Sarvapriya Sangwan

My Poetry

ज़राहत है ज़ुबां

akb ग़ालिब मीर फैज़ सब पढ़ डाले इस ख्याल से की एक दिन एक कविता बन  पड़ेगी मुझसे और लोगों के लबों से गुज़रती हुई पहुँच जाएगी तुम्हारे कानों तक रास्ता तेरे दिल तक मेरे जज्बातों को और कुछ सूझा नहीं तबसे, तुम्हें कहे तल्ख़ लफ्जों से ज़राहत है ये ज़ुबां जबसे। ज़राहत = घावयुक्त/Hurt

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एक हमदर्द तुम्हारा यहाँ भी है

akb जो दर्द का आलम है वहां, एक चुभन तो हुई यहाँ भी है जो गुलज़ार फ़ना हुआ है वहां एक दश्त का माहौल तो यहाँ भी है माना काटी रातें तुमने चाँद देख कर लेकिन नींदों की रवानी तो यहाँ भी है माना तकदीर नहीं तुम्हारे बस में पर एक बेबसी की कहानी तो यहाँ भी है माना कर दिया है तुम्हें दूर इतना पर सरगिनिया तो बहती यहाँ भी हैं माना ले गए हो मेरी यादें अपने साथ पर तुम्हारी खुशबू तो जवां यहाँ भी है माना कुछ दूरियां होती हैं बेहतर खुशियों पर तो हक तुम्हारा भी है पर इस उदासी में नहीं तुम अकेले एक दोस्त तुम्हारा यहाँ भी है एक हमदर्द तुम्हारा यहाँ भी है।   सरगिनिया = उदासी

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