उठ गयीं। तब तक कोई कोर्ट का फैसला नहीं आया था।  जितना फुटेज चाहिए था वो ले लिया था पर फिर राजनितिक भविष्य बचाये रखने के लिए पलटी मार दी थी। आज के समय में इसे "ड्रामा" कहा जाता है।  तब इसे "धरना" कहा जाता था।  राजनितिक भविष्य के लिए, पार्टी के दबाव में आने वाले मंत्री का पॉलिसी चुनाव को आप इस बात का संज्ञान लेकर नहीं देखेंगे ? मिडिल क्लास इस मुद्दे को उछालते रहे हैं कि निरक्षर लोग, काम पढ़े लिखे लोग क्यों हमारे देश को चला रहे हैं।  मुझे जनता की सोच पर अब ज़्यादा भरोसा रहा नहीं क्योंकि अगर मोदी जी सचिन तेंदुलकर को मंत्री बना देते तो उनकी शिक्षा के बारे में नहीं पूछा जाता।  किस मंत्रालय के लायक है या नहीं ये भी नहीं पूछा जाता। नज़रिये को अच्छे औए बुरे की श्रेणी में मत बाँटिये क्योंकि नजरिया सिर्फ अच्छा या बुरा नहीं होता, ये किसी के लिए अच्छा और किसी के लिए बुरा होता है।  ये तो आप देख ही रहे होंगे।

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