Sarvapriya Sangwan

My Poetry

पेचीदा सवाल बाकी है

akb

दफ्तर की मसरुफ़ियत से निकल कर
कुछ देर पलकों को टिकाया तो याद आया
सुबह की कोख में अभी शाम बाकी है
अभी तो आना दिल को आराम बाकी है
दर्द ने कुछ देर छुट्टी ली तो क्या हुआ
अभी तो इसकी उम्र तमाम बाकी है
गया तो वो कुछ इस तरह
कि ना गिले हुए ना मनाजातें हुईं
उफ़, कैसे ये सारे काम बाकी हैं
कैसे समझूं इस नाइंसाफ़ी को
कि वो तो हुआ अजनबी फिर से
क्यूँ मुझे कोई इत्तेफ़ाक़ बाकी है
अब इस पर क्या हो ज़ोर मेरा
जब उठती है तो उससे जा मिलती है
जाने नज़रों का ये कैसा इख्तिलात बाकी है
होती है उसकी बेनियाज़ी रोज़ मुखातिब मुझसे
जाने मेरी हिम्मत के कितने इम्तेहान बाकी हैं
कैसे बह जाएगी तल्खी आँखों से
कैसे मिल पायेगी वारस्तगी यादों से
अब भी पेचीदा सा ये सवाल बाकी है।
मनाजातें = मनाना इत्तेफ़ाक = वास्ता इख्तिलात = मेलजोल बेनियाज़ी = बेरुखी, उपेक्षा तल्खी = कड़वाहट वारस्तगी = छुटकारा

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एक मैली सी याद

akb यूँ ही किसी रात

एक मैली सी याद
जब सब पहरे तोड़ कर
जेहन को पकड़ लेती है
और नींदों को जकड़ लेती है
फिर ये दिल कोसता है खुद को
हर मासूम कोशिश को
हर मायूस उम्मीद को
जो तुम तक ले जाती थी मुझको
यादों की तख्ती से स्याही धुल तो जाती है
पर मिट कहाँ पाती है
फिर ये स्याह रंग गहराता है
बरबस ही ख्यालों को पन्नों पर ले आता है
जो मैं लिख पाती हूँ , वजह तुम ही तो हो ज़िन्दगी में बाकी है जो सवाल, तुम ही तो हो
आखिर कोई तो मेरे लिए तुम अब भी हो
एक सुकूं है इस खालीपन में
उदासी में ,लिखने में ,खुद को समझाने में
अब करना तो ऐसा करना
तुम वापस आना मत
मुझे कभी मनाना मत
जो सीख लिया है मैंने
ये सलीका मेरा चुराना मत। ये मैली सी यादें अब साफ़ ना हो पाएंगी तुमसे।

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:)